सना खान
एक कस्बे में दो युवक रहते थे। दोनों एक-दूसरे को बचपन से जानते थे। साथ खेलते थे, साथ बड़े हुए थे और एक-दूसरे के परिवारों में भी उनका आना-जाना था। एक दिन किसी छोटी-सी बात पर उनके बीच विवाद हो गया। शुरुआत में यह सिर्फ बहस थी। कुछ कठोर शब्द कहे गए। दोनों चाहते तो कुछ देर बाद शांत होकर बात कर सकते थे, लेकिन गुस्से ने उनकी समझ पर पर्दा डाल दिया। बहस बढ़ती गई और आवेश में एक युवक ने ऐसा कदम उठा लिया, जिसे वापस नहीं लिया जा सकता था। कुछ ही पलों में एक घर का बेटा हमेशा के लिए चला गया। पूरा मोहल्ला स्तब्ध था। जिस घर में कभी हंसी गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा था। माता-पिता की आंखें दरवाजे पर टिक जातीं, लेकिन उन्हें पता था कि अब उनका बेटा कभी लौटकर नहीं आएगा।
लेकिन दुख सिर्फ एक घर तक सीमित नहीं था। दूसरे घर का बेटा जेल चला गया। उसकी मां हर मुलाकात में सलाखों के पीछे खड़े अपने बेटे को देखकर रो पड़ती थी। पिता चुपचाप सिर झुकाए बैठे रहते। उन्हें समझ नहीं आता था कि एक पल के गुस्से ने उनके पूरे परिवार की दुनिया वैâसे बदल दी।
वर्षों बाद जेल में एक सामाजिक कार्यकर्ता ने उस युवक से पूछा, ‘तुम्हें सबसे बड़ा पछतावा किस बात का है?’ युवक कुछ देर चुप रहा। फिर उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा, ‘मैंने सोचा था कि मैं सिर्फ एक व्यक्ति को नुकसान पहुंचा रहा हूं। मुझे तब समझ नहीं था कि मेरे एक पैâसले की सजा मेरे ६ माता-पिता, मेरे बच्चों और कई बेगुनाह लोगों को भी भुगतनी पड़ेगी।’
कमरे में सन्नाटा छा गया। उसे अब समझ आया था कि गुस्सा कुछ मिनटों का था, लेकिन उसका परिणाम कई वर्षों तक चलने वाला था।
एक पल का गुस्सा था, मगर अंजाम बड़ा था,
रोने वाला सिर्फ एक नहीं, पूरा घर खड़ा था।
गुजर गया वो लम्हा, मगर दर्द ठहर गया,
एक पैâसले का बोझ कई जिंदगियों पर पड़ गया।
