सना खान
एक पिता अपने बेटे से रोज कहता था, ‘हमेशा सच बोलना चाहिए।’ लेकिन जब कोई ऐसा फोन आता जिसका जवाब देने का मन नहीं होता, तो वह बेटे से कहता, ‘बोल दो, पापा घर पर नहीं हैं।’ एक मां अपनी बेटी को सिखाती थी कि सभी का सम्मान करना चाहिए, लेकिन घर में काम करने वाले लोगों से अक्सर गुस्से में बात करती थी।
बच्चे शायद इन बातों पर कुछ नहीं कहते, लेकिन वे सब कुछ देखते और सीखते हैं। क्योंकि बच्चे हमारी बातों से कम और हमारे व्यवहार से ज्यादा सीखते हैं।
माता-पिता बनना सिर्फ बच्चों को अच्छी बातें सिखाना नहीं है, बल्कि उन बातों को खुद अपने जीवन में अपनाना भी है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे रोज अपने आसपास देखते हैं। हम बच्चों को धैर्य रखने की सलाह देते हैं, लेकिन छोटी-सी बात पर खुद गुस्सा हो जाते हैं। हम उन्हें मोबाइल कम चलाने को कहते हैं, जबकि हम खुद घंटों फोन में व्यस्त रहते हैं। हम चाहते हैं कि बच्चे ईमानदार, विनम्र और समझदार बनें, लेकिन क्या हम खुद ऐसा व्यवहार करते हैं?
सच तो यह है कि बच्चे हमारी कही हुई बातों से ज्यादा हमारे कामों पर भरोसा करते हैं। वे यह नहीं देखते कि हम क्या कहते हैं, बल्कि यह देखते हैं कि हम क्या करते हैं।
मनोविज्ञान भी बताता है कि बच्चे देखकर सीखते हैं। घर का माहौल, माता-पिता का व्यवहार और रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें उनके व्यक्तित्व को आकार देती हैं। अगर घर में प्यार, सम्मान और समझ होगी, तो बच्चे भी वही सीखेंगे। अगर घर में हर समय गुस्सा, झगड़ा और अपमान होगा, तो उसका असर भी बच्चों पर पड़ेगा।
इसलिए बच्चों को बदलने से पहले हमें खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए। जब हम अपनी गलतियां स्वीकार करते हैं, दूसरों का सम्मान करते हैं और ईमानदारी से जीवन जीते हैं, तब हम बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा दे रहे होते हैं।
बच्चों के लिए सबसे बड़ी विरासत धन या संपत्ति नहीं, बल्कि हमारा चरित्र होता है। वे हमारी बहुत-सी बातें भूल सकते हैं, लेकिन हमारा व्यवहार कभी नहीं भूलते।’
