सना खान
एक गांव में दो व्यक्ति रहते थे। दोनों ने जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना किया था। पहले व्यक्ति के साथ सचमुच अन्याय हुआ था। उसे धोखा मिला, उसका नुकसान हुआ और कई बार उसे ऐसी मुश्किलों से गुजरना पड़ा जिनकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन उसने अपने दर्द को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उसने संघर्ष किया, गलतियों से सीखा और धीरे-धीरे अपने जीवन को फिर से खड़ा कर लिया। दूसरा व्यक्ति भी अपने साथ हुई घटनाओं का जिक्र करता रहता था। हर बातचीत में वही शिकायतें, वही दुख और वही आरोप होते थे। समय बीतता गया, लेकिन वह अपने अतीत से बाहर नहीं निकल पाया। गांव के लोग अक्सर उसे समझाने की कोशिश करते थे कि बीती बातों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन वह हर नई असफलता का कारण अपने पुराने दुखों को ही मानता था। धीरे-धीरे उसने कोशिश करना भी कम कर दिया। उसे लगने लगा कि दुनिया उसके खिलाफ है और अब कुछ बदल नहीं सकता।
वहीं पहला व्यक्ति हर मुश्किल के बाद खुद से एक ही सवाल पूछता था- ‘अब आगे क्या करना है?’ शायद इसी सोच ने उसे टूटने नहीं दिया।
एक दिन गांव के बुज़ुर्ग ने दोनों को बुलाया और पूछा, ‘तुम दोनों के साथ कठिनाइयां आईं, फिर रास्ते अलग क्यों हो गए?’ पहले व्यक्ति ने कहा, ‘मेरे साथ जो हुआ, वह मेरी गलती नहीं थी। लेकिन उसके बाद मैं क्या करता हूं, यह मेरी जिम्मेदारी थी।’
दूसरा व्यक्ति चुप रहा। शायद पहली बार उसने अपने भीतर झांककर देखा था। उसे एहसास हुआ कि उसके साथ जो हुआ, वह दुखद था, लेकिन वर्षों से वह उसी दर्द को अपनी पहचान बनाकर जी रहा था। बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, ‘पीड़ित होना एक परिस्थिति है, लेकिन पूरी जिंदगी खुद को केवल पीड़ित मानते रहना एक चुनाव बन सकता है।’ उनकी बात सुनकर वहां बैठे लोग सोच में पड़ गए।
जख्म मिले तो उनसे सबक लिया हमने,
गिरकर भी हर बार सफर किया हमने।
दर्द को अपनी पहचान बनने न दिया,
हालात से लड़कर खुद को निखारा हमने।
