मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: जजमेंट के साए में दबती पहचान

फलसफा: जजमेंट के साए में दबती पहचान

सना खान

-समाज इंसान को देखता है, काम को नहीं और यही नजरिया असमानता को जन्म देता है

हाल ही में कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ भेदभाव, असमान वेतन और उत्पीड़न को लेकर सामने आई विभिन्न रिपोर्टों ने एक बार फिर एक असहज सच को उजागर किया है कि समस्या केवल व्यवस्था की नहीं, बल्कि समाज के नजरिए की भी है।
रात के करीब दस बजे थे। दफ्तर की लाइटें एक-एक करके बुझ रही थीं।
नेहा जल्दी-जल्दी अपना बैग समेट रही थी। बाहर निकलते ही उसने फोन देखा कि मां का संदेश था, ‘इतनी देर तक काम मत किया करो लोग क्या कहेंगे?’ नेहा कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसी दफ्तर में उसका सहकर्मी रोहित अभी भी अपनी मेज पर बैठा था और उसे देखकर लोग कहते थे, ‘बहुत मेहनती है, आगे जाएगा।’ यहीं से शुरू होता है कि काम नहीं, नजरिए का फर्क। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, भारत में लगभग ४० प्रतिशत कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर भेदभाव का सामना करती हैं। कई अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि बड़ी संख्या में रिपोर्टों के अनुसार, ६० से ७० प्रतिशत तक महिलाएं कार्यस्थल पर किसी न किसी रूप में उत्पीड़न झेलती हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम इसकी शिकायत कर पाती हैं।
आर्थिक असमानता भी इस समस्या को और गहरा करती है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि लगभग एक-तिहाई महिलाओं को समान काम के बावजूद बराबर वेतन नहीं मिलता, जबकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय आकलनों के अनुसार, भारत में जेंडर पे गैप २० प्रतिशत से अधिक तक देखा गया है। लेकिन इन आंकड़ों से बड़ा सच यह है कि समस्या काम की नहीं, उस सोच की है जो काम को चरित्र से जोड़ देती है। समाज अक्सर काम को इज्जत या शर्म का पैमाना बना देता है। हम अवसर देने से पहले ही फैसला सुना देते हैं।
अध्ययन बताते हैं कि समाज अनजाने में ही पुरुषों को नेतृत्व और उच्च कौशल से जोड़ता है, जबकि महिलाओं को सीमित भूमिकाओं में देखने की आदत बना चुका है।
महानगरों में बढ़ती नाइट शिफ्ट और सेवा क्षेत्र की नौकरियों ने इस नजरिए की चुनौती को और स्पष्ट कर दिया है, जहां काम की जरूरत और समाज की सोच के बीच टकराव लगातार बढ़ रहा है। इस सोच का असर सिर्फ कार्यस्थल तक सीमित नहीं रहता। आंकड़े बताते हैं कि भारत में शहरी क्षेत्रों की बड़ी संख्या में महिलाएं कार्यबल से बाहर हैं, और इसकी प्रमुख वजह घरेलू जिम्मेदारियां हैं।
अगर महिला काम करे, तो सवाल उठते हैं। अगर न करे तो उसकी पहचान ही खो जाती है। यानी हर स्थिति में, उसका मूल्यांकन किसी और के नजरिए से तय होता है। यही ‘दाग’ है, जो केवल सोच नहीं, बल्कि अवसर, आत्मविश्वास और भविष्य-तीनों को प्रभावित करता है। जब तक हम काम के आधार पर इंसान को आंकते रहेंगे, तब तक बराबरी केवल कागजों तक सीमित रहेगी, जिंदगी में नहीं। असली सवाल आज भी वही है कि क्या हम किसी व्यक्ति को उसके काम से अलग, एक इंसान की तरह देखने के लिए तैयार हैं।

अन्य समाचार