मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: कुछ बच्चे बचपन में ही खामोश होना सीख जाते हैं

फलसफा: कुछ बच्चे बचपन में ही खामोश होना सीख जाते हैं

सना खान

कुछ बच्चे जन्म से खामोश नहीं होते, उन्हें धीरे-धीरे खामोश होना पड़ता है। जब हर बात पर उन्हें टोक दिया जाए, हर भावना को ‘ड्रामा’ कहा जाए, हर आंसू को कमजोरी समझ लिया जाए तो बच्चे अपनी बातें दिल में रखना सीख जाते हैं। फिर वो बोलना कम कर देते हैं। अपनी तकलीफ बताना छोड़ देते हैं, अपनी पसंद छुपाने लगते हैं और धीरे-धीरे अपनी भावनाओं से दूर होने लगते हैं। कुछ बच्चे घर के माहौल को देखकर बदल जाते हैं। कौन गुस्से में है, किस वक्त क्या कहना है, कब चुप रहना बेहतर होगा, ये सब वो उम्र से पहले समझने लगते हैं। धीरे-धीरे उनकी मासूमियत सतर्कता में बदल जाती है। फिर लोग कहते हैं, ‘ये बच्चा कितना समझदार है।’ लेकिन सच ये होता है कि वो बच्चा सिर्फ अपनी भावनाएं दबाना सीख चुका होता है। कुछ बच्चे रोते नहीं हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई समझेगा नहीं। कुछ बच्चे अपनी परेशानी इसलिए नहीं बताते, क्योंकि उन्हें डर होता है कि फिर उन्हें ही गलत ठहरा दिया जाएगा। धीरे-धीरे वो ‘मैं ठीक हूं’ कहना सीख जाते हैं। भले ही अंदर से बिल्कुल ठीक न हों। वो अपनी उदासी छुपा लेते हैं। अपने डर छुपा लेते हैं और फिर एक दिन अपनी असली भावनाएं भी छुपाना सीख जाते हैं और सबसे दर्दनाक बात ये है कि कई बार बच्चों की खामोशी को उनकी ‘अच्छी आदत’ समझ लिया जाता है। जबकि सच में वो अंदर ही अंदर बहुत-कुछ अकेले सह रहे होते हैं। फिर वही बच्चे बड़े होकर भी अपनी बात कहने से डरते हैं। हर रिश्ते में खुद को समझाने की कोशिश करते हैं और कई बार भीड़ में रहकर भी अंदर से अकेले महसूस करते हैं, क्योंकि बचपन में उन्होंने खुलकर जीना नहीं, सिर्फ चुप रहना सीखा होता है। कुछ लोग बड़े होकर भी जोर से बोलने वालों से डर जाते हैं। छोटी-सी नाराजगी से घबरा जाते हैं और हर वक्त दूसरों को नाराज न करने की कोशिश करते रहते हैं। क्योंकि उनके अंदर आज भी वही बच्चा मौजूद होता है, जिसने बचपन में अपनी आवाज दबा दी थी। बच्चों को हमेशा सलाह नहीं चाहिए होती, कई बार उन्हें सिर्फ एक सुरक्षित अपनापन चाहिए होता है। जहाँ वो बिना डर के
रो सकें, बोल सकें और खुद जैसे हैं वैसे रह सकें। क्योंकि कुछ बच्चे बचपन में सिर्फ खामोश नहीं होते, वो धीरे-धीरे अपने अंदर की आवाज खो देते हैं।
(अगर बचपन में उनकी मानसिक स्थिति को नजरअंदाज किया जाए तो वही दर्द, बड़े होकर बेचैनी, असुरक्षा और खामोशी बन जाता है। इसलिए बच्चों को सिर्फ सफल बनाना जरूरी नहीं, उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत और स्वस्थ बनाना भी उतना ही जरूरी है।)

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