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इस मुश्किल किरदार को निभाना वाकई चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसलिए मैंने राजकुमार की पीठ थपथपाई-एडवोकेट उज्जवल निकम

-मेरी बायोपिक में कुछ भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है

हमारे देश के प्रख्यात सरकारी वकील (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) उज्ज्वल निकम के जीवन और कार्यों पर आधारित जीवनी, मैडोक फिल्म्स के निर्माता दिनेश विजयन द्वारा निर्मित ‘प्रहार : द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ हाल ही में 16 अक्टूबर को रिलीज हुई और इसका निर्देशन अविनाश अरुण ने किया है। फिल्म ‘प्रहार ‘ में उज्ज्वल निकम का किरदार आज के जाने-माने अभिनेता राजकुमार राव ने निभाया है, जबकि उनकी पत्नी ज्योति उज्ज्वल निकम का किरदार वामिका गब्बी ने निभाया है। उभरते मराठी अभिनेता ललित प्रभाकर ने कुख्यात आतंकवादी अजमल कसाब का किरदार निभाया है। इस फिल्म को लेकर मिली-जुली भावनाएं हैं, जिनमें जिज्ञासा, झुंझलाहट और गुस्सा भी शामिल हैं।
फिल्म ‘प्रहार: उज्ज्वल निकम की अनकही कहानी’ के सिलसिले में उज्ज्वल निकम के आवास पर पूजा सामंत की उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

आपके जीवन और कार्यों पर आधारित फिल्म की योजना कब और कैसे बनी?
– पब्लिक प्रॉसीक्यूटर के रूप में मेरा काम पिछले 45 वर्षों से सच्चाई और निष्ठा के साथ से चल रहा है। मेरे कार्य-जीवन पर फिल्म बनाने के लिए इससे पहले, कुछ फिल्म निर्माताओं ने मुझसे संपर्क किया था, लेकिन वे परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पाईं, कभी वे फिल्मी लगती थीं, कभी उनमें सच्चाई की कमी होती थी। खैर, मुझे वह दिन आज भी याद है, ढाई साल हो गए हैं। मैडॉक फिल्म्स के दिनेश विजन मुझसे मिलना चाहते थे। हम मिले, निर्देशक अविनाश अरुण भी उनके साथ थे। उनकी बातचीत से मुझे समझ आया कि वे मुझ पर जीवनी लिखने की इच्छा रखते हैं। मैं आश्चर्यचकित हुआ, वास्तव में मैं हंस पड़ा। मैंने स्पष्ट रूप से कहा, जब इतने सारे फिल्मी लोग हैं तो आप मुझ पर जीवनी क्यों लिखना चाहते हैं? क्या फिल्मी लोगों की कमी है? उस समय उन्होंने कहा, ’26/11 देश पर, मुंबई पर एक भयानक हमला था। उन आतंकवादियों के खिलाफ आपने जो मानसिक लड़ाई लड़ी, वह अविस्मरणीय है। आपके उन वीरतापूर्ण प्रयासों के कारण ही अजमल कसाब को फांसी हुई। आपके कई केसेस प्रसिद्ध हो चुके हैं। आपने कई कठिन मामलों में आरोपियों को न्याय के कटघरे में सफलतापूर्वक खड़ा किया है।’ आपका जीवन प्रेरणादायक है। इसे जनता के सामने लाया जाना चाहिए।’ इसके बाद मैडॉक फिल्म कंपनी के दिनेश विजन, निर्देशक अविनाश अरुण और मैंने तीन-चार घंटे तक चर्चा की।
तब भी मैंने उनसे कहा, “26/11 पर भी फिल्में बन रही हैं। अगर आप सिर्फ मनोरंजन वाली फिल्में बनाने जा रहे हैं, जो हिंदी फिल्मों के लिए जरूरी है, तो मैं यह फिल्म नहीं करूंगा।” उन्होंने कहा कि सिर्फ सच ही सामने आएगा। दिनेश विजन ने कहा, “आप अपनी चिंताएं हम पर छोड़ दीजिए।” उन्होंने आगे आश्वासन दिया कि जब आपके मामले अदालत में चल रहे थे, तो उन सभी लोगों के नाम असली होंगे। क्योंकि हम एक सच्ची फिल्म बनाने जा रहे हैं। “मैंने उनकी (मैडॉक फिल्म्स की) बातों पर विश्वास किया।”

आपके किरदार के लिए राजकुमार राव को चुना गया था। क्या कोई और विकल्प भी था?
इसमें कोई शक नहीं कि राजकुमार राव एक बेहद प्रतिभाशाली और संवेदनशील अभिनेता हैं। उन्होंने अब तक जितनी भी बायोपिक फिल्में की हैं, उन सभी में उन्होंने दिल से काम किया है। ‘प्रहार’ में भी उन्होंने दिल से काम किया है। राजकुमार राव को चुनने से पहले आमिर खान को ‘प्रहार’ की कहानी सुनाई गई थी, मुझे मेरे किरदार के बारे में बताया गया था, फिर आमिर खान के साथ हमारी तीन-चार घंटे की बैठकें हुईं। उनके अनुसार, उन्हें ‘प्रहार’ की कहानी और मेरा किरदार पसंद आया, लेकिन इतनी लंबी बैठक के बाद आमिर खान ने कहा, ‘अगर मैं इस फिल्म को करूं तो आपको कम से कम चार-पांच साल इंतजार करना पड़ेगा।’
जैसा कि आमिर खान ने कहा, कोई भी अगले 4/5 साल तक इंतजार नहीं करना चाहता था।
आमिर खान परफेक्शनिस्ट हैं, अगर वक्त नहीं है तो पहले बता देते। आजकल 4-5 साल इंतजार करना आसान नहीं है! क्या आजकल जिंदगी की कोई गारंटी है?, लेकिन फिर उन्हें पहले ही बता देना चाहिए था कि उनके पास समय नहीं है। इसलिए जब आमिर खान ने ऐसा किया, तो निर्माता ने बाद में राजकुमार राव से संपर्क किया और उन्हें साइन करना संभव हो पाया।

राजकुमार राव ने आपके किरदार के साथ न्याय करने के लिए क्या-क्या तैयारियां कीं? इसमें आपकी क्या भूमिका थी?
जब मैं पहली बार राजकुमार राव से मिला तो मुझे एहसास हुआ कि वह एक बहुमुखी अभिनेता हैं, एक बेहतरीन इंसान हैं, और उन्होंने मेरे किरदार के साथ पूरा न्याय किया। ट्रेलर देखने के बाद मुझे एहसास हुआ कि राजकुमार एक दमदार अभिनेता हैं।
मुझे जानने के लिए, मेरी बॉडी लैंग्वेज, मेरी बोलने का तरीका, मेरी चाल-ढाल -मेरे हाव-भाव-राजकुमार ने कभी मेरे साथ घूमे-फिरे नहीं, हमारी मुलाकातें भी ज्यादा नहीं हुईं, लेकिन उन्होंने मेरे कई वीडियो और पॉडकास्ट देखे हैं। सबसे अहम बात यह है कि मेरी आवाज खास है, दमदार है, उसकी नकल करना मुश्किल है, लेकिन जब राजकुमार राव उज्ज्वल निकम बनकर स्क्रीन पर आते हैं, तो वो राजकुमार नहीं बल्कि उज्ज्वल निकम लगते हैं, ये उनकी काबिलियत है। सिर्फ वही जानते हैं कि मेरे किरदार को निभाने में उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। क्योंकि मेरा किरदार मेरी नकल नहीं है! अब फिल्म देखकर मुझे लगता है कि उनके लिए इस मुश्किल किरदार को निभाना वाकई चुनौतीपूर्ण रहा होगा। मैंने राजकुमार की पीठ थपथपाई, क्योंकि उन्होंने ऐसा किया।

क्या आपका निर्माता निर्देशक के साथ कभी मनमुटाव हुआ?
– कोई असहमति नहीं थी। निर्देशक अविनाश अरुण ने ‘मसान’, ‘मदारी’, ‘प्रीतम-पेड्रो’ जैसी कई परियोजनाओं के लिए छायांकन किया है। उन्होंने लोकप्रिय वेब सीरीज ‘पातालोक’ का निर्देशन भी किया है। एक अनुभवी और जानकार निर्देशक से असहमति भला क्या हो सकती है? वे अपना काम जानते हैं और मैं अपना! अविनाश अरुण एक मेहनती लेखक, निर्देशक और छायाकार हैं। इसके अलावा, मैडॉक फिल्म कंपनी एक प्रतिष्ठित कंपनी है। साथ ही मेरी बायोपिक में कुछ भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है। सिर्फ वास्तविकता ही मायने रखती है।

आपके करियर की शुरुआत को 45 साल हो चुके हैं। इस दौरान क्या आपने अपने पारिवारिक जीवन की उपेक्षा की है? आपके करियर की सफलता में आपकी पत्नी का कितना योगदान रहा है?
अपने करियर के दौरान, मुझे अपनी निजी जिंदगी को पीछे छोड़ना पड़ा, क्योंकि ड्यूटी बहुत जोखिम भरी, समय लेने वाली और अध्ययन की आवश्यकता वाली थी। मैंने आर्थर रोड जेल में 17 साल बिताए। मेरे परिवार और सांसारिक समस्याएं आती रहीं, जैसे हर घर में आती हैं। लेकिन मेरी पत्नी बहुत धैर्यवान और मजबूत हैं, उन्होंने सब कुछ संभाला। उन्होंने बच्चों को खुद पाला-पोसा और चूंकि हम संयुक्त परिवार हैं, इसलिए समस्याएं निजी स्तर पर नहीं रहतीं बल्कि पारिवारिक समस्याएं बन जाती हैं, पूरा परिवार उन्हें सुलझाने में हिस्सा लेता है। उस समय मेरा बेटा अनिकेत विदेश में पढ़ रहा था, मेरी बेटी शरवरी की शादी हो रही थी। एक बार मेरी पत्नी ज्योति को एक गंभीर बीमारी का पता चला और तत्काल और उचित इलाज की आवश्यकता थी। हालांकि, ऐसी आपात स्थितियों में भी मैं घर के लिए समय नहीं दे पाता था! ज्योति ने कभी शिकायत नहीं की, उनकी दृढ़ता, संयम के कारण सभी चुनौतियों का सामना किया गया। मुंबई हमले, बम विस्फोट जैसी घटनाओं में मुझे धमकी भरे फोन आते थे, मेरी पत्नी ज्योति मन ही मन डरी रहती थी, लेकिन उन्होंने कभी मेरे काम में बाधा नहीं डाली। उन्होंने मुझे कभी भी अपने काम से हतोत्साहित नहीं किया। मैं काम के सिलसिले में मुंबई में था, लेकिन ज्योति अपने परिवार के साथ जलगांव गई थी।
जीवन में एक समय ऐसा आया, जब मुझे एंजियोप्लास्टी करवानी पड़ी और कुछ दिनों तक जबरन आराम करना पड़ा। लेकिन ज्योति ने हमेशा इस दुनिया में मेरा साथ दिया, प्रकाश की ज्योति बनकर नहीं, बल्कि एक बड़ी मशाल बनकर। यह उसका मेरे प्रति ऐसा कर्ज है, जिसे किसी भी तरह चुकाया नहीं जा सकता। प्रेम का कर्ज जन्म-जन्मांतर तक बना रहता है।

आपने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में पैरवी की है, इनमें से कौन से मामले आपको सबसे ज्यादा परेशान करने वाले और तनावपूर्ण लगे?
यह कहना मुश्किल है कि कौन सा मामला आसान है और कौन सा जटिल। देश में आतंकवादी हमले हुए, अपराधियों को पुलिस ने पकड़ा, अदालत में केस दर्ज हुआ, लेकिन कानून के दायरे में उन्हें आरोपी साबित करना आसान नहीं है; इसके लिए दृढ़ता, देशभक्ति, संयम और लगन की जरूरत होती है। सीधे शब्दों में कहें तो मुंबई बम हमले में पहली बार आरडीएक्स का इस्तेमाल हुआ। कई निर्दोष नागरिकों ने अपनी जान गंवाई, उनके परिवार बेघर हो गए। बहुत ही भयावह घटनाएं। अजमल कसाब ने ऐसे भयानक नरसंहार को अंजाम दिया जैसे कोई खिलौना बंदूक चला रहा हो। निर्दोष मुंबईकर चींटियों की तरह मारे गए, पुलिसकर्मी, सैकड़ों लोग शहीद हो गए।
कैसेट किंग गुलशन कुमार मामला, प्रमोद महाजन मामला, अबू सलेम-प्रदीप जैन मामला, शक्ति मिल सामूहिक बलात्कार मामला, कोपर्डी बलात्कार-हत्या मामला और वर्तमान में चर्चित पुणे मामला केतन अग्रवाल। ऐसे कई मामले हैं, जिनमें मैंने सरकारी अभियोजक के रूप में काम करते हुए यह सुनिश्चित किया कि आरोपियों को कानून के अनुसार सजा मिले। इसका श्रेय केवल मुझे ही नहीं जाता। कई मामलों को सुलझाने में मुझे पुलिस और कई सहकर्मियों का बहुमूल्य सहयोग मिला। इसीलिए इन मामलों में हमने मिलकर संघर्ष किया।

26/11 के मुख्य आरोपी अजमल कसाब ने अदालत और पुलिस को खूब परेशान किया। कहा जाता है कि वह जेल में बिरयानी मांगता था। उसके इन कारनामों के बारे में आप क्या कहेंगे?
कसाब लगातार झूठ बोलता रहा… उसका रवैया ऐसा था जैसे ‘वो मैं नहीं’ था… उसे ज़िंदा रखना और उससे सच जानना हमारे देश की सुरक्षा के लिए जरूरी था। यहां भारतीय न्याय व्यवस्था, पुलिस, सरकारी वकील, सभी भारतीय जनता के गुस्से का शिकार हुए। कभी उसकी बिरयानी की झूठी कहानियां फैलाई जा रही थीं। कसाब और उसके साथी, जो सभी पाकिस्तानी आतंकवादी थे, हिंदू बनकर हमारे देश में घुस आए थे। फिर उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से मुंबई में अराजकता फैलाई। पकड़े जाने के बाद भी वो कई झूठ बोलता रहा। उसका एक झूठ ये था कि मैं मुंबई 26/11 को नहीं, बल्कि 6 नवंबर को आया था। उसने कहा कि वो जुहू चौपाटी और अमिताभ बच्चन के बंगले जाना चाहता था! उसे बॉलीवुड से बहुत लगाव था! अक्सर कसाब खुद को बेकसूर मानता था कि मेरे साथी ने फायरिंग की, मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं है। मुझे जहर दिया जा रहा है।’ कसाब लगातार झूठ पर झूठ बोलता रहा, लेकिन अंत में भारतीय न्याय व्यवस्था के हाथ में आ गया।
कसाब के बारे में कई झूठी बातें सामने आ रही हैं!

बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
सब लोग संजय दत्त को बाबा कहते हैं, सब उन्हें निर्दोष समझते हैं, मैंने उनसे कहा, संजय तुम अपराधी हो। मैंने उनका केस लड़ा, उन्हें सजा मिली बाद में जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने मेरा आदरपूर्वक अभिवादन किया। मेरे मन में भी किसी के प्रति कोई द्वेष, घृणा या तिरस्कार नहीं है! यह कारण नहीं है। मैं ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करता हूं, मैं कभी कोई चूक नहीं होने देता। अगर आरोप साबित होने के बाद कोई व्यक्ति दोषी पाया जाता है, तो मैं यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता हूं कि उसे कानून द्वारा निर्धारित सजा मिले।
गुलशन कुमार हत्याकांड में आरोपी संगीतकार नदीम विदेश भाग गया, वरना उसे भी सजा मिल जाती!

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