के.पी. मलिक
करीब एक दशक पहले भारत में हुआ सत्ता परिवर्तन कोई सामान्य चुनावी प्रक्रिया नहीं था, बल्कि वह एक सुनियोजित राजनीतिक नैरेटिव का परिणाम था। यह नैरेटिव ‘भ्रष्टाचार’ के नाम पर गढ़ा गया, पैâलाया गया और जनमानस में इस तरह बैठाया गया कि तत्कालीन निर्वाचित सरकार की वैधता ही संदेह के घेरे में आ गई और इस संदेह को विश्वास में तब्दील करने का काम तत्कालीन सरकार के कुछ आत्ममुग्ध मंत्रियों, नेताओं और अधिकारियों ने बखूबी किया। इस पूरी प्रक्रिया को यदि पीछे मुड़कर देखा जाए तो यह एक पटकथा जैसी प्रतीत होती है, जिसमें अलग-अलग भूमिकाएं निभाने वाले किरदार थे। मंच तय था, समय चुना गया था और अंत में सत्ता का हस्तांतरण हुआ।
घोटाला जो था ही नहीं!
इस कथित पटकथा का पहला किरदार तत्कालीन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय थे। २०१० में २जी स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर १.७६ लाख करोड़ रुपए के ‘अनुमानित नुकसान’ का आंकड़ा सामने लाया गया। यह आंकड़ा न तो वास्तविक नुकसान था और न ही न्यायिक रूप से सिद्ध, लेकिन मीडिया और राजनीति में इसे ‘घोटाले’ के रूप में स्थापित कर दिया गया। यहीं से भ्रष्टाचार का वह नैरेटिव शुरू हुआ, जिसने आगे चलकर पूरे राजनीतिक विमर्श को अपने कब्जे में ले लिया।
इसके बाद दूसरे अंक में रामलीला मैदान में आंदोलन का आगाज करते हुए मंचन का आयोजन किया गया और सफलतापूर्वक समापन किया गया। जाहिर है कि अन्ना हजारे के नेतृत्व में रामलीला मैदान को आंदोलन का केंद्र बनाया गया। ‘लोकपाल’ की मांग के नाम पर भूख-हड़ताल और जनआंदोलन का माहौल तैयार किया गया। आंदोलन का स्वर नैतिक था, लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव गहरा और दूरगामी साबित हुआ। किरण बेदी जैसी पूर्व नौकरशाह की सक्रिय भागीदारी ने आंदोलन को वैधता और मीडिया कवरेज दिलाई। जिससे आंदोलन को समर्थन, मजबूती और सफलता मिली।
उसके बाद तीसरे अंक में अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने आंदोलन का राजनीतिक अपहरण कर लिया और यहीं से अरविंद केजरीवाल का उदय होता है, जिन्होंने इस जनआंदोलन को धीरे-धीरे राजनीतिक दिशा दी। ‘भ्रष्टाचार विरोध’ का मंच बाद में एक राजनीतिक दल में तब्दील हो गया। इसी दौर में रामदेव ने ‘काले धन’ का मुद्दा जोड़कर आंदोलन को और विस्तार दिया। विदेशी बैंकों से पैसा लाने और हर नागरिक के खाते में रकम डालने जैसे दावे किए गए, जो बाद में खोखले जुमले साबित हुए। इसके बाद चौथे चरण में पुराने कानूनी दांवपेंच समझने वाले नेताओं ने न्यायिक हस्तक्षेप करते हुए पूरा राजनीतिक लाभ उठाया। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इन मुद्दों को सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचाया और अदालत ने प्रक्रियागत खामियों के आधार पर २जी स्पेक्ट्रम आवंटन रद्द किया, लेकिन बाद में २०१७ में विशेष अदालत ने स्पष्ट कहा कि कोई आपराधिक साजिश या भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं होता और सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया।
लोकतंत्र रसातल पर!
यही नहीं, न्यायिक प्रक्रिया के दौरान यह भी स्वीकार किया गया कि ‘अनुमानित नुकसान’ को घोटाले के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से टिकाऊ नहीं था और उसके बाद अंतिम चरण में सत्ता परिवर्तन होते ही इस पूरे माहौल का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला। ‘भ्रष्टाचार मुक्त शासन’ और ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के नारे के साथ २०१४ में सत्ता परिवर्तन हुआ। यह परिवर्तन केवल चुनावी जीत नहीं था, बल्कि जनमानस में स्थापित उस धारणा की परिणति थी कि पिछली सरकार नैतिक रूप से अयोग्य थी।
दिलचस्प यह है अब सत्ता परिवर्तन के बाद के दृश्य को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि समय बीतने के साथ इस पटकथा के लगभग सभी प्रमुख किरदार सत्ता या सुख-सुविधा वाले पदों पर पहुंच गए, सर्वप्रथम वैâग के पूर्व कर्ता-धर्ता विनोद राय को पद्म विभूषण मिला और बाद में महत्वपूर्ण संस्थागत जिम्मेदारियां। अन्ना हजारे जेड-प्लस सुरक्षा लेकर सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं और शांति के साथ शांत जीवन जी रहे हैं। जैसा कि आप जानते ही हैं कि किरण बेदी संवैधानिक पद पर काबिज हैं। वहीं काले धन की वापसी की वकालत करनेवाले योगगुरु रामदेव नोटबंदी जैसे निर्णयों के नैतिक समर्थक बने, जिनके वादे आज तक अधूरे भले हो लेकिन सरकार की कृपा से उनकी पतंजलि दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की कर रही है। हालांकि, आजकल सुब्रह्मण्यम स्वामी स्वयं को हाशिए पर पाते हुए अब उसी सत्ता के आलोचक हैं, जिसे स्थापित करने में उन्होंने कभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने के प्रबल संकेत दिए थे। जो इसके बाद इस पूरी प्रक्रिया के सबसे बड़े राजनीतिक लाभार्थी बनकर उभरे हैं।
बहरहाल, आखिरकार इस जबरदस्त सियासी पटकथा द्वारा गढ़े गए नैरेटिव की जीत और सत्य की हार हुई। मेरा यह लेख यह दावा कतई नहीं करता कि सब कुछ एक कमरे में बैठकर रचा गया षड्यंत्र था। लेकिन यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के नैरेटिव का रणनीतिक इस्तेमाल कर लोकतांत्रिक सत्ता को कमजोर किया गया और जब न्यायिक सत्य सामने आया, तब तक राजनीतिक उद्देश्य पूरा हो चुका था। आज जब पीछे मुड़कर देखा जाता है तो सवाल उठता है कि क्या देश को जो कहानी बताई और सुनाई गई, वह पूरी सच्चाई थी? या फिर सच्चाई से ज्यादा प्रभावी नैरेटिव ने लोकतंत्र की दिशा तय की? जाहिर है कि इतिहास अक्सर पैâसले सुनाता है, लेकिन बहुत देर से और तब तक सत्ता, सुविधाएं और पद सुरक्षित हाथों में पहुंच चुके होते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक हैं)
