के.पी. मलिक
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण स्वतंत्र भारत की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक घटनाओं में से एक माना गया। करोड़ों लोगों की आस्था से जु़ड़ी इस परियोजना को राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया और इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासनिक तंत्र तथा मंदिर प्रबंधन सभी को व्यापक श्रेय मिला। लेकिन अब जब मंदिर से जुड़े दान और वित्तीय प्रबंधन को लेकर गंभीर आरोपों तथा जांच की खबरें सामने आ रही हैं, तो एक नया और असहज प्रश्न भारतीय जनमानस के सामने उपस्थित हो गया है, यदि उपलब्धि का श्रेय शीर्ष नेतृत्व तक जाता है, तो क्या किसी संभावित अनियमितता की जवाबदेही केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रह सकती है?
लोकतांत्रिक शासन और सार्वजनिक संस्थाओं का सबसे बुनियादी सिद्धांत यही है कि अधिकार और जवाबदेही एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते। जिस व्यवस्था में सफलता का राजनीतिक और प्रशासनिक श्रेय शीर्ष स्तर तक पहुंचता है, वहां किसी विफलता या कथित अनियमितता की जांच भी केवल सबसे निचले पायदान पर रुक जानी चाहिए, यह तर्क स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आता है। इस विवाद में सबसे अधिक चर्चा उस कथित तथ्य की हो रही है कि कई महीनों का सीसीटीवी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो सवाल सिर्फ तकनीकी चूक का नहीं रह जाता। यह निगरानी तंत्र, वित्तीय नियंत्रण और संस्थागत जवाबदेही से जुड़ा विषय बन जाता है। किसी भी ऐसी संस्था में जहां करोड़ों रुपए का दान प्रतिदिन प्राप्त होता हो, वहां निगरानी और रिकॉर्ड संरक्षण केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास की अनिवार्य शर्त होती है।
यही कारण है कि जांच का केंद्र केवल यह नहीं होना चाहिए कि धन का दुरुपयोग हुआ या नहीं, बल्कि यह भी होना चाहिए कि यदि निगरानी व्यवस्था में कोई कमी थी तो वह वैâसे और क्यों उत्पन्न हुई? लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थागत विफलता का मूल्यांकन केवल अंतिम कड़ी को देखकर नहीं किया जाता; पूरी शृंंखला की जांच की जाती है। इस पूरे प्रकरण का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक विमर्श है। देश में अक्सर यह देखा गया है कि किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता को शीर्ष नेतृत्व की दूरदर्शिता और इच्छाशक्ति से जोड़ा जाता है। यह राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन उसी तर्क का दूसरा पक्ष भी मौजूद है। यदि किसी परियोजना से जुड़ी संस्था में गंभीर आरोप सामने आते हैं, तो जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि निगरानी, नियुक्ति, नियंत्रण और जवाबदेही की अंतिम जिम्मेदारी किसकी थी।
इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी आरोप के आधार पर बिना प्रमाण किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहरा दिया जाए। लोकतंत्र में दोष निर्धारित करने का अधिकार जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया का है। लेकिन जवाबदेही पर प्रश्न उठाना और संस्थागत समीक्षा की मांग करना नागरिक समाज का वैध अधिकार है। दरअसल, इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वित्तीय अनियमितता का आरोप नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास का सवाल है। राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है; यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में वहां आने वाले प्रत्येक दान, प्रत्येक वित्तीय प्रक्रिया और प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय पर सामान्य सरकारी संस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है।
यदि जांच केवल कुछ कर्मचारियों की भूमिका तक सीमित रहती है, तो यह धारणा बन सकती है कि व्यवस्था स्वयं की समीक्षा करने से बच रही है। वहीं यदि जांच संस्थागत प्रक्रियाओं, निगरानी तंत्र, प्रशासनिक नियंत्रण और जवाबदेही की पूरी शृंखला का निष्पक्ष मूल्यांकन करती है, तो इससे न केवल सत्य सामने आएगा बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा। भारतीय लोकतंत्र में एक पुरानी कहावत है कि ‘श्रेय सामूहिक हो सकता है, लेकिन जवाबदेही व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों होती है।’ यही सिद्धांत किसी भी सार्वजनिक संस्था पर लागू होना चाहिए, चाहे वह सरकार हो, ट्रस्ट हो, धार्मिक संस्था हो या निजी संगठन।
बहरहाल, इस विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कथित अनियमितता किसने की। उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारी संस्थाएं ऐसी हैं, जो किसी भी स्तर पर हुई गलती को पहचान सकें, उसकी निष्पक्ष जांच कर सकें और जवाबदेही सुनिश्चित कर सकें? क्योंकि आस्था का सबसे बड़ा आधार केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि विश्वास भी होता है और विश्वास तभी मजबूत होता है जब व्यवस्था यह दिखाए कि उसके लिए कोई भी व्यक्ति, पद या संस्था प्रश्नों से ऊपर नहीं है। राम मंदिर से जुड़ा यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल वित्तीय प्रबंधन का मामला नहीं बल्कि भारत में सार्वजनिक जवाबदेही की संस्कृति की परीक्षा भी है। यदि श्रेय ऊपर तक जाता है, तो कम-से-कम जवाबदेही पर उठने वाले प्रश्नों को भी ऊपर तक जाने से नहीं रोका जाना चाहिए।
(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)
