मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : क्या भाजपा में आंतरिक असंतोष ला सकता है विद्रोह?

पॉलिटिका : क्या भाजपा में आंतरिक असंतोष ला सकता है विद्रोह?

के.पी. मलिक
भारतीय जनता पार्टी लंबे समय तक ‘वैâडर आधारित, वैचारिक और अनुशासित’ पार्टी के रूप में जानी जाती रही है। लेकिन आज वही पार्टी भीतर ही भीतर ऐसे असंतोष से घिरी दिख रही है, जिसे अब दबाना मुश्किल होता जा रहा है। वरिष्ठ नेताओं की लगातार अनदेखी, जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार करना और पैराशूट नेताओं को सत्ता और टिकट सौंपने की नीति ने संगठन के भीतर गहरी दरार पैदा कर दी है। नागपुर और इंदौर जैसे संगठनात्मक रूप से मजबूत माने जानेवाले शहरों में जो संकेत सामने आ रहे हैं, वे मामूली असहमति नहीं, बल्कि संभावित बगावत की भूमिका हैं। नागपुर में टिकट न मिलने से नाराज ८० से अधिक पुराने कार्यकर्ताओं का इस्तीफा देना और कई का स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी का अंदरूनी असंतोष अब खुलकर बाहर आ रहा है।
केंद्रीकरण बनाम संगठन
मोदी–शाह की अत्यधिक केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया भाजपा की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती रही है, लेकिन अब वही मॉडल पार्टी के लिए बोझ बनता दिख रहा है। स्थानीय नेतृत्व को दरकिनार कर दिल्ली या भोपाल से पैâसले थोपे जा रहे हैं। इंदौर के दूषित जल संकट के दौरान स्थानीय भाजपा नेताओं की अनदेखी और ऊपर से आए आदेशों ने यह साफ कर दिया कि जमीनी अनुभव और क्षेत्रीय समझ को अब कोई महत्व नहीं दिया जा रहा। यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है, यह संगठनात्मक अपमान है। जब वर्षों से पार्टी खड़ी करनेवाले कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया जाता है और बाहर से आए नेताओं को बड़े पद सौंपे जाते हैं, तो असंतोष स्वाभाविक है। यही कारण है कि इंदौर में ‘भाजपा बनाम भाजपा’ की हिंसक झड़पें तक देखने को मिलीं, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए खतरनाक संकेत हैं।
बड़े राज्यों में बढ़ती गुटबाजी
भारतीय राजनीतिक रूप से दो बड़े महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे निर्णायक राज्यों में पार्टी की आंतरिक गुटबाजी अब छिपी नहीं है। पार्टी जिसका खामियाजा लोकसभा चुनाव में भुगत चुकी है। यही कारण है कि प्रदेश में एनडीए के छोटे क्षेत्रीय दल भी उसको चुनौती दे रहे हैं। भाजपा का यहां संगठन और सत्ता के बीच टकराव, टिकट वितरण में पक्षपात और नेतृत्व को लेकर असंतोष लगातार गहराता जा रहा है। ये वही राज्य हैं जो भाजपा की चुनावी रीढ़ रहे हैं। यदि यहां संगठन कमजोर हुआ तो उसका सीधा असर २०२७ के विधानसभा चुनावों और आगे की राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा।
संघ की चुप्पी: रणनीति या मजबूरी?
इस पूरे परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। अब तक संघ ने पार्टी की आंतरिक कलह पर अपेक्षाकृत चुप्पी साध रखी है। पश्चिम बंगाल में फूट पर निगरानी की खबरें जरूर हैं, लेकिन देशव्यापी असंतोष पर कोई ठोस हस्तक्षेप दिखाई नहीं देता। अतीत में संघ मोदी-शाह की एकाधिकारपूर्ण शैली पर परोक्ष रूप से सवाल उठाता रहा है, लेकिन २०२६ के चुनावों से पहले उसकी यह चुप्पी या तो रणनीतिक है या फिर संगठनात्मक कमजोरी का संकेत। दोनों ही स्थितियां भाजपा के लिए शुभ नहीं हैं।
वैचारिक संकट की ओर बढ़ती पार्टी
जिस भाजपा को कभी नैतिकता, सिद्धांत और आंतरिक लोकतंत्र की मिसाल माना जाता था, आज वही पार्टी उन मूल्यों से भटकती हुई दिखाई देती है। दो व्यक्तियों के इशारों पर चलने वाला संगठन धीरे-धीरे अपने वैचारिक आधार और कार्यकर्ता संस्कृति को खोता जा रहा है। पुराने नेताओं और समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा पार्टी के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है। इतिहास गवाह है कि अत्यधिक केंद्रीकरण किसी भी राजनीतिक दल को अंतत: वैचारिक खोखलेपन और चुनावी नुकसान की ओर ले जाता है। भाजपा भी इस नियम से अलग नहीं है।
आज भाजपा को आत्ममंथन और व्यापक आंतरिक परामर्श की सबसे अधिक आवश्यकता है। यदि नेतृत्व ने जमीनी आवाजों को नहीं सुना, संगठन को केवल आदेश मानने वाली मशीन बनाए रखा और असंतोष को अहंकार से दबाने की कोशिश की, तो बगावत केवल संभावना नहीं, अपरिहार्यता बन जाएगी। भाजपा के सामने विकल्प साफ है कि या तो संगठन को साथ लेकर चले या फिर टूटते संगठन के साथ सत्ता बचाने की जद्दोजहद करे। समय तेजी से निकल रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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