मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : आर्थिक आपातकाल की ओर बढ़ रहा है देश?

पॉलिटिका : आर्थिक आपातकाल की ओर बढ़ रहा है देश?

के.पी. मलिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया ८-सूत्रीय अपील ने देश में नई बहस छेड़ दी है। पेट्रोल-डीजल बचाने, विदेशी यात्राओं से बचने, सोना न खरीदने और फिजूलखर्ची रोकने जैसी अपीलों को सरकार जहां ‘राष्ट्रहित में जनसहभागिता’ बता रही है, वहीं कई अर्थशास्त्री, किसान नेता और राजनीतिक विश्लेषक इसे आने वाले बड़े आर्थिक संकट का संकेत मान रहे हैं। किसान और राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेंद्र सिंह का दावा है कि जब सरकार जनता से इस तरह की अपीलें करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि आर्थिक दबाव सामान्य सीमा से बाहर जा चुका है।
आर्थिक असंतुलन!
दरअसल, किसी भी सरकार द्वारा र्इंधन बचाने या सोने की खरीद रोकने की सलाह तब दी जाती है, जब विदेशी मुद्रा भंडार, आयात बिल और आर्थिक संतुलन पर गंभीर दबाव बनने लगे। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध, खासकर मिडिल ईस्ट में तनाव, तेल की कीमतों को तेजी से बढ़ा देता है। इससे सरकार का आयात खर्च बढ़ता है, रुपया कमजोर होता है और महंगाई नियंत्रण से बाहर जाने लगती है। यही कारण है कि सरकार जनता से पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील कर रही है, ताकि आयात बिल कम किया जा सके।
सोने को लेकर सरकार की चिंता भी साधारण नहीं है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा सोना खरीदने वाले देशों में शामिल है। जब लोग बड़ी मात्रा में सोना खरीदते हैं तो विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा बाहर चला जाता है। आर्थिक अस्थिरता के दौर में लोग बैंक, शेयर बाजार और मुद्रा पर भरोसा कम करके सोने में निवेश बढ़ाते हैं। इसलिए यदि सरकार खुले तौर पर ‘सोना मत खरीदिए’ जैसी अपील कर रही है तो यह इस बात का संकेत माना जा सकता है कि विदेशी मुद्रा भंडार और वित्तीय संतुलन को लेकर भीतर कहीं गंभीर चिंता मौजूद है। हालांकि, सवाल यह भी है कि क्या यह संकट केवल वैश्विक परिस्थितियों की देन है? इसका उत्तर पूरी तरह ‘हां’ नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों से कई आंतरिक समस्याओं से भी जूझ रही है। बेरोजगारी लगातार बढ़ी है, ग्रामीण आय कमजोर हुई है, किसानों की लागत बढ़ी हैं, लेकिन आमदनी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। छोटे उद्योग नोटबंदी, महामारी और जीएसटी के बाद पूरी तरह उबर नहीं पाए। सरकारी आंकड़े भले विकास दर दिखा रहे हों, लेकिन बाजार में मांग कमजोर है। यही वजह है कि सरकार अब बचत और संयम की भाषा बोलती नजर आ रही है।
आर्थिक चेतावनी!
सबसे अधिक दबाव गांव और किसान पर दिखाई देता है। डीजल महंगा होने का सीधा असर खेती पर पड़ता है। ट्रैक्टर, सिंचाई, खाद ढुलाई और मंडी तक परिवहन सब कुछ महंगा हो जाता है। जब किसान की लागत बढ़ती है और फसल का उचित दाम नहीं मिलता तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होने लगती है। यही कारण है कि आज गांवों में खरीद क्षमता घट रही है और बाजारों में मंदी का असर दिख रहा है।
लेकिन केवल डर पैदा करना समाधान नहीं है। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, रोजगार आधारित आर्थिक मॉडल पर जोर देना होगा। केवल बड़े कॉर्पोरेट निवेश से अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती, बल्कि छोटे उद्योग, कृषि और ग्रामीण बाजारों को मजबूत करना जरूरी है। दूसरा, पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम कर जनता को राहत देनी होगी, क्योंकि ऊंचे र्इंधन मूल्य पूरे बाजार में महंगाई पैâलाते हैं। तीसरा, कृषि क्षेत्र में लागत कम करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देने जैसे कदम किसानों की क्रयशक्ति बढ़ा सकते हैं।
इसके अलावा सरकार को विदेशी निवेश और निर्यात बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करना होगा। सोना खरीदने से रोकने के बजाय जनता का भरोसा बैंकिंग और आर्थिक व्यवस्था में मजबूत करना अधिक जरूरी है। यदि लोग भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करेंगे तो वे स्वाभाविक रूप से सोने और नकद बचत की ओर भागेंगे।
असल चिंता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। जब सरकार लगातार त्याग और बचत की अपील करने लगे तो जनता के मन में भय पैदा होता है कि शायद हालात उतने सामान्य नहीं हैं जितना बताए जा रहे हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री की इस अपील को कई लोग ‘आर्थिक चेतावनी’ के रूप में देख रहे हैं। आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि यह केवल एहतियाती सलाह थी या वास्तव में देश किसी बड़े आर्थिक दबाव की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन इतना तय है कि केवल भाषणों और अपीलों से अर्थव्यवस्था नहीं संभलती। जनता को भरोसा, रोजगार, स्थिर बाजार और पारदर्शी आर्थिक नीति चाहिए। वही किसी भी संकट से बाहर निकलने का सबसे बड़ा रास्ता होता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

अन्य समाचार