के.पी. मलिक
देश में चुनावी पारदर्शिता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। दिल्ली में कल चुनाव आयोग ने १२ राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) लागू करने की घोषणा की। आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया योग्य मतदाताओं को शामिल करने और अयोग्य को हटाने की नियमित कवायद है। पर सवाल यह है कि क्या यह वाकई इतनी निष्पक्ष और व्यवस्थित है, जितना आयोग दावा कर रहा है? या फिर यह किसी बड़े राजनीतिक समीकरण की भूमिका तैयार की जा रही है?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए चुनाव आयोग द्वारा चलाया गया एक विशेष अभियान है, जिसका उद्देश्य डुप्लीकेट, मृत, प्रवासित और अवैध मतदाताओं को सूची से हटाना है। अक्टूबर २०२५ में चुनाव आयोग ने इसके दूसरे चरण की शुरुआत १२ राज्यों में की है, जिनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, केरल आदि शामिल हैं। इस प्रक्रिया के तहत बूथ स्तर के अधिकारी घर-घर जाकर फॉर्म वितरित करेंगे और योग्य मतदाताओं को सूची में बनाए रखेंगे तथा अयोग्य मतदाताओं को बाहर करेंगे। चुनाव आयोग के मुताबिक, असम जैसे राज्यों के लिए नागरिकता कानून में अलग प्रावधान होने के कारण वहां एसआईआर के लिए अलग निर्देश जारी किए जाएंगे और वहां की वोटर लिस्ट का संशोधन अलग होगा।
शुद्धिकरण के नाम पर
इसके बावजूद, विपक्षी दल विशेष रूप से कांग्रेस ने इस एसआईआर प्रक्रिया पर कड़ा हमला किया है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग सरकार के नियंत्रण में है और यह प्रक्रिया वोट चोरी का खेल है। बिहार के पहले चरण के दौरान करीब ६९ लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि एसआईआर के माध्यम से वोटर लिस्ट में व्यापक कटौती की जा रही है, जिससे राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास हो रहा है। कांग्रेस ने यह सवाल उठाया है कि एसआईआर में अवैध घुसपैठियों के आंकड़े चुनाव आयोग क्यों जुटा नहीं रहा है, जबकि यह मुद्दा भाजपा द्वारा बिहार में बड़े राजनीतिक इस्तेमाल के लिए उठाया गया था। विपक्ष यह भी सवाल करता है कि क्यों असम में एसआईआर अलग से है और महाराष्ट्र में भी क्यों। विपक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य साफ नहीं है और यह राजनीतिक दबाव में की जा रही है जबकि सुप्रीम कोर्ट में भी विवाद जारी है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इस प्रक्रिया का समर्थन करते हुए कहा है कि एसआईआर वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण जरूरी है और घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से बाहर होने चाहिए। लेकिन विपक्ष का कहना है कि जब तक घुसपैठियों की संख्या स्पष्ट रूप से नहीं बताई जाती, तब तक एसआईआर की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे। चुनाव आयोग ने इस बार यह भी कहा कि वोटर लिस्ट प्रâीज हो जाएगी और एसआईआर के दौरान केवल वैध मतदाता ही सूची में रहेंगे।
संदेह बरकरार!
दरअसल, अगर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के मुद्दे को विस्तार से समझने की कोशिश करें तो यह पहली बार नहीं है देश में चुनाव आयोग ने अब तक ९ बार एसआईआर जैसी प्रक्रिया की है, जो नियमित वार्षिक सूची संशोधन से अलग और ज्यादा गहन होता है। बिहार में पहले फेज में इस प्रक्रिया में भारी विवाद हुआ, जहां लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर व्यापक सवाल उठे। विपक्ष का कहना है कि वोटर सूची के नाम हटाने में पारदर्शिता नहीं है और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद आयोग पूरी जानकारी नहीं दे रहा। विपक्ष ने बिहार के मामले को लेकर फर्जी मतदाता, डुप्लीकेट नाम और राजनीतिक हितों के लिए वोटर लिस्ट छेड़छाड़ का आरोप लगाया। चुनाव आयोग के मुताबिक, असम के लिए नागरिकता कानून अलग है, इसलिए वहां एसआईआर पर अलग आदेश जारी किए जाएंगे और चुनाव आयोग का कहना है कि वहां की स्थिति अलग तरीके से संभाली जाएगी। जबकि विपक्ष ने एसआईआर प्रक्रिया को जल्दबाजी और राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित बताया है, साथ ही महाराष्ट्र और असम जैसे राज्यों में इसकी अनिश्चित स्थिति पर सवाल उठाए हैं। बहरहाल, इस प्रकार एसआईआर वोटर लिस्ट शुद्धिकरण का एक महत्त्वपूर्ण कदम है, मगर इसे लेकर विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग की निष्पक्षता और आंकड़ों की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग और सरकार के द्वारा घुसपैठियों को बाहर करने की बात करना। केवल वोट हासिल करने का जरिया भर है क्योंकि घुसपैठियों के स्पष्ट आंकड़े न देने से इस प्रक्रिया में संशय बना हुआ है, जो आगामी चुनावों की संवेदनशीलता को और बढ़ा रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
