मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: विपक्ष को तोड़ते-तोड़ते कांग्रेस के लिए रास्ता साफ!

रुख-ए-सियासत: विपक्ष को तोड़ते-तोड़ते कांग्रेस के लिए रास्ता साफ!

तौसीफ कुरैशी

२०२४ के बाद विपक्षी राजनीति के भीतर एक बड़ा विमर्श यह था कि भाजपा के मुकाबले सबसे प्रभावी चेहरा कौन है। एक वर्ग लगातार यह प्रचारित कर रहा था कि केवल ममता बनर्जी ही नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकती हैं।
भारतीय राजनीति का एक पुराना नियम है सत्ता जब अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करने निकलती है तो कई बार अनजाने में किसी बड़े प्रतिद्वंद्वी को मजबूत भी कर देती है। आज की राजनीति को देखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि पश्चिम बंगाल और तृणमूल कांग्रेस के साथ जो कुछ हुआ है, उसका असर भी कुछ ऐसा ही हो सकता है। भाजपा पर आरोप लगते रहे हैं कि वह चुनावी मशीनरी, केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक दबावों के सहारे विपक्षी दलों को कमजोर करती है जिसको सही समझा जाता है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की स्थिति को लेकर भी ऐसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। विधायकों और सांसदों के दल-बदल को लेकर विपक्ष लगातार कहता रहा है कि यह केवल वैचारिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता की ताकत, एजेंसियों के दबाव और संसाधनों के इस्तेमाल का परिणाम है और यही सही है।
लेकिन राजनीति केवल घटनाओं से नहीं, उनके परिणामों से भी तय होती है। २०२४ के बाद विपक्षी राजनीति के भीतर एक बड़ा विमर्श यह था कि भाजपा के मुकाबले सबसे प्रभावी चेहरा कौन है। एक वर्ग लगातार यह प्रचारित कर रहा था कि केवल ममता बनर्जी ही नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकती हैं। कई टीवी स्टूडियो, अनेक राजनीतिक विश्लेषक और कुछ विपक्षी दल भी इसी स्वर में बोलते दिखाई देते थे। कांग्रेस को सलाह दी जाती थी कि वह नेतृत्व की दावेदारी छोड़ दे और विपक्ष की कमान किसी दूसरे हाथ में सौंप दे।
यहीं से विपक्ष के भीतर एक संभावित टकराव की जमीन तैयार हो रही थी। अगर तृणमूल कांग्रेस अपनी पूरी ताकत और राजनीतिक प्रभाव के साथ इंडिया गठबंधन के भीतर मौजूद रहती, तो संभव था कि नेतृत्व का सवाल सबसे बड़ा विवाद बन जाता। कांग्रेस को लगातार रक्षात्मक मुद्रा में रहना पड़ता। उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भी यह संदेश जाता कि पार्टी स्वयं अपने नेतृत्व को लेकर आश्वस्त नहीं है। आज स्थिति अलग दिखाई देती है। विपक्षी राजनीति में नेतृत्व को लेकर पहले जैसी अस्पष्टता नहीं है। कांग्रेस, चाहे उसकी ताकत सीमित हो या व्यापक, गठबंधन के केंद्र में दिखाई देती है। नेतृत्व का प्रश्न अब उतना विवादास्पद नहीं रहा जितना कुछ समय पहले था।
राजनीति का यही व्यंग्य है। जो कदम विपक्ष को बिखेरने के लिए उठाए गए बताए जाते हैं, वे कहीं न कहीं विपक्ष के भीतर मौजूद नेतृत्व संबंधी भ्रम को भी कम कर गए। भाजपा ने शायद यह सोचकर चाल चली होगी कि एक क्षेत्रीय शक्ति कमजोर होगी, लेकिन उसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय विपक्ष की धुरी और स्पष्ट होती दिखाई दे रही है। यही कारण है कि कुछ लोग तंज में कहते हैं, ‘मोदी है तो मुमकिन है।’
विपक्ष को कमजोर करने की कोशिश में अगर कांग्रेस के लिए रास्ता और साफ हो जाए तो भारतीय राजनीति के इस विडंबनापूर्ण अध्याय को इसी वाक्य में सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है।
सत्यमेव जयते

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