तौसीफ कुरैशी
राजनीति में शब्दों का अपना महत्व है, लेकिन कई बार चुप्पी सबसे लंबा भाषण बन जाती है। दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय के बाहर जो हुआ, वह किसी प्रेस कॉन्प्रâेंस से कम नहीं था। फर्क सिर्फ इतना था कि एक नेता बोल रहा था और दूसरा मौन था। राजनीति का अनुभवी दर्शक जानता है कि जब शब्द और खामोशी आमने-सामने खड़े हों, तो असली कहानी अक्सर खामोशी ही लिखती है। चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा एक ही गाड़ी से पहुंचे थे। इससे पहले दोनों रणदीप सिंह सुरजेवाला के घर भी साथ गए। फिर के.सी. वेणुगोपाल से मुलाकात हुई। सब कुछ साथ-साथ हुआ, लेकिन बैठक के बाद जैसे ही कांग्रेस मुख्यालय का दरवाजा खुला, दोनों की राजनीतिक यात्राएं अलग-अलग दिखाई देने लगीं। चन्नी के चेहरे पर संतोष था। वह रुके, मुस्कुराए और बोले जननायक `राहुल गांधी हमारे नेता हैं। उनके लिए जीना है, उनके लिए ही मरना है। पार्टी का पैâसला सर्वोपरि है।’ यह केवल निष्ठा का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि पंजाब कांग्रेस को दिया गया एक स्पष्ट संदेश था कि अब व्यक्तिगत नाराजगी से ऊपर संगठन खड़ा है। दूसरी तरफ रंधावा थे। बैठक से पहले मीडिया से खुलकर बात करने वाले रंधावा, बैठक के बाद बिना कुछ कहे निकल गए। राजनीति में यह बदलाव यूं ही नहीं आता। यह तब आता है जब भीतर की बातचीत बाहर के शब्दों को रोक देती है। कभी-कभी नेतृत्व का एक पैâसला पूरे राजनीतिक गणित को बदल देता है। कांग्रेस लंबे समय से पंजाब में गुटों के बीच उलझी रही है। कभी मुख्यमंत्री का सवाल, कभी प्रदेश अध्यक्ष का, कभी नेतृत्व का। जनता इन झगड़ों को देखती रही और विपक्ष मुस्कुराता रहा। लेकिन शायद अब कांग्रेस नेतृत्व समझ चुका है कि पंजाब में चुनाव केवल चेहरों से नहीं, भरोसे से जीते जाएंगे। और भरोसा तब बनता है, जब नेता अपने-अपने शिविरों से निकलकर पार्टी के मंच पर लौटते हैं। जननायक राहुल गांधी की सामाजिक न्याय की राजनीति का सबसे बड़ा असर यही दिखाई देता है कि कार्यकर्ता अब व्यक्ति से अधिक विचार की बात करने लगे हैं। पंजाब में भी संकेत यही हैं कि वोटर स्थानीय गुटबाजी से ऊब चुका है। वह स्थिर नेतृत्व और स्पष्ट दिशा चाहता है। इसलिए जो नेता इस बदलाव को समझ रहे हैं, वे सहज दिखाई दे रहे हैं। जो अभी भी पुराने समीकरणों में उलझे हैं, उनकी भाषा खामोशी बनती जा रही है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि पंजाब कांग्रेस की सारी दरारें भर गई हैं। राजनीति में दरारें एक बैठक से नहीं भरतीं। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि हाईकमान ने यह संदेश दे दिया है कि पार्टी व्यक्ति से बड़ी है और यह वास्तविकता भी है, लेकिन नेता यह भूल जाते है कि पार्टी तुमसे बड़ी है।
जो इस संदेश को समझेगा, वह आगे चलेगा। जो नहीं समझेगा, उसकी राजनीति धीरे-धीरे हाशिये पर चली जाएगी। राजनीति में चेहरे झूठ नहीं बोलते। दिल्ली में उस दिन भी दो चेहरे थे। एक पर मुस्कान थी, दूसरे पर मौन। और कभी-कभी लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही होती है कि कौन बोला नहीं। पंजाब की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है। गुटबाजी की आग धीमी पड़ती है या फिर दोबारा भड़कती है, इसका पैâसला आने वाला समय करेगा। लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि जननायक राहुल गांधी के नेतृत्व ने कम से कम इतना तो कर दिया है कि विरोध के स्वर धीमे पड़ने लगे हैं और खामोशी स्वयं एक राजनीतिक संदेश बन गई है। पंजाब सहित देशभर में सियासी हालात कांग्रेस के अनुकूल बनते जा रहे हैं और नेताप्रतिपक्ष राहुल गांधी का मजबूती से लड़ाई लड़ना माना जा रहा है।
सत्यमेव जयते
