मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : कैसे मिलेगी ‘सेंधमार’ राजनीति को चुनौती?

प्रणवाक्षर : कैसे मिलेगी ‘सेंधमार’ राजनीति को चुनौती?

प्रणव प्रियदर्शी

आम आदमी पार्टी में पड़ी ताजा फूट ने ठीक ही, एक बार फिर बीजेपी की ‘सेंधमार’ राजनीति को बहस के केंद्र में ला दिया है। चाहे महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी जैसे दलों को तोड़ने की बात हो या बिहार में जेडीयू जैसे पुराने सहयोगी दल के नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर करके इस पद पर कब्जा जमाने की, सहयोगियों और विरोधियों की पीठ में छुरा घोंपना जैसे मौजूदा बीजेपी नेतृत्व की सफलता का मूलमंत्र बन गया है।
जानी-पहचानी दलील
इस आलोचना के जवाब में बीजेपी समर्थकों की जानी-पहचानी दलील यह होती है कि क्या पहले कभी देश में दल-बदल करवाने या विरोधी दलों में फूट डालने की घटनाएं नहीं हुई हैं? बेशक हुई हैं, लेकिन एक तो यह कि इक्का-दुक्का हुई घटना और किसी पार्टी का एक फॉर्मूले की तरह सेंधमारी का लगातार इस्तेमाल करना दो अलग बातें हैं। दूसरे, अतीत में दल-बदल में प्राय: प्रलोभन की ही भूमिका होती थी। बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व ने जिस तरह से केंद्रीय एजेंसियों के बेहूदा इस्तेमाल को इसका जरिया बनाया है, वह एक नई बात है। राघव चड्ढा की जगह सदन में आम आदमी पार्टी के उपनेता बनाए गए अशोक मित्तल के कार्यालयों पर पिछले दिनों पड़े छापे इस आरोप को मजबूती देते हैं कि उन्हें दल-बदल के लिए मजबूर करने के मकसद से ही ये छापे मारे गए थे।
फूट से उपजा सवाल
बहरहाल, कल तक जो केजरीवाल हर उपलब्ध मंच से यह दावा करते नहीं थकते थे कि बीजेपी का ‘ऑपरेशन लोटस’ बाकी दलों के मामले में भले कामयाब होता रहा हो, आम आदमी पार्टी के मामले में बेअसर साबित हुआ है। आज उनके पास कहने को कुछ रह नहीं गया है। चूंकि पार्टी में फूट न पड़ने को वे अपनी पूरी पार्टी की ईमानदारी का सबूत बताते रहे हैं इसलिए अब उन्हें इस सवाल से टकराना ही होगा कि क्या इस फूट ने उनकी पूरी पार्टी की बेईमान और पाखंडी प्रकृति को उजागर कर दिया है?
पार्टी की कार्य-प्रणाली
इसी क्रम में हमें यह भी समझना होगा कि एक समय में पार्टी का मुख्य आधार माने जानेवाले नेताओं और सांसदों का इस तरह अचानक धुर विरोधी पार्टी से जा मिलना, बीजेपी की कुटिलता का सबूत भले हो, केवल उसका परिणाम नहीं है। बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व के सिर पूरा दोष मढ़कर हम सारे सवालों के जवाब नहीं पा सकते। निश्चित रूप से यह प्रकरण आम आदमी पार्टी के नेतृत्व की सोच, उसकी कार्य-प्रणाली और करीबी सहयोगियों के मूल्यांकन के लिए तय की गई कसौटियों पर भी रोशनी डालता है।
दावे और वादे
इस पहलू पर विचार करें तो यह स्पष्ट होता है कि पहले दिन से अरविंद केजरीवाल विरोधियों के कामकाज को परखने की ऊंची कसौटी देते रहे और खुद उन कसौटियों पर खरा उतरने का दावा तथा वादा करते रहे, लेकिन जब भी मौका आया, उस दावे और वादे से पलटने में देर नहीं लगाई। चाहे सवाल चुनावी राजनीति की गंदगी को निशाना बनाते हुए खुद हमेशा राजनीति से दूर रहने की घोषणा का हो या तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर भ्रष्टाचार के संगीन (और निराधार) आरोप लगाने का, चाहे जन लोकपाल बनाने की प्रतिबद्धता का हो या लालबत्ती की गाड़ियों तथा बड़े बंगलों से तौबा करने का– केजरीवाल का रिकॉर्ड ऐसे लगभग हर मामले में फिसड्डी साबित हुआ।
करियरिस्ट तत्वों को जगह
यहां तक कि विरोध के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का हरसंभव तरीके से इस्तेमाल करते हुए भी उन्होंने पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खास जगह नहीं रहने दी। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव सरीखे वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध और परिपक्व व्यक्तित्वों को वे बर्दाश्त नहीं कर सके। इनकी जगह उन मध्यवर्गीय ‘करियरिस्ट’ तत्वों को जगह दी, जो बातें भले बड़ी-बड़ी करें लेकिन जिनकी कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं थी और इसलिए जो केजरीवाल के ‘मनमाने’ फैसलों का विरोध करने की सैद्धांतिक जरूरत की ओर से उदासीन हो सकते थे।
बेहतर विकल्प
सवाल यह है कि क्या बीजेपी जैसी कथित फासीवादी पार्टी और उसके वैसे ही नेतृत्व का सामना आप वैचारिक प्रतिबद्धता के बगैर कर सकते हैं? मुद्दा केवल एक दलबदल का या उसमें शामिल नेताओं की संख्या का नहीं, राजनीति और नेतृत्व की उस शैली का है, जिसे दल-बदल की इस घटना ने रेखांकित कर दिया है। आज सत्ता में बैठे सिद्धांतहीन, बेशर्म और अलोकतांत्रिक तत्वों का मुकाबला करने मैदान में उतरी ताकतों को सोचना होगा कि क्या खुद को बेहतर विकल्प साबित किए बगैर वे अपने इस अभियान में सफल हो पाएंगे?
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

 

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