प्रणव प्रियदर्शी
कहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न स्थायी दुश्मन, स्थायी बस हित होते हैं। इसी आधार पर कूटनीति के लिए यह ठोस कसौटी तय कर दी गई है कि इसमें बस एक चीज मायने रखती है और वह है राष्ट्रीय हित।
बदलता नजरिया
इन बातों पर हालांकि व्यापक सहमति है, फिर भी देश की आजादी के बाद से ही देखें तो इस पूरे दौर में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप या कम से कम उसे देखने का हमारा नजरिया लगातार बदलता रहा है। आजादी के बाद जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहरलाल नेहरू दो गुटों में बंटती दुनिया के बीच एक निरपेक्ष आवाज बुलंद कर रहे थे, तब भी उनकी नजर में राष्ट्रीय हित की ही कसौटी थी। जब इंदिरा गांधी ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन में बने रहते हुए भी सोवियत संघ से दोस्ती की राह अपनाई तो वहां भी राष्ट्रीय हितों का नजरिया ही प्रमुख था। ऐसे ही चाहे नब्बे के दशक के बाद बदलते वैश्विक हालात में पश्चिमी देशों से बढ़ती करीबी हो या अब ईरान में अमेरिकी और इजरायली कार्रवाई के दौरान दिखा कथित एकतरफा रवैया, इसके लिए भी तर्क राष्ट्रीय हितों का ही दिया जा रहा है।
मनचाही व्याख्या
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह राष्ट्रीय हित है क्या बला? क्या यह कोई ऐसी चीज है जिसका अपना कोई वजूद, अपना कोई अर्थ और स्वरूप नहीं और जो पूरी तरह व्याख्याओं पर ही निर्भर करती है? इसकी मनचाही व्याख्या के जरिए एक ही समय में आप पूरब की ओर भी जा सकते हैं और चाहें तो पश्चिम की तरफ भी? भले अटपटा लगता हो, लेकिन काफी हद तक यह बात सही है। हित चाहे व्यक्तिगत हो या सामाजिक या फिर राष्ट्रीय इसका मतलब काफी कुछ हमारी अपनी समझ, दृष्टि और मूल्यों पर निर्भर करता है। राष्ट्र के संदर्भ में यह उस समय के नेतृत्व की विश्वदृष्टि पर निर्भर करता है।
शास्त्री जी की मिसाल
लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्रित्व काल में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान जब अमेरिका ने गेहूं का आयात रोकने की धमकी दी तो राष्ट्र हित का वास्ता देते हुए उस समय की सरकार अमेरिका के सामने झुकने का पैâसला भी कर सकती थी। लेकिन शास्त्री जी ने राष्ट्रीय स्वाभिमान को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए देशवासियों से एक वक्त का भोजन छोड़ने की अपील कर दी और अमेरिका के सामने डटे रहे। उन्होंने इस बात को समझा कि अगर देश का स्वाभिमान नहीं बचा तो कुछ नहीं बचेगा। इसलिए भूखे रहकर भी स्वाभिमान की रक्षा करना राष्ट्रहित में जरूरी है।
मूल्य आधारित नीति
जिस नेतृत्व की विश्व दृष्टि में बराबरी, बंधुत्व, न्याय और लोकतंत्र जैसे मूल्यों की कीमत होती है, वह दुनिया में इन मूल्यों को बढ़ावा देने, इनके लिए संघर्ष को समर्थन देने की भावना को अपनी नीति का आधार बनाता है और उसे राष्ट्रीय हित के अनुरूप समझता है। आखिर किसी देश का हित इस सवाल से बिल्कुल अलग कैसे हो सकता है कि यह दुनिया कैसे चलती है, इसमें विभिन्न देशों के बीच किस तरह के संबंध बनते और मजबूत होते हैं?
नेतृत्व की विश्वदृष्टि
जाहिर है, किसी देश की विदेश नीति सबसे ज्यादा तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की विश्वदृष्टि पर निर्भर करती है। भारत में अगर छिटपुट अपवादों को छोड़कर अभी तक विदेश नीति से जुड़े बड़े मसलों पर राजनीतिक सर्वसम्मति बनी रही है तो इसके पीछे यह तथ्य है कि आजादी के लंबे संघर्ष के दौरान उभरे जीवन मूल्यों में राजनीति की सभी धाराओं का विश्वास रहा है। पहली बार कोई ऐसी धारा सत्ता पर काबिज हुई जो इन सर्वस्वीकार्य मूल्यों के साथ असहज महसूस करती है और अपनी असहजता को छिपाने का भी कोई खास प्रयास नहीं करती।
सरकार से अलग
यही वजह है कि विपक्ष की सबसे सम्मानित और सबसे कद्दावर नेता के रूप में सोनिया गांधी ने ईरान पर अमेरिका और इजरायली के हमले को लेकर भारत सरकार के रुख की सार्वजनिक तौर पर तीखी आलोचना करते हुए अखबार में लेख लिखा। संभवत: यह पहला मौका था जब अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मामले में विपक्ष ने इतने स्पष्ट और इतने प्रखर तरीके से सरकार के आधिकारिक रुख के खिलाफ स्टैंड लिया और इसका नतीजा भी तब सामने आ गया, जब ईरान ने कुछ भारतीय जहाजों को होर्मुज से गुजरने की इजाजत देते हुए इस तर्क का सहारा लिया कि भारत सरकार का रुख जो भी हो, भारत के लोगों ने उसके प्रति दोस्ती और समर्थन दिखाया है और, दो दिन पहले एक बार फिर सोनिया गांधी ने गाजा के मामले में भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत राष्ट्र की चेतना यह मांग करती है कि फलस्तीनी भाइयों, बहनों और बच्चों पर हो रही क्रूरता का विरोध किया जाए।
अंतरात्मा की आवाज
आम तौर पर यह निर्वाचित नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है कि वह मौका आने पर देश की अंतरात्मा की आवाज बने, लेकिन सत्तारूढ़ नेतृत्व इस मामले में नाकाम रहा और आज की तारीख में यह भूमिका विपक्षी नेता सोनिया गांधी निभा रही हैं। निश्चित रूप से इस तथ्य ने सोनिया गांधी का कद बहुत ऊंचा कर दिया है।
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)
