मुख्यपृष्ठस्तंभकैमरे में कैद प्रोटेस्टर, जेल के अपराधी... किसका `जंतर', किसका `मंतर?'

कैमरे में कैद प्रोटेस्टर, जेल के अपराधी… किसका `जंतर’, किसका `मंतर?’

-दिल्ली पुलिस के फेस रिकग्निशन सिस्टम व सरकार की नीयत पर बड़ा सवाल
२,८७३ लोगों को बताया आपराधिक पृष्ठभूमि वाला, जांच में कम से कम २५ निकले जेल के अंदर
-किसने और क्यों लिखी थी छात्रों के आंदोलन को ‘अपराधियों की भीड़’ साबिकरने की पटकथा?

नई दिल्ली। सीजेपी के आंदोलन को लेकर दिल्ली पुलिस की बहुचर्चित ‘२,८७३ आपराधिक तत्वों’ वाली थ्योरी अब गंभीर सवालों के घेरे में है। जिस फेस रिकग्निशन तकनीक के सहारे प्रदर्शन स्थल पर कथित आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हजारों लोगों को पहचानने का दावा किया गया था, उसी सिस्टम ने ऐसे लोगों को भी जंतर-मंतर की भीड़ में ‘पहचान’ लिया जो उस समय जेल की सलाखों के पीछे थे। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच में पुलिस, जेल और अदालत के रिकॉर्ड खंगालने पर कम-से-कम २५ ऐसे व्यक्तियों का पता चला, जिन्हें फेस रिकग्निशन प्रणाली ने सीजेपी प्रदर्शन में मौजूद बताया, जबकि संबंधित समय वे जेल में बंद थे। इनमें हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार और बच्चों के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामलों के आरोपी शामिल बताए गए हैं।
सबसे चौंकाने वाला मामला प्रताप सिंह सिसोदिया का है। सिसोदिया पर वर्ष २०१४ में १३ वर्षीय उत्कर्ष के अपहरण और हत्या का आरोप लगा था और रिकॉर्ड के मुताबिक, वह लंबे समय से हिरासत में है। इसके बावजूद चेहरे-पहचान सॉफ्टवेयर ने उसे २० से २६ जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन में मौजूद लोगों में चिह्नित कर दिया। यानी सवाल सीधा है, जो आदमी जेल में था, वह वैâमरे की नजर में आंदोलनकारी वैâसे बन गया?
जांच में गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के कथित सहयोगी योगेश का मामला भी सामने आया। वह जिम मालिक नादिर शाह की हत्या के मामले में गिरफ्तारी के बाद जेल में था, लेकिन सिस्टम ने कथित तौर पर उसे भी प्रदर्शन स्थल पर पहचान लिया। यह खुलासा इसलिए बेहद गंभीर है क्योंकि जुलाई के आंदोलन के बाद पुलिस सूत्रों के हवाले से दावा किया गया था कि २,८७३ लोगों की पहचान हुई, जिनमें ९८९ का संबंध गंभीर आपराधिक मामलों से था।
हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार, लूट और हथियारों से जुड़े मामलों के आंकड़े भी सामने रखे गए। इससे देशभर में यह धारणा बनी कि छात्रों और युवाओं के आंदोलन में बड़ी संख्या में अपराधी घुस आए थे। अब यही दावा उल्टा सवाल बनकर खड़ा है, यदि जेल में बैठे लोग भी सूची में शामिल हो गए, तो बाकी २,८७३ पहचानों की विश्वसनीयता कितनी है?
यहीं से एक और ज्यादा गंभीर राजनीतिक सवाल जन्म लेता है। क्या बिना पूरी तरह सत्यापन किए ऐसे विस्फोटक आंकड़ों को सार्वजनिक विमर्श में आने देना आंदोलन को अपराधी रंग देने का माध्यम बना? क्या शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन को बदनाम करने वाला नैरेटिव ऐसी तकनीकी सूची के सहारे तैयार हुआ जिसकी विश्वसनीयता अब खुद संदेह में है? इससे भी आगे एक आशंका यह व्यक्त की जा रही है कि कहीं कुछ आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को जानबूझकर आंदोलन के आसपास पहुंचाकर पूरी भीड़ को बदनाम करने की कोई रणनीति तो नहीं बनाई गई थी। फिलहाल इसका कोई सार्वजनिक और ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है, इसलिए इसे स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन ऐसी आशंका की निष्पक्ष जांच जरूरी है। कौन वास्तव में आंदोलन में आया, किसके कहने पर आया और क्या किसी राजनीतिक या प्रशासनिक व्यक्ति की इसमें कोई भूमिका थी?
दिल्ली पुलिस ने स्वयं कहा है कि चेहरे-पहचान प्रणाली का मिलान अंतिम प्रमाण नहीं है और किसी कार्रवाई से पहले ‘फील्ड वेरिफिकेशन’ किया जाएगा। यही स्वीकारोक्ति बताती है कि मशीन का मिलान किसी व्यक्ति की वास्तविक मौजूदगी सिद्ध नहीं करता। मामला इसलिए और संवेदनशील है क्योंकि दिल्ली पुलिस बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंची और जुलाई के प्रदर्शनों से जुड़ी १३ एफआईआर खत्म करने की मांग की। साथ ही २,८७३ कथित आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की भूमिका की जांच के लिए अलग एफआईआर की मंशा भी जताई गई। अब जरूरत है कि पूरी २,८७३ नामों वाली सूची का स्वतंत्र ऑडिट हो। कौन सचमुच जंतर-मंतर पर था और कौन केवल सॉफ्टवेयर की ‘आंखों’ से वहां पहुंचा दिया गया? और सबसे बड़ा सवाल, क्या लोकतांत्रिक आंदोलन की छवि किसी ऐसे एल्गोरिदम के भरोसे तय की जा सकती है जो जेल में बंद आदमी को भी सड़क पर प्रदर्शन करते हुए ‘देख’ ले?

अन्य समाचार