मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स : शिवपुर विधानसभा... उलझता समीकरण... राजभर बनाम राजभर

पूर्वांचल पॉलिटिक्स : शिवपुर विधानसभा… उलझता समीकरण… राजभर बनाम राजभर

हिमांशु राज

वाराणसी की शिवपुर विधानसभा सीट अब सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि पूर्वांचल की राजभर राजनीति का सबसे बड़ा प्रयोगशाला बन चुकी है। २०२२ में यहां हुआ ‘राजभर बनाम राजभर’ का मुकाबला पूरे उत्तर प्रदेश की चर्चा का केंद्र बना था, और २०२७ की तैयारी उसी समीकरण के इर्द-गिर्द घूम रही है।
२०२२ के नतीजे आज भी इस सीट की राजनीतिक दिशा तय कर रहे हैं। भाजपा के अनिल राजभर ने १,१५,२३१ मत पाकर लगभग ४६ प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि गठबंधन प्रत्याशी अरविंद राजभर को ८७,५४४ मत मिले थे। जीत का अंतर २७,६८७ मतों का रहा। तीसरे नंबर पर रहे बसपा के रवि मौर्य को ४०,६०१ मत मिले, जिसने विपक्षी वोटों के बिखराव को साफ दिखाया। यही बिखराव अनिल राजभर की जीत का सबसे बड़ा सहारा बना।
अनिल राजभर का दबदबा आज भी बरकरार है। वे लगातार दो बार से यहां के विधायक हैं, योगी सरकार में वैâबिनेट मंत्री हैं और संगठन से लेकर प्रशासन तक उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। राजभर समाज में उनकी व्यक्तिगत पहुंच, मंत्री पद से मिलने वाली योजनाओं की छवि और भाजपा का व्यापक सामाजिक समीकरण उन्हें २०२७ में भी शुरुआती फेवरेट बनाता है। भाजपा के लिए शिवपुर एक ऐसा गढ़ है, जहां संगठनात्मक ताकत और सत्ता का लाभ एक साथ काम करता है।
लेकिन यह सीट अब ‘सुरक्षित’ नहीं कही जा सकती। २०२२ में हार के बावजूद अरविंद राजभर ने ३५ प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर यह साबित किया कि उनका अपना जनाधार है। वे सिर्फ ओम प्रकाश राजभर के पुत्र नहीं, बल्कि सुभासपा की युवा पीढ़ी के चेहरे के रूप में उभरे हैं। सुभासपा ने एनडीए से शिवपुर समेत कई सीटों पर अपने प्रत्याशी की मांग रखी है, और यही मांग इस सीट का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन गई है।
अगर भाजपा-सुभासपा गठबंधन में समझौता होता है और अरविंद राजभर को एनडीए से मौका मिलता है, तो मुकाबला एक बार फिर सीधा और बेहद कड़ा हो जाएगा। तब राजभर मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा दो मजबूत उम्मीदवारों के बीच बंटेगा। ऐसी स्थिति में मंत्री पद और संगठन की ताकत के बावजूद अनिल राजभर के लिए रास्ता आसान नहीं होगा, क्योंकि मुकाबला पार्टी बनाम पार्टी नहीं, बल्कि समाज के भीतर की लड़ाई बन जाएगा।
वहीं, अगर अरविंद राजभर विपक्षी गठबंधन से चुनाव लड़ते हैं, तो समीकरण बदल जाएगा। तब भाजपा का वोट बैंक अपेक्षाकृत एकजुट रहेगा और अनिल राजभर को सत्ता व संगठन का पूरा लाभ मिलेगा। हालांकि, अगर सपा, कांग्रेस और बसपा का समर्थन किसी एक चेहरे पर एकजुट हो गया, तो अरविंद की स्थिति मजबूत हो सकती है। २०२२ में विपक्षी बिखराव ने भाजपा को फायदा पहुंचाया था, २०२७ में वही बिखराव निर्णायक होगा या एकजुटता, यही देखना है।

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