मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : ममता बनाम केंद्र नैरेटिव की राजनीति के दांवपेच...!

तरकश : ममता बनाम केंद्र नैरेटिव की राजनीति के दांवपेच…!

डॉ. अनिता राठौर

ईडी की कार्रवाई के बीच ममता बनर्जी ने जिस तरह टीएमसी के आईटी सेल में घुसकर जरूरी फाइलें पुलिस के संरक्षण में ले गर्इं, वह व्यक्तिगत दुस्साहस भर नहीं है, वह प्रदेश के चुनावों में बाजी मारने के लिए येन-केन-प्रकारेण गढ़ा जा रहा सियासी नैरेटिव है, जिसमें जीत-हार का अनुमान दांव पर है। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर से तीखे टकराव के दौर में आ गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के आईटी सेल कार्यालय में पहुंचना, पुलिस सुरक्षा में कुछ फाइलों का वहां से हटाया जाना और इसके बाद केंद्र पर ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ के आरोप – ये घटनाएं महज एक प्रशासनिक या भावनात्मक प्रतिक्रिया भर नहीं हैं। ये सब दांवपेच आनेवाले विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में गढ़े जा रहे एक सुसंगठित राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा हैं, जिसमें टकराव, पीड़ितबोध और अस्मिता की राजनीति एक-दूसरे में घुलती दिखती है। वास्तव में यह लेख इसी सवाल की पड़ताल करता है कि क्या ममता बनर्जी का यह दुस्साहस व्यक्तिगत आवेग है या फिर चुनावी बाजी पलटने के लिए सोची-समझी रणनीति? और क्या केंद्र की एजेंसियों की कार्रवाई केवल कानून के दायरे में है या समय और अपने तरीके से वह कोई राजनीतिक संदेश भी देती है?
ईडी की कार्रवाई और राजनीति का संदर्भ
पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय जांच एजेंसियों – खासकर प्रवर्तन निदेशालय की सक्रियता विपक्ष-शासित राज्यों में कुछ ज्यादा ही बढ़ी है। पश्चिम बंगाल में भी यह नई बात नहीं है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, राशन वितरण से जुड़े आरोप – इन सब मामलों में टीएमसी से जुड़े नेताओं की गिरफ्तारी या पूछताछ हुई है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि यह कानून का स्वाभाविक रास्ता है; विपक्ष का आरोप है कि एजेंसियां केंद्र के राजनीतिक दबाव में काम कर रही हैं।
इसी पृष्ठभूमि में जब गुजरे ८ जनवरी, २०२६ को ईडी की टीम कोलकाता में पॉलिटिकल कंसल्टेंट फर्म आई-पैक के डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर में जबरन घुसी, जो कि टीएमसी के आईटी सेल के प्रमुख भी हैं और वहां कथित कोयला घोटाले से जुड़े दस्तावेज तलाशने लगी, तभी राज्य पुलिस के साथ बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वहां पहुंचती हैं तथा ईडी के मुताबिक कई फिजिकल डॉक्यूमेंट्स और इलेक्ट्रानिक डिवाइसेस ले गर्इं। इसके बाद ममता आई-पैक के साल्ट लेक स्थित ऑफिस परिसर भी पहुंचती हैं और वहां से भी कई अहम सबूत पुलिस की मदद से उठा ले गर्इं। इससे ममता बनर्जी ने संदेश देने की कोशिश की है, ‘मुख्यमंत्री अपने लोगों के साथ खड़ी हैं’ और ‘केंद्र की एजेंसियां राज्य की स्वायत्तता पर हमला कर रही हैं।’ जबकि ईडी ने कोलकाता हाई कोर्ट में ममता बनर्जी की इस हरकत के खिलाफ दरवाजा खटखटाया है, इस आरोप के साथ कि ममता सबूतों से छेड़छाड़ कर रही हैं।
कानून बनाम प्रतीक
राजनीति में प्रतीकों की बड़ी भूमिका होती है। ममता बनर्जी सड़क पर धरना देनेवाली नेता रही हैं; मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने जनांदोलन की शैली छोड़ी नहीं। आईटी सेल में प्रवेश कर फाइलें हटाने का कदम – कानूनी दृष्टि से भले ही विवादास्पद हो – राजनीतिक दृष्टि से उनके पुराने व्यक्तित्व के अनुरूप है। उनके समर्थकों के लिए यह साहस है, विपक्ष के लिए कानून व्यवस्था में हस्तक्षेप। लेकिन चुनावी राजनीति में संदेश सरल रखा जाता है: ‘केंद्र अन्याय कर रहा है और ममता उसका सामना कर रही हैं।’ यह वही नैरेटिव है जिसने २०२१ के विधानसभा चुनावों में उन्हें बड़ी जीत दिलाई थी – दिल्ली बनाम कोलकाता, बाहरी ताकत बनाम बंगाल की अस्मिता।
‘षड्यंत्र’ का आरोप और अस्मिता की राजनीति
ममता बनर्जी ने केंद्र पर आरोप लगाया कि ईडी की कार्रवाई चुनाव से पहले राज्य सरकार को बदनाम करने की साजिश है। इस आरोप का तथ्यात्मक मूल्यांकन अलग विषय है, लेकिन राजनीतिक असर स्पष्ट है। बंगाल में ‘बाहरी हस्तक्षेप’ का विचार ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील रहा है – चाहे वह भाषा, संस्कृति या सत्ता का सवाल हो या फिर केंद्रीय एजेंसियों द्वारा घोटालों की जांच। ऐसे मौकों में तृणमूल कांग्रेस हमेशा खुद को बंगाल की आवाज के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि भारतीय जनता पार्टी को ‘केंद्र की पार्टी’ के रूप में। षड्यंत्र का आरोप इसी द्वंद्व को तेज करता है। तथ्य चाहे जो हों, राजनीतिक नैरेटिव भावनाओं पर टिका होता है और ममता इसे भली-भांति समझती हैं।
केंद्र की रणनीति
केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों का कहना है कि वे कानून के अनुसार काम कर रही हैं। यह तर्क सैद्धांतिक रूप से सही भी हो सकता है। लेकिन राजनीति में ‘कब’ और ‘वैâसे’ उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना ‘क्या’। चुनाव से ठीक पहले की गई कार्रवाई, बार-बार विपक्षी नेताओं को निशाना बनाना – इनसे संदेह तो पैदा होता ही है कि कानून के साथ-साथ केंद्र द्वारा राजनीतिक लाभ भी साधा जा रहा है। यह स्थिति केंद्र के लिए भी जोखिम भरी है। अगर कार्रवाई ठोस सबूतों और निष्पक्ष प्रक्रिया से जुड़ी दिखे, तो उसका नैतिक बल बढ़ता है। लेकिन यदि वह प्रतिशोध की तरह प्रस्तुत होती है, तो विपक्ष को पीड़ित बनने का मौका मिलता है – और ममता जैसी नेता उस मौके को नैरेटिव में बदलने में माहिर हैं।
चुनावी गणित और संभावित असर
आगामी विधानसभा चुनावों में बंगाल की राजनीति तीन ध्रुवों में सिमटती दिखती है – टीएमसी, भाजपा और वाम-कांग्रेस गठबंधन। टीएमसी की रणनीति स्पष्ट है: केंद्र के खिलाफ संघर्ष, बंगाल की अस्मिता और ममता की व्यक्तिगत दृढ़ता। ईडी प्रकरण इस रणनीति को धार देता है। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे को वैâसे विश्वसनीय बनाए, बिना यह दिखे कि वह केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। अगर मतदाता यह मान लेते हैं कि कार्रवाई राजनीति-प्रेरित है, तो सहानुभूति टीएमसी की ओर जा सकती है।
अंत में लोकतंत्र की कसौटी
ममता बनर्जी का यह दुस्साहस केवल एक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र में सत्ता-संघर्ष की गहरी तस्वीर है। एक तरफ कानून और संस्थाओं की विश्वसनीयता का प्रश्न है, दूसरी तरफ चुनी हुई सरकार और केंद्र के बीच टकराव। लोकतंत्र में जांच एजेंसियों को स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए और निर्वाचित नेताओं को कानून के दायरे में रहकर विरोध दर्ज कराना चाहिए। लेकिन राजनीति अक्सर आदर्शों से नहीं, बल्कि यथार्थ से चलती है। बंगाल में यह यथार्थ नैरेटिव की लड़ाई है- जहां हर कार्रवाई, हर बयान और हर प्रतीक चुनावी गणित को प्रभावित करता है। बहरहाल, अंतिम पैâसला मतदाता करेगा। ऐसे में सवाल यह है क्या वह इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती मानेगा या बंगाल की अस्मिता पर हमला? यही वह प्रश्न है, जिस पर आगामी चुनावों की दिशा और दशा तय होगी।
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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