सैयद सलमान मुंबई
केरल हाई कोर्ट का हालिया पैâसला तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम है। जस्टिस कौसर एदाप्पगाथ ने अपने निर्णय में कुरआन की सूरह अल-बकरह की आयत २४१ का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया है कि तलाक के बाद भी पूर्व पति पर पूर्व पत्नी के लिए भरण-पोषण का उचित इंतजाम करना धार्मिक और कानूनी, दोनों दृष्टियों से अनिवार्य है। यह पैâसला कानून की व्याख्या के साथ-साथ, इस्लाम की मूल भावना ‘इंसाफ, करुणा और सामाजिक सुरक्षा’ को भी कायदे से रेखांकित करता है।
कुरआन की यह आयत साफ शब्दों में कहती है कि तलाकशुदा महिलाओं के लिए भी सम्मानजनक जीवन-निर्वाह की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसे किसी एकमुश्त भुगतान या औपचारिक दायित्व तक सीमित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसी आधार पर पालक्कड़ पैâमिली कोर्ट के वर्ष २०१२ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-१२५ के तहत भरण-पोषण से इनकार कर दिया गया था। उस आदेश का तर्क यह था कि पति ने इद्दत के दौरान भरण-पोषण और ‘मताह’ की एकमुश्त राशि दे दी थी, इसलिए आगे कोई जिम्मेदारी शेष नहीं रहती। हाई कोर्ट ने इस सोच को न्याय के विरुद्ध बताया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम महिला, तलाक पर अधिकारों का संरक्षण अधिनियम, १९८६ केवल औपचारिक या प्रतीकात्मक कानून नहीं है। यह एक दूरगामी और कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य तलाक के बाद महिलाओं की आजीविका और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ‘उचित और न्यायसंगत प्रावधान’ का अर्थ सिर्फ एक बार की रकम देना नहीं है। उसके लिए महिला के भविष्य की आवश्यकताओं जैसे कि भोजन, आवास, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के लिए समुचित व्यवस्था भी करना है।
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि महिला की उम्र तलाक के समय महज १७ वर्ष थी। ऐसे में एक लाख रुपए को आजीवन भरण-पोषण मान लेना न केवल अव्यावहारिक था, बल्कि न्याय की भावना के भी खिलाफ था। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पति यह दावा करता है कि उसने अपने धार्मिक और कानूनी दायित्व पूरे कर दिए हैं, तो उसे यह साबित करना होगा कि महिला आत्मनिर्भर है और अपनी आजीविका स्वयं चला सकती है। दायित्व से बचने के लिए सामान्य दावे पर्याप्त नहीं होंगे।
अब यह पैâसला मुस्लिम समाज में व्यापक बहस का कारण बन गया है। एक तरफ कुछ परंपरावादी उलेमा और मौलवी इसे पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप बताकर चुनौती देने की बात कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर प्रगतिशील और संवेदनशील वर्ग इसे कुरआन की वास्तविक शिक्षा के अनुरूप मान रहा है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि जब कुरआन स्वयं महिलाओं के अधिकारों की बात करता है, तो फिर उनके हक में आए पैâसले का विरोध क्यों? इसका तर्कपूर्ण जवाब किसी उलेमा के पास नहीं है।
वास्तव में कुरआन महिलाओं के सशक्तीकरण पर विशेष बल देता है। मीरास (विरासत), नान-नफका (भरण-पोषण), इद्दत और सामाजिक सुरक्षा इत्यादि इस्लामी व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं। दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ कुछ संकीर्ण व्याख्याओं और मनगढ़ंत फतवों ने इस व्यापक दृष्टि को सीमित कर दिया है। कई बार धार्मिक ग्रंथों की ऐसी व्याख्या की जाती है, जो महिलाओं को कमजोर और निर्भर बनाए रखती है, जबकि इस्लाम का मूल संदेश न्याय और समानता का है।
केरल हाई कोर्ट का यह पैâसला उसी मूल संदेश की याद दिलाता है। इस पैâसले से एक बात साफ हुई है कि धर्म और कानून एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि सही समझ के साथ-साथ चल सकते हैं। अदालत ने यहां रूढ़िवादी परंपराओं का सहारा नहीं लिया। अदालत ने कुरआन की मूल भावना से न्याय का रास्ता निकाला है। यह उन तमाम तरह की सोच के लिए एक आईना है, जो मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को धार्मिक आड़ में सीमित करना चाहती हैं।
अब समाज के सामने एक बुनियादी सवाल है कि मुस्लिम समाज का वास्तविक हित किसमें है? क्या महिलाओं को आर्थिक रूप से कमजोर और निर्भर बनाए रखने में या उन्हें शिक्षा, रोजगार और कानूनी सुरक्षा देकर सशक्त बनाने में? तीन तलाक, हलाला जैसी कुरीतियों पर बहस से आगे बढ़कर यह समझना जरूरी है कि मजबूत महिलाएं ही मजबूत परिवार और मजबूत समाज की नींव रखती हैं।
यह पैâसला इसलिए भी क्रांतिकारी है क्योंकि यह भविष्य की दिशा तय करता है। इस पैâसले में यह संदेश छिपा हुआ है कि तलाक के बाद भी महिला का सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना समाज और कानून दोनों की जिम्मेदारी है। ऐसे में पुरानी जंजीरों और संकीर्ण सोच को तोड़कर नई पीढ़ी को न्याय, समानता और आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाने का यह सही समय है। जब महिलाएं सशक्त होंगी, तभी घर, परिवार और पूरी कौम सशक्त होकर आगे बढ़ सकेगी।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉाfनक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
