सामना संवाददाता / मुंबई
विधान परिषद में बोरीवली स्थित संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में निवासरत हजारों आदिवासी और झोपड़ीधारक नागरिकों के पुनर्वसन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे। विपक्षी सदस्यों ने लिखित तौर पर कहा कि क्षेत्र में २७ हजार लोगों के पुनर्वास अटका हुआ है। क्या यह सही है कि पुनर्वास की इस प्रक्रिया में जमीन और पर्यावरणीय अड़चन कारण बन रहे हैं। महायुति सरकार से पूछा कि आखिर २५ साल पुराने आदेश के बावजूद इतने लोग अब भी पुनर्वास के इंतजार में क्यों हैं।
विपक्ष के लिखित सवालों का जवाब देते हुए वन मंत्री गणेश नाईक ने उत्तर दिया है कि उद्यान क्षेत्र में लगभग २,००० आदिवासी और २५,००० झोपड़ीधारक अनधिकृत रूप से रह रहे हैं। वर्ष २०१८ में निर्णय हुआ था कि इन लोगों का पुनर्वसन मरोल-मरोशी की ९० एकड़ जमीन पर किया जाएगा, लेकिन यह भूमि पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आने के कारण वहां पुनर्वसन फिलहाल संभव नहीं। केंद्र सरकार की २०१६ की अधिसूचना के तहत यह क्षेत्र विनियमित श्रेणी में आता है, लेकिन राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने दिसंबर २०२४ में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक इस क्षेत्र का जोनल मास्टर प्लान स्वीकृत नहीं होता, तब तक कोई भी पुनर्वसन योजना मंजूरी के लिए प्रस्तुत नहीं की जा सकती।
अब तक क्या किया गया?
फरवरी २०२५ में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में ठाणे जिला प्रशासन द्वारा सुझाई गई वैकल्पिक भूमि को पुनर्वसन के लिए उपलब्ध कराने के निर्देश गृहनिर्माण विभाग को दिए गए। पुनर्वसन के लिए वैकल्पिक भूमि की पुष्टि के बाद उसे म्हाडा को हस्तांतरित किया जाएगा। इसे लेकर दायर रिट याचिका में दिए गए आदेश के तहत वर्ष २००० में ११,६५८ पात्र में से ११,३५९ लोगों का पुनर्वसन संघर्ष नगर, चांदिवली में किया गया। लेकिन वर्ष २००८ में पैसा जमा करने वाले १३,४८६ पात्र नागरिकों का पुनर्वसन फ्लैट्स की अनुपलब्धता के कारण अब तक अधूरा है।
विधायकों की मांग
कई सदस्यों ने यह मांग दोहराई कि इन झोपड़ीधारकों का पुनर्वसन एसआरए योजना के अंतर्गत उद्यान क्षेत्र के बाहर किया जाए। इससे उनका जल्द से जल्द पुर्नवास किया जा सकेगा।
