मुख्यपृष्ठस्तंभरिपोर्टर डायरी :‘करियर, कुंडली और उम्मीदों के बीच फंसा रिश्ता’

रिपोर्टर डायरी :‘करियर, कुंडली और उम्मीदों के बीच फंसा रिश्ता’

सुनील ओसवाल

(धीमी पियानो या वायलिन की पृष्ठभूमि में)
(धीरे-धीरे बोलते हुए)
आज की डायरी में… बात उस रिश्ते की,
जो कभी संस्कार था… अब समझौता बन गया है।
जहां कभी परिवार तय करता था-अब मोबाइल ऐप करता है।
और जहां कभी मन जुड़ते थे- अब प्रोफाइल मैच होते हैं।
(हल्की मुस्कान के साथ)
सुबह के दस बजे थे…
मुंबई के एक वैâफे में मैं एक युवती से मिला — किरण।
कॉफ़ी की चुस्की लेते हुए उसने कहा —
‘शादी करनी है… लेकिन करियर से छोटा नहीं और सोच से बड़ा भी नहीं।’
उसकी आंखों में आत्मविश्वास था –
पर कहीं एक थकान भी… जैसे जिंदगी ने बहुत कुछ दिया, पर कुछ छूट गया।
(साउंड इफेक्ट: हल्का ट्रैफिक, फिर वैâफे की गुनगुनाहट खत्म)
दोपहर को मिला रोहन, ३३ साल का इंजीनियर।
कहता है-
‘घर है, गाड़ी है… लेकिन साथी नहीं मिल रहा।
सबको ‘पैकेज’ चाहिए, पार्टनर नहीं।’
वो हंसा… लेकिन वो हंसी सच्ची नहीं थी।
शायद वो खुद भी जानता था- अकेलापन अब उसकी सबसे स्थिर सैलरी बन चुका है।
(धीमी संगीत, पंछियों की आवाज)
शाम को मैं एक पार्क पहुंचा।
वहां एक बुजुर्ग दंपति बेंच पर बैठे थे।
बोले-
‘हमारे जमाने में शादी परिवार करता था, अब मोबाइल ऐप।
तब निभाना जरूरी था, अब मैच होना।’
उनकी आंखों में बीते वक्त की तस्वीरें थीं-
और आज के समाज की बेचैनी भी।
(थोड़ा गंभीर स्वर)
रात को जब नोट्स लिखे, तो अहसास हुआ-
यह कहानी सिर्फ किरण या रोहन की नहीं,
यह कहानी उस पूरी पीढ़ी की है
जो आजादी के नाम पर अकेलेपन की सजा काट रही है।
कभी ढोल बजते थे… अब नोटिफिकेशन बजते हैं।
कभी कन्यादान होता था… अब ‘प्रोफाइल एक्सेप्टेड’ लिखा आता है।
(रिपोर्टिंग टोन में)
पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं-
हर महीने सैकड़ों शिकायतें आती हैं ‘फर्जी रिश्तों’ की।
सोशल मीडिया ने प्यार को क्लिक में बदल दिया है-
पर भरोसा… कहीं लॉगआउट हो गया है।
(धीमी, भावनात्मक टोन)
एक रिपोर्टर के तौर पर मैंने बहुत कहानियां देखी हैं…
पर यह कहानी समाज की आत्मा की है।
हम सब रिश्ते ढूंढ रहे हैं-
पर शायद अब रिश्तों के मायने भूल गए हैं।
(धीमी संगीत पृष्ठभूमि में)
आखिरी पंक्तियां-
करियर जरूरी है… पर दिल की धड़कनें भी कम अहम नहीं।
‘परफेक्ट पार्टनर’ नहीं, ‘रियल इंसान’ चाहिए।
क्योंकि समाज तब तक जीवित है-
जब तक उसमें प्यार, संवेदना, और एक-दूसरे की जरूरत बाकी है।
(धीरे-धीरे संगीत खत्म होता है)
(नर्म आवाज में)
मैं था- सुनील ओसवाल…
और यह थी मेरी रिपोर्टर डायरी –
‘करियर, कुंडली और उम्मीदों के बीच फंसा रिश्ता।’

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