जे.आनंद
आज की सुबह कुछ जल्दी में थी। ऑफिस पहुंचना था, काम साइन में ही था, लेकिन मन ने ट्रेन की भीड़ से बचकर बस का रास्ता चुना। मालाड से बांद्रा का सफर आमतौर पर वही शोर, वही ट्रैफिक, वही लाल बत्तियां और वही अनजान चेहरे। १८० नंबर की बस पकड़ी और निकल पड़ी, यह सोचकर कि सफर बस सफर ही रहेगा।
लेकिन आज रास्ता ही एक कहानी बन गया। सांताक्रुज मिलन सबवे के पास बस अचानक धीमी हुई। खिड़की से बाहर देखा तो हाईवे के बीचो–बीच, डिवाइडर पर एक अजीब-सा दृश्य था। ट्रक, बसों और हॉर्न के शोर के बीच सैकड़ों कबूतर कतारों में बैठे थे। ऐसा लगा मानो वे किसी का इंतजार कर रहे हों। दाने का इंतजार, उस रोजमर्रा की आदत का इंतजार, जिसके पीछे आज भी पूरी व्यवस्था आंख मूंदे खड़ी है।
यही वे कबूतर हैं, जिन पर मुंबई हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। खुले में दाना डालने पर रोक, सार्वजनिक स्वास्थ्य का हवाला, श्वसन रोगों का डर, गंदगी और प्रदूषण की चेतावनी। आदेश साफ था बीएमसी को एफआईआर दर्ज करने और पांच हजार रुपए तक जुर्माना लगाने का अधिकार। पैâसला अखबारों में छपा, टीवी पर चला, सोशल मीडिया पर वायरल भी हुआ।
लेकिन शहर? शहर अपनी ही रफ्तार में चलता है। आज लगा जैसे कबूतरों ने गलियों से निकलकर हाईवे को अपना ठिकाना बना लिया हो और अदालत का आदेश ट्रैफिक की तरह कागजों में ही फंसा रह गया हो। उसी भीड़ में से एक कबूतर अचानक तेजी से उड़ा और मेरी बस के शीशे के बेहद करीब से गुजर गया। पंखों की हल्की-सी हवा गालों को छू गई।
उस एक पल में लगा जैसे वह मुझसे कुछ कह रहा हो ‘पहले इंसानों की बीमारी का इलाज करो…करप्शन, लालच और संवेदनहीनता का। बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा।’ शहर में हर दिन नए कानून बनते हैं। नोटिस जारी होती है, बैठकों में फाइलें खड़कती हैं। लेकिन सड़कों पर वही पुरानी तस्वीरें। उसी धूल में लोग, उसी दाने के इंतजार में कबूतर और उसी खामोशी में छुपे अनगिनत सवाल।
सायन पहुंचने से पहले मैंने खिड़की से आखिरी बार उस डिवाइडर की ओर देखा, जहां आज कानून और जिंदगी आमने-सामने बैठे थे और लगता था, इस जंग में जीत कबूतरों की हुई।
