मुख्यपृष्ठस्तंभरौबीलो राजस्थान : मरियां पछै गरुड़ पुराण ई बांचीजै

रौबीलो राजस्थान : मरियां पछै गरुड़ पुराण ई बांचीजै

बुलाकी शर्मा राजस्थान
‘चुनाव रो रिजल्ट तो अ‍ेक्जिट पोल नै ई मात देय देय दियो काळू म्हाराज। इसी बंफर जीत रो तो जितणआळी पार्टियां खुद कोनी सोच्यो हो। सगळां नै अचंभो हुय रैयो है।’
‘सगळां री बात ना कर भाया,’ काळू म्हाराज बिचाळै ई बोल्या, ‘अचंभै री बात तो आ है वैâ जीतै जिका सगळी जनता री जीत अर हारै जिका सगळां री हार बतावै। विरोध में जे अ‍ेक ई वोट नीं पड़ै जणै बा सगळी जनता जीत केईजै भाईड़ा पण आपांरै अठै तो पचास फीसद सूं ई कमती वोट लेवणिया राज करता रैया है। घणकरा तो सत्ता रै विरोध में वोट करणिया हुवै। इणनै लोकतंत्र री खूबी मान कै खामी, साच ओ ई है। हार’र जीत तो चुनावां में हुवणी ई है, ई में अचंभो कांय रो, बता।’
‘पण म्हाराज विपक्ष रो तो सूंपड़ो ई साफ हुयग्यो, थां नै इयां लागतो हो कांई, बतावो?’
‘थारै वैâ म्हारै लागण सूं बंटै कांई है भाईड़ा। जितणियां रंग-गुलाल उडार अर ढोल-नगारा बजार’र‌ मोदीज रैया है, आपरै प्रधानजी री आरती उतार रैया है अर हारियोड़ा आपरी हार री वजै माथै बिचारता माथो दुखाय रैया है।’
‘जीत हुवतै थकां ई आ जीत गळै में अटक्योड़ी है, म्हाराज। आ तो साव फरजीवाड़ै री जीत है। टाबरपणै रा दिन याद आवण लागग्या म्हाराज जद खेल प्रतियोगितावां में रैफरी सेठ-साहूकारां सूं आपरी अंटी भारी कर’र बां रै नाकाबिल टाबरां नै धिगांणै ई जिता दिया करतो हो फेर काबिल छोरा रैफरी घूस खायग्यो रा घणाई नारा लगावता पण रैफरी बेसरमी सूं मुळकतो रैंवतो।’
‘अरे भाया, लोहै नै लोहो ई काट सवैâ। सत्ता पक्ष रै फरजीवाड़ै रो जवाब फरजीवाड़ै सूं दियां पार पड़सी। अबै राजा हरिसचंदर रो जमानो कोनी रैयो। जुद्ध में साम, दाम, दंड, भेद आद सगळा अस्तर-सस्तर काम में लिरीजै। महाभारत जुद्ध में आतताई‌ सत्ताधारी कौरवां नै हरावण सारू भगवान स्रीक्रिसण झूठ रो सायरो लियो वैâ नीं, बता? धरमराज जुधिस्ठर सूं बां ‘अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो’ कैवाय’र गुरु द्रोणाचार्य नै धोखो दिरायो हो नीं।’
‘झूठ-फरेब सूं बण्योड़ी सत्ता सूं फेर सुशासन री उम्मीद कियां कर सकां, म्हाराज?’
‘देख भाया, राजनीति में जींवतो रैवण सारू सत्ता माथै कब्जो करणो जरूरी हुवै। कब्जो चायै जियां करो।’ काळू म्हाराज कैयो,‌ ‘मरियां पछै तो गरुड़ पुराण ई बांचीज्या करै, समझग्यो नीं। सुशासन-कुशासन सबद कोई मायनो को राखै नीं।’
समझ’र ई अणसमझ दांईं म्हैं म्हाराज नै देखतो रैयो।

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