– तृतीयपक्ष के खातों से बेवजह करोड़ों की निकासी
-क्षेत्राधिकार व न्यायिक अवमानना के गंभीर आरोप
सामना संवाददाता / मुंबई
दिल्ली द्वारका स्थित इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रेटेजिक ऑपरेशंस (आईएफएसओ) यूनिट में दर्ज एक कथित एफआईआर संख्या १८/२५ अब एक बड़े संवैधानिक और बैंकिंग विवाद का रूप लेती जा रही है, जिसकी गाज कई बड़े अधिकारियों पर गिर सकती है। इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के स्पष्ट स्टे के बावजूद आईसीआईसीआई बैंक द्वारा मुंबई स्थित बबली इन्वेस्टमेंट प्रा. लि. के खाते से ४.०७ करोड़ रुपए से अधिक की राशि बिना किसी जानकारी व अनुमति के डेबिट कर ली गई, जबकि कंपनी का उक्त दर्ज एफआईआर से कोई वास्ता ही नहीं था। लिहाजा यह कार्रवाई न केवल न्यायालय की अवमानना है, बल्कि यह बैंकिंग सिस्टम की आंतरिक अनुपालन प्रक्रिया पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
बता दें कि बबली इन्वेस्टमेंट प्रा. लि. के खाते से किसी भी प्रकार की राशि डेबिट न करने का स्पष्ट आदेश दिल्ली हाई कोर्ट ने १६ जुलाई २०२५ को ही पारित कर दिया था। जिसकी प्रति बैंक अधिकारियों को उसी दिन तुरंत ईमेल और व्हॉट्सऐप के माध्यम से भेज दी गई थी। साथ ही कंपनी का दावा है कि उसने १५ जुलाई को ही पिटिशन दायर होने की जानकारी आईसीआईसीआई बैंक की संबंधित शाखा को लिखित में दी थी, जिसकी प्राप्ति भी उनके पास उपलब्ध है। बावजूद इसके १७ जुलाई को दोपहर बाद ४,०७,४३,४०० रुपए की राशि खाते में से निकाल ली गई। मामला दिल्ली निवासी आशिमा नायर विरूद्ध मुकेश गर्ग केस से जुड़ा है। जहां नायर ने गर्ग से कुछ अनलिस्टेड शेयर्स खरीद के लिए अपनी कंपनी के जरिए गर्ग की कंपनी के खाते में ४ करोड़ ७५ लाख रुपए ट्रांसफर किए थे। जिसे गर्ग की कंपनी ने आगे कुछ अन्य कंपनियों को ट्रांसफर किया, जिनसे उन्हें अनलिस्टेड शेयर मिलने थे। परंतु किसी कारणवश यह डील नहीं हो सकी तो नायर ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की। जिस पर नियमत: गर्ग और उनके द्वारा आगे ट्रांसफर किए गए पैसों के मनी ट्रेल को इंगित करना अधिकारियों का काम था, परंतु आश्चर्यजनक ढंग से गर्ग व मामले से जुड़े अन्य खातों का पैसा सीज करने के बजाय अधिकारियों ने बबली इन्वेस्टमेंट व दूसरी कंपनियों के खातों से पैसे निकाल लिए। जिस पर बबली इन्वेटमेंट कंपनी का कहना है कि उनके पास इस कड़ी की एक कंपनी से पैसा आया जरूर था, परंतु वो पैसा उन्होंने ही उन्हें ट्रांसफर किया था। जो किसी अन्य सौदे का था, जो नहीं हुआ तो पैसा गर्ग से लेकर संबंधित कंपनियों को वापस कर दिया गया। जिसकी स्पष्ट एंट्री खातों में भी दर्ज है। बावजूद अवैध तरीके से न केवल उनका पैसा निकाला गया, बल्कि उसे अवैध ढंग से आशिमा नायर के व्यक्तिगत खाते में ट्रांसफर किया गया, जो अपने आप में बड़े घोटाले का इशारा है।
सवालों के घेरे में बैंक की कार्यशैली
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद द्विपक्षीय है, जो सामान्यत: आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि आईएफएसओ के, जो मुख्यत: अज्ञात साइबर अपराधों से जुड़े मामलों की जांच करता है। यहां सबसे चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि शिकायतकर्ता आशिमा नायर के व्यक्तिगत बैंक खाते से कभी भी कोई भी राशि डेबिट नहीं हुई, जबकि देशभर के विभिन्न क्षेत्रों की बैंकों में तृतीय-पक्षों (जिनका मामले से कोई लेना-देना नहीं था) के खातों पर लियन लगाकर उनकी धनराशि व्यक्तिगत खाते में ट्रांसफर कर दी गई। हाई कोर्ट के स्टे ऑर्डर के बावजूद की गई इस कार्रवाई से आईसीआईसीआई बैंक की भूमिका संदेह के घेरे में है।
