प्रो. दयानंद तिवारी
हिंदी साहित्य की विराट परंपरा में कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं, जिनकी उपस्थिति केवल पुस्तकों या प्रकाशित लेखों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे अपने समय की चेतना, संवेदना और नैतिक विवेक का प्रतिनिधि स्वर बन जाते हैं। `ज्ञान रंजन’ ऐसे ही विरल साहित्यकार थे। उनके अवसान के साथ साहित्य शलाका का एक उजला, किंतु अत्यंत सशक्त कोना सूना हो गया है। यह रिक्तता केवल एक व्यक्ति के जाने की नहीं है, बल्कि एक ऐसी वैचारिक दृष्टि और रचनात्मक प्रतिबद्धता के लुप्त हो जाने की है, जिसने अपने समय के यथार्थ को ईमानदारी, साहस और संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया।
ज्ञान रंजन का साहित्य सृजन आत्ममुग्धता से मुक्त, सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़ा हुआ और मानवीय संवेदना से अनुप्राणित रहा। वे उन लेखकों में नहीं थे जो साहित्य को केवल सौंदर्यबोध, शिल्प कौशल या वैचारिक प्रदर्शन तक सीमित मानते हों। उनके लिए साहित्य एक उत्तरदायित्वपूर्ण हस्तक्षेप था। समाज के भीतर व्याप्त विसंगतियों, पीड़ाओं और अनकहे यथार्थ को स्वर देने का माध्यम। उनकी रचनाओं में व्यक्ति और व्यवस्था के बीच का द्वंद्व अत्यंत सहज किंतु गहन प्रभाव के साथ उपस्थित होता है, वहां नारे नहीं हैं, बल्कि अनुभव की सघनता और विवेक की स्पष्टता है।
ज्ञान रंजन की रचनात्मक दृष्टि का मूल केंद्र सामान्य मनुष्य था। उनके पात्र न तो असाधारण नायक हैं और न ही कल्पनालोक में विचरने वाले आदर्श चरित्र। वे हमारे आसपास के ही लोग हैं। संघर्षरत, प्रश्नाकुल, कई बार टूटते हुए, फिर भी मानवीय गरिमा को बचाए रखने का प्रयास करते हुए। यही कारण है कि उनका साहित्य पाठक को केवल पढ़ने का अनुभव नहीं देता, बल्कि उसे भीतर तक आंदोलित करता है। उनकी कहानियों और आलोचनात्मक टिप्पणियों में जीवन की वह सच्चाई उपस्थित है, जिसे अक्सर कृत्रिम सजावट और शब्दाडंबर की चाह में ढक दिया जाता है। उनकी भाषाशैली सादगी में निहित शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। अनावश्यक अलंकरण से दूर रहते हुए वे भाव और विचार को इस तरह प्रस्तुत करते थे कि पाठक स्वत: ही रचना के संवाद में खिंचता चला जाता है। ज्ञान रंजन की भाषा में न तो बनावटी क्रांतिकारिता है और न ही उपदेशात्मकता, वहां गहरी मानवीय करुणा और वैचारिक स्पष्टता का संतुलन दिखाई देता है। भाषा उनके लिए प्रदर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि संप्रेषण का सशक्त साधन थी। सीधी, ईमानदार और प्रभावकारी। साहित्यिक परिदृश्य में ज्ञान रंजन की उपस्थिति एक नैतिक कसौटी के रूप में भी देखी जा सकती है।
वे लेखक की सामाजिक भूमिका को लेकर अत्यंत सजग और उत्तरदायी थे। उनके लिए लेखन आत्मप्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मदायित्व था। उन्होंने कभी भी साहित्य को सत्ता, लोकप्रियता या तात्कालिक लाभ का साधन नहीं बनने दिया। आलोचना के क्षेत्र में भी उन्होंने संतुलन और विवेक को सर्वोपरि रखा, जहां असहमति है वहां तर्क है और जहां सहमति है वहां सूक्ष्म विवेचन। इस दृष्टि से वे नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए एक मूल्यवान आदर्श और प्रेरणा स्रोत के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। ज्ञान रंजन के साहित्य में समय की धड़कन स्पष्ट रूप से सुनी जा सकती है। वे अपने दौर के प्रश्नों से आंख नहीं चुराते, चाहे वह सामाजिक असमानता हो, मनुष्य की आंतरिक टूटन हो या व्यवस्था के भीतर पैâलती संवेदनहीनता। उनके यहां यथार्थ का चित्रण निराशा का उत्सव नहीं, बल्कि चेतना का आह्वान है। वे पाठक को इस बुनियादी प्रश्न से रू-बरू कराते हैं कि साहित्य का सरोकार किससे है और उसका प्रयोजन क्या होना चाहिए। आज जब साहित्य का एक बड़ा हिस्सा बाजार प्रचार और तात्कालिक चर्चाओं के दबाव में अपनी दिशा खोता प्रतीत होता है, तब ज्ञान रंजन की रचनात्मक विरासत और भी अधिक प्रासंगिक हो उठती है। उनका लेखन हमें बार-बार यह स्मरण कराता है कि साहित्य का मूल धर्म मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना है। उसके दु:ख संघर्ष और आशाओं के साथ ईमानदार संवाद स्थापित करना। यह संवाद शोर में नहीं, बल्कि संवेदना की गहराई में संभव होता है।
‘साहित्य शलाका में ज्ञान रंजन’ का यह रिक्त स्थान समय के साथ और अधिक स्पष्ट होता जाएगा। यह रिक्तता हमें बार-बार यह एहसास कराएगी कि कुछ लेखक केवल लिखकर नहीं जाते, वे अपने पीछे एक नैतिक उत्तराधिकार छोड़ जाते हैं कि साहित्य को वैâसे देखा जाए और वैâसे जिया जाए। उनकी अनुपस्थिति हमें उनकी उपस्थिति का मूल्य समझाती है; उनका मौन उनके शब्दों की गूंज को और भी गहन बना देता है।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ज्ञान रंजन का जाना हिंदी साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है। साहित्य सृजन का जो कोना उनके स्पर्श से आलोकित था, वह आज भले ही रिक्त हो, किंतु उनकी रचनाएं उस शून्य को निरंतर अर्थ, दिशा और विवेक प्रदान करती रहेंगी। साहित्य शलाका में उनका प्रकाश भौतिक रूप से भले ही मंद पड़ गया हो, पर वैचारिक और मानवीय स्तर पर वह सदैव प्रकाशित रहेगा, पाठक के विवेक में, लेखक की जिम्मेदारी में और समय की स्मृति में।
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
