प्रो. दयानंद तिवारी
भारतीय विज्ञापन जगत की धरती पर जब भी सृजनात्मकता, सहजता और भारतीयता की बात होगी, तब एक नाम सदैव अमर रहेगा, पीयूष पांडे। उन्होंने न केवल विज्ञापन को व्यावसायिक सीमाओं से निकालकर सामाजिक संवेदना का रूप दिया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि रचनात्मकता की असली ताकत ‘जन से जुड़ने’ में है। वे विज्ञापन के ‘विनायक’ थे, जिन्होंने इस उद्योग को ‘बिक्री की भाषा’ से उठाकर ‘संवाद की संस्कृति’ में बदल दिया।
बाल्यकाल और प्रारंभिक जीवन : संवेदनाओं की बुनियाद
राजस्थान के झुंझुनूं जिले में जन्मे पीयूष पांडे का जीवन शुरू से ही एक साधारण भारतीय परिवेश का आईना रहा।
उनके परिवार में शिक्षा, संस्कृति और संवेदना की जड़ें गहरी थीं।
बचपन से ही वे भाषा, रंग और रूप की ओर आकर्षित थे।
जयपुर के सेंट जेवियर्स कॉलेज में अध्ययन के दौरान उन्होंने क्रिकेट में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और कॉलेज टीम के कप्तान भी बने।
क्रिकेट के मैदान पर रणनीति और रचनात्मकता का जो संतुलन उन्होंने सीखा, वही आगे उनके विज्ञापन जीवन का आधार बना।
स्नातक के बाद उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक में नौकरी की, परंतु दफ्तर की सीमाओं में बंधी दुनिया उनके उन्मुक्त रचनात्मक मन को नहीं भा सकी।
उनके भीतर का कलाकार अपनी अभिव्यक्ति की तलाश में था और यही तलाश उन्हें विज्ञापन जगत की ओर ले आई।
विज्ञापन की दुनिया में प्रवेश : भारतीयता की पुनर्स्थापना
सन् १९८२ में पीयूष पांडे ओगिल्वी एंड माथर से जुड़े।
उस समय भारतीय विज्ञापन पूरी तरह पश्चिमी सोच से प्रभावित था। चेहरे, भाषाएं और कथ्य सब विदेशी लगते थे। भारतीय उपभोक्ता की आत्मा, उसकी संवेदना, उसकी बोलचाल-सब गायब थे। पीयूष पांडे ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने माना कि `विज्ञापन तभी सफल होगा जब वह भारतीय दिल से बोलेगा।’
यहीं से एक नई क्रांति आरंभ हुई। उन्होंने ‘ब्रांड’ को ‘भाषा’ से जोड़ा और ‘उत्पाद’ को ‘भावना’ से। उनके बनाए अभियानों ने उपभोक्ता को केवल ग्राहक नहीं, बल्कि संवाद का सहभागी बना दिया।
लोकभाषा और भावनात्मकता का जादू
पीयूष पांडे की रचनात्मकता की सबसे बड़ी शक्ति थी-लोकभाषा की आत्मा।
उन्होंने उस समय हिंदी और भारतीय भाषाओं में विज्ञापन को प्रतिष्ठा दी जब कॉर्पोरेट जगत अंग्रेजी के मोह में डूबा था। उनके शब्द आम भारतीय की जुबान से निकले लगते थे, सहज, सटीक और असरदार। उनके अमर नारे आज भी भारतीय जीवन के मुहावरों में शामिल हैं —
‘फेवीकॉल का जोड़ है, टूटेगा नहीं’, `हर घर कुछ कहता है’, ‘चलो निकले मां के साथ’,
‘मिल के चलो, देश के साथ चलो’।
ये केवल उत्पादों के प्रचार नहीं थे, बल्कि भारतीय परिवार, रिश्ते, मेहनत और एकता के प्रतीक थे। उनके शब्दों में संस्कृति बोलती थी और हर प्रâेम में जीवन की गंध आती थी। `इन्क्रेडिबल इंडिया’ से विश्व तक भारतीयता का विस्तार, उनका सबसे प्रसिद्ध अभियान ‘मिलिए भारत से रहा, जिसने दुनिया के सामने भारत की सांस्कृतिक, भावनात्मक और मानवीय छवि को पुनर्परिभाषित किया। इस अभियान में उन्होंने भारतीय जीवन के छोटे-छोटे पलों, बच्चों की मुस्कान, मंदिर की घंटी, गांव की सड़क, रंगों की भीड़ को इस तरह दिखाया कि दर्शक भारत को केवल देश नहीं, एक अनुभव के रूप में महसूस करने लगे। यह अभियान आज भी भारतीय ब्रांडिंग का स्वर्ण अध्याय माना जाता है।
पुरस्कार, सम्मान और गौरव
पीयूष पांडे को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर असंख्य सम्मान मिले। वे कान्स लायंस (ण्aहहो थ्ग्दहे) के जूरी सदस्य बनने वाले पहले भारतीय थे। यह भारतीय विज्ञापन के लिए गौरव का क्षण था।
भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया।
उनके नाम पर कई ‘क्लियो’ और ‘एशिया पेसिफिक’ पुरस्कार भी दर्ज हैं, परंतु सबसे बड़ा पुरस्कार उन्हें जनता से मिला- जब उनके बनाए विज्ञापन घर-घर की जुबान बन गए।
मानवता और संवेदनशीलता के संवाहक
पीयूष पांडे का काम केवल बाजार तक सीमित नहीं रहा। उनकी रचनाओं में मानवता की गूंज थी। चाहे ‘पोलियो उन्मूलन’ हो, ‘मतदान जागरूकता’ या ‘गंगा अभियान’, उन्होंने विज्ञापन को सामाजिक उत्तरदायित्व का माध्यम बनाया। उनकी दृष्टि में ‘क्रिएटिविटी’ का अर्थ केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि समाज को जगाने और जोड़ने की शक्ति थी। उनके अभियानों ने यह दिखाया कि विज्ञापन भी बदलाव का माध्यम बन सकता है।
रचनात्मक दर्शन : सरलता ही सर्वोच्च जटिलता
पीयूष पांडे की सोच का सार था। ‘सादगी में सबसे बड़ी जटिलता छिपी होती है।’ वे मानते थे कि सच्चा रचनाकार वही है, जो बड़े विचार को सरल शब्दों में कह सके। उनके विज्ञापन न तो दिखावटी थे, न कृत्रिम; वे जीवन के छोटे-छोटे क्षणों से बने बड़े विचारों के प्रतीक थे।
विरासत : विचारों का अमर उजास
आज पीयूष पांडे हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी रचनात्मकता भारतीय विज्ञापन की हर धड़कन में मौजूद है। उन्होंने वह राह दिखाई जिस पर चलते हुए अनेक युवा विज्ञापनकार आज अपनी पहचान बना रहे हैं। उनके जाने से भारतीय विज्ञापन जगत एक स्तंभ खो चुका है, पर उनके विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बने रहेंगे। उन्होंने यह सिखाया कि सफल विज्ञापन वह नहीं जो बिके, बल्कि वह है जो दिल में उतर जाए।
उनका जीवन यह प्रमाण था कि शब्दों की सच्ची शक्ति तब होती है जब वे अपनेपन से बोले जाएं।
एक युग का अंत, एक परंपरा की शुरुआत
पीयूष पांडे ने भारतीय विज्ञापन को वैश्विक ऊंचाइयां दीं और यह सिखाया कि रचनात्मकता की जड़ें विदेशों में नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि की मिट्टी में हैं। उनके शब्द, उनकी सोच और उनकी सादगी आज भी प्रेरणा देती है कि विज्ञापन केवल व्यवसाय नहीं, संस्कृति का विस्तार है। वे अब स्मृति-शेष हैं, पर अपने पीछे वह रोशनी छोड़ गए हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के सृजन मार्ग को प्रकाशित करेगी। भारतीय विज्ञापन उनके बिना अधूरा है। पर उनकी रचनात्मक आत्मा सदा कहती रहेगी-‘फेवीकोल का जोड़ है, टूटेगा नहीं।’
आज कहना पड़ता है विनम्र श्रद्धांजलि पीयूष जी!
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
