मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : ‘सनातन संस्कृति धार्मिक कर्मकांड नहीं!’

साहित्य शलाका : ‘सनातन संस्कृति धार्मिक कर्मकांड नहीं!’

प्रो. दयानंद तिवारी

सनातन धर्म केवल पूजा–पद्धति या धार्मिक कर्मकांड का नाम नहीं, बल्कि भारत और नेपाल की आत्मिक जीवन–शैली और सांस्कृतिक पहचान का शाश्वत केंद्र है। इसी सनातन दृष्टि को नए वैचारिक आयाम देने और उसे व्यावहारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर जीवंत बनाए रखने का कार्य कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय संस्था हिंदी साहित्य भारती के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र शुक्ल। उनकी सोच में साहित्य, संस्कृति, दर्शन और सामाजिक चेतना अद्भुत रूप से एक–दूसरे में गुंथे हुए दिखाई देते हैं।
डॉ. शुक्ल की पहल पर १० नवंबर से १४ नवंबर तक आयोजित ‘सनातन संस्कृति संवर्धन यात्रा- भारत एवं नेपाल’ वास्तव में इसी संकल्पना का विस्तार थी। हिंदी साहित्य भारती के तत्वावधान में संपन्न इस ऐतिहासिक यात्रा में भारत के अलावा कई देशों के प्रमुख साहित्यकारों, चिंतकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। यह यात्रा जनकपुर, काठमांडू और पोखरा जैसे तीन महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्रों से होकर गुजरी और हर पड़ाव पर सनातन की रक्षा, संवर्धन और वैचारिक पुनर्जागरण पर गहन मंथन हुआ।
जनकपुर: नारी–सम्मान और सनातन मर्यादा का केंद्र
यात्रा का पहला प्रमुख पड़ाव जनकपुर था। मिथिला की गौरवशाली परंपरा और माता सीता की स्मृति से उद्भासित धरती। राम–सीता विवाह की इस पावन भूमि पर आयोजित गोष्ठियों में वक्ताओं ने रेखांकित किया कि सनातन धर्म की जड़ें मर्यादा, सत्य, त्याग, करुणा और कर्तव्य में निहित हैं और सीता इन मूल्यों की सर्वोच्च प्रतीक हैं।
यहां से एक महत्वपूर्ण संदेश गया। जब तक हम अपनी बेटियों, माताओं और नारी–सम्मान की सनातन दृष्टि को नहीं समझेंगे, तब तक संस्कृति की चर्चा अधूरी रहेगी। डॉ. शुक्ल की सांस्कृतिक संकल्पना भी इसी बिंदु पर जोर देती है कि सनातन धर्म स्त्री–गरिमा, परिवार–संरचना और सामाजिक सामंजस्य का धर्म है, कट्टरता और संकीर्णता का नहीं।
काठमांडू: सनातन संकट का बौद्धिक उद्घाटन
काठमांडू में पशुपतिनाथ महादेव की छाया में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. रवींद्र शुक्ल का उद्बोधन इस यात्रा का वैचारिक हृदय बना। उन्होंने स्पष्ट और मार्मिक शब्दों में कहा कि ‘सनातन कमजोर हो रहा है’ और यह कमजोरी केवल बाहरी आक्रमणों से नहीं, भीतर पैâलती उदासीनता, भ्रम और आत्म–विस्मृति से भी उपजी है।
उनके अनुसार, गंगा–यमुना संस्कृति को अलग–अलग करने की प्रवृत्ति हो या भारत और नेपाल की संस्कृति को अलग–अलग दिखाने की जिद – यह सब सनातन की एकता–चेतना पर चोट है। उन्होंने कहा कि हमारी सभ्यता की आत्मा एक है, उसे कृत्रिम विभाजनों में बांटना ऐतिहासिक भूल है।
डॉ. शुक्ल ने धर्म की अवधारणा को केवल समुदाय या मत तक सीमित करने का विरोध करते हुए स्पष्ट किया कि सनातन दृष्टि में धर्म का अर्थ है- सृष्टि के आदिकाल से चला आ रहा वह शाश्वत सिद्धांत जो सत्य, अहिंसा, करुणा, कर्तव्य और प्रकृति–सम्मत जीवन पर आधारित है। इस संदर्भ में उनका वाक्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है। दुनिया में वास्तव में एक ही सनातन धर्म है, बाकी सब पूजा–पद्धतियां हैं। उपासना–पद्धति धर्म नहीं, धर्म तक पहुंचने का साधन है।’
उन्होंने चेताया कि यदि हम वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत और पारंपरिक ज्ञान–धारा से नाता तोड़ देंगे तो केवल नाम से स्वयं को ‘सनातनी’ कहने का नैतिक अधिकार भी समाप्त हो जाएगा।
डॉ. शुक्ल ने इतिहास की ओर संकेत करते हुए सिख पंथ और बौद्ध दर्शन के उदाहरण दिए। उनकी दृष्टि में हिंदू समाज की रक्षा के लिए खड़े हुए सिख पंथ को अलग–थलग करना और इसी मिट्टी से जन्मे बौद्ध दर्शन को ‘नया धर्म’ कहकर सनातन से काट देना, भाषा और राजनीति से उपजे ऐसे प्रयोग हैं, जिन्होंने भारतीय संस्कृति की आंतरिक एकता को क्षति पहुंचाई। उन्होंने प्रश्न किया, ‘क्या भगवान बुद्ध ने कहीं कहा कि मैं नया धर्म दे रहा हूं?’ उनका उत्तर था- बुद्ध ने नया दर्शन और नई दृष्टि दी, मूल धारा सनातन ही रही।
भाषा, संस्कृत और धर्म का डीएनए
डॉ. शुक्ल की सांस्कृतिक अवधारणा का एक केंद्रीय बिंदु है- संस्कृत भाषा। उनके अनुसार ‘धर्म की उत्पत्ति का डीएनए संस्कृत भाषा से ही संभव है।’ हमारे शास्त्र, मंत्र, दार्शनिक ग्रंथ और ज्ञान–परंपरा सभी संस्कृत से पोषित हैं। जब भाषा का क्षरण होता है, तब धर्म–बोध भी कमजोर पड़ता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नई पीढ़ी से संस्कृत, शास्त्र, तीर्थ, पर्व और पारंपरिक प्रतीक छूटते गए, तो सनातन का आंतरिक बल भी क्षीण हो जाएगा।
शुतुरमुर्ग मानसिकता और सनातन पर वैश्विक संकट
डॉ. शुक्ल ने एक सशक्त रूपक के माध्यम से आज की मानसिकता की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जब शुतुरमुर्ग पर संकट आता है तो वह गर्दन रेत में गाड़ देता है, उसे लगता है कि खतरा दिख नहीं रहा, तो शायद है ही नहीं। उन्होंने आगाह किया कि हम भी कहीं यह न मान लें कि सनातन इतना प्राचीन है, उसे कुछ नहीं होगा।
सच्चाई यह है कि कई देशों से सनातन पूरी तरह समाप्त हो चुका है और भारत में भी उसके अस्तित्व पर संकट खड़ा है। धर्मांतरण, सांस्कृतिक भ्रम, तथाकथित ‘गंगा–यमुना संस्कृति’ के नाम पर मूल पहचान को पिघलाने का प्रयास, परिवार–संस्था का विघटन और शिक्षा–मीडिया की गलत दिशा – ये सब मिलकर सनातन पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहे हैं।
उनका तीखा लेकिन सचेतक सवाल था –
‘हम धन कमा रहे हैं, प्रतिष्ठा जुटा रहे हैं, पर सोचिए कि उसका उपभोग कौन करेगा? यदि अगली पीढ़ी हमारी आस्था, भाषा, पर्व–त्योहार, शास्त्र और देवताओं से ही नहीं जुड़ी रहेगी तो यह धन, यह वैभव और यह सत्ता किसके काम आएगी?’ उन्होंने कहा कि काश्मीर का हाल देख लीजिए।
पोखरा: समाधान की वैचारिक रूपरेखा
पोखरा में हिमालय की गोद, शांत झीलों और निर्मल वातावरण के बीच चर्चा केवल संकट पर नहीं, समाधान पर भी केंद्रित रही। डॉ. शुक्ल की प्रेरणा से यहां यह रूपरेखा सामने आई कि भारत और नेपाल मिलकर सनातन अध्ययन एवं अनुसंधान केंद्र स्थापित करें।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में संस्कृत, गीता, रामायण, महाभारत, उपनिषद पर आधारित मूल्य–शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। साहित्य, कला, संगीत और नृत्य के माध्यम से सनातन मूल्यों को जीवंत रखा जाए।
सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों पर सकारात्मक, तर्कसंगत और आकर्षक सनातन–सामग्री तैयार की जाए।
परिवार– संस्था, आश्रम–व्यवस्था और गुरु–शिष्य परंपरा को पुनर्जीवित करने हेतु व्यापक जन–जागरण चलाया जाए।
निष्कर्ष: डॉ. शुक्ल की संकल्पना – नव–जागरण की भूमि
‘सनातन संस्कृति संवर्धन यात्रा’ ने यह स्पष्ट कर दिया कि समय केवल विचार–चर्चा का नहीं, बल्कि जागरण, संरक्षण और आवश्यक होने पर वैचारिक संघर्ष का है। डॉ. रविन्द्र शुक्ल की साहित्यिक और सांस्कृतिक संकल्पना का सार यही है कि सनातन को केवल इतिहास न समझा जाए, उसे वर्तमान जीवन–शैली और भविष्य की दिशा–रेखा बनाया जाए और भारत–नेपाल की साझा सांस्कृतिक आत्मा को किसी कृत्रिम सीमा में न बांटा जाए।
यदि सनातन बचेगा तो ही भारत और नेपाल की आत्मा बचेगी; यदि सनातन कमजोर होगा तो हमारी पहचान भी कमजोर होगी। डॉ. शुक्ल का यह उदघोष आज के दौर में केवल नारा नहीं, बल्कि समग्र भारतीय–नेपाली समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी और मार्गदर्शन है।
यही कारण है कि उनकी यह वैचारिक पहल और सांस्कृतिक संकल्पना आनेवाले समय के सनातन नव–जागरण की आधार–भूमि बनती दिखाई देती है।

(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)

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