प्रो. दयानंद तिवारी
कल महाराष्ट्र की पावन भूमि शिरडी में हिंदी साहित्य भारती के ५वें अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन का शुभारंभ अत्यंत भव्य, गरिमामय एवं सांस्कृतिक वातावरण में हुआ। सार्इं बाबा की तपोभूमि से प्रारंभ हुआ यह अधिवेशन केवल साहित्य का आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन चेतना और मानवता के वैश्विक संदेश का महायज्ञ बनकर उभरा है। देश के विभिन्न राज्यों तथा विदेशों से आए साहित्यकारों, चिंतकों, शिक्षाविदों, कवियों, संस्कृतिप्रेमियों एवं सनातन मूल्यों में आस्था रखने वाले प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक विराट राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।
हिंदी साहित्य भारती का यह अधिवेशन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब विश्व भौतिक उपलब्धियों के बावजूद मानसिक अशांति, सांस्कृतिक विघटन और नैतिक संकटों से गुजर रहा है। ऐसे समय में ‘मानव बन जाए जग सारा’ का मूल संदेश भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा को पुन: स्थापित करता है जिसमें समस्त विश्व को एक परिवार माना गया है। यह अधिवेशन उसी मानवीय चेतना का जीवंत स्वरूप बनकर सामने आया है।
उद्घाटन सत्र में भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, राष्ट्रचेतना और हिंदी भाषा के महत्व पर गंभीर विचार व्यक्त किए गए। कार्यक्रम की रूपरेखा से स्पष्ट है कि यह आयोजन केवल औपचारिक साहित्यिक गतिविधियों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्रजीवन के विविध पक्षों पर व्यापक चिंतन का मंच है।
शिरडी की आध्यात्मिक भूमि पर आयोजित यह अधिवेशन साहित्य को केवल शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन की शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है। आज के समय में जब मनुष्य आधुनिकता की दौड़ में संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है, तब साहित्य ही वह शक्ति है जो मानव के भीतर करुणा, संस्कार और मानवीयता को जीवित रख सकती है। हिंदी साहित्य भारती का यह अधिवेशन इसी उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ रहा है।
अधिवेशन में युवा शक्ति, सनातन धर्म, संस्कार, राष्ट्रधर्म, महिला सशक्तिकरण, भारतीय दृष्टिकोण, वैश्विक सांस्कृतिक चेतना तथा भारतीय शिक्षा व्यवस्था जैसे विषयों पर आयोजित होने वाले सत्र वर्तमान समय की राष्ट्रीय आवश्यकता को व्यक्त करते हैं।
यह स्पष्ट संकेत है कि हिंदी साहित्य भारती, साहित्य को समाज और राष्ट्र के निर्माण का आधार मानती है।
विशेष रूप से भारतीय शिक्षा और भारतीय भाषाओं के संरक्षण का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज शिक्षा का स्वरूप केवल रोजगार प्राप्ति तक सीमित होता जा रहा है, जबकि भारतीय शिक्षा परंपरा व्यक्ति को संस्कारित और चरित्रवान बनाने का कार्य करती थी। अधिवेशन में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली और भारतीय भाषाओं की आवश्यकता पर विचार होना इस बात का प्रमाण है कि यह संस्था भारतीय आत्मा को पुनर्जीवित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
हिंदी भाषा भारत की सांस्कृतिक एकता का सशक्त माध्यम रही है। हिंदी साहित्य भारती का यह आयोजन हिंदी को विश्वपटल पर प्रतिष्ठित करने के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के गौरव को भी पुनर्स्थापित करने का कार्य कर रहा है। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती, बल्कि संस्कृति और सभ्यता की वाहक होती है। इसलिए हिंदी का संरक्षण वास्तव में भारतीय अस्मिता का संरक्षण है।
कल उद्घाटन के साथ ही यह अनुभूति स्पष्ट रूप से दिखाई दी कि यह अधिवेशन साहित्य के माध्यम से समाज में सकारात्मक चेतना का संचार करना चाहता है। यहां कविता केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा, राष्ट्र की चेतना और मानवता की करुणा की अभिव्यक्ति बनकर उपस्थित है। भारतीय साहित्य की परंपरा सदैव लोकमंगल की रही है और यही भावना इस आयोजन में भी दिखाई देती है।
युवाओं की भागीदारी इस अधिवेशन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र है और यदि युवा अपनी संस्कृति, भाषा और मूल्यों से जुड़ेंगे तो भारत पुन: विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा। अधिवेशन युवाओं को आधुनिकता और भारतीयता के संतुलन का संदेश दे रहा है। यही संतुलन भारत की वास्तविक शक्ति है।
महिला सशक्तीकरण पर भारतीय दृष्टिकोण से होने वाला विमर्श भी अत्यंत प्रासंगिक है। भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति, करुणा और सृजन का प्रतीक माना गया है। आधुनिकता के नाम पर केवल बाहरी स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गरिमा और मूल्य आधारित सशक्तीकरण भारतीय दृष्टिकोण की विशेषता है। यह अधिवेशन उसी दिशा में सार्थक संवाद स्थापित कर रहा है।
विदेशों से जुड़े प्रतिनिधियों और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के वैश्विक आयाम पर केंद्रित चर्चा यह सिद्ध करती है कि भारतीय संस्कृति का प्रभाव आज विश्वभर में बढ़ रहा है। योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन और हिंदी भाषा के प्रति विश्व का आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है। ऐसे समय में हिंदी साहित्य भारती का यह अधिवेशन भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर और अधिक सशक्त बनाने का माध्यम बन रहा है।
शिरडी से प्रारंभ हुआ यह सांस्कृतिक महाकुंभ आज पूरे वातावरण को साहित्य, संस्कृति और अध्यात्म की ऊर्जा से आलोकित कर रहा है। सार्इं बाबा की करुणा और भारतीय संस्कृति की चेतना के मध्य आरंभ हुआ यह आयोजन वास्तव में मानवता के भविष्य के लिए आशा का संदेश लेकर आया है।
आज आवश्यकता केवल विकसित समाज की नहीं, बल्कि संस्कारित समाज की है। आवश्यकता केवल तकनीकी उन्नति की नहीं, बल्कि मानवीय चेतना की भी है। हिंदी साहित्य भारती का यह अधिवेशन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी कदम है। शिरडी की भूमि से उठी यह आवाज पूरे विश्व को यह संदेश दे रही है कि यदि मानवता को बचाना है तो साहित्य, संस्कृति और सनातन मूल्यों की ओर लौटना ही होगा।
निश्चित रूप से हिंदी साहित्य भारती का यह ५वां अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन आने वाले समय में भारतीय संस्कृति, हिंदी साहित्य और मानवीय चेतना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्मरण किया जाएगा।
अस्तु
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
