मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर: मैं कंप्रोमाइज्ड हूं

सटायर: मैं कंप्रोमाइज्ड हूं

-डॉ. रवीन्द्र कुमार

किशोर कुमार जी का एक लोकप्रिय गीत है, “मैं हूं झुम-झुम-झुम झुमरू, फक्कड़ घूमूं बन के घुंघरू…”। बस, मैं भी कुछ इसी तर्ज पर कंप्रोमाइज्ड हूं। यह एक पॉजिटिव कॉन्सेप्ट है। पहले कंप्रोमाइज होने को/कंप्रोमाइज करने को अच्छा माना जाता था। पता नहीं कब यह निगेटिव हो गया। जब आप कहते हैं, “प्यार बांटते चलो… हो… क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, सब हैं भाई-भाई।” इसमें भी इसी कंप्रोमाइज की बात कही गई है। कंप्रोमाइज की महिमा बताई गई है।
पता नहीं यह बवेला क्यों मचाया हुआ है। फलां कमीशन कंप्रोमाइज है… ढिकानी एजेंसी कंप्रोमाइज है। भाई, आप अपनी बताओ? यह देश-काल के अनुरूप शब्द अपने अर्थ बनाते-बिगाड़ते रहते हैं। अब देखो, एक शब्द है ‘राजीनामा’। हिन्दी में इसका अर्थ है सहमत होना, कुट्टी खत्म और अब्बा हो गई। लेकिन मराठी में इसका अर्थ है त्यागपत्र दे देना। अतः ऐसा ही कुछ इस टर्म के साथ है। कंप्रोमाइज हो जाने को हाथों-हाथ ले लेना चाहिए था। क्या पति-पत्नी कंप्रोमाइज नहीं करते? क्या मित्र लोग आए दिन नाराज होते हैं और कंप्रोमाइज नहीं करते? इस इंग्लिश में कुछ तो लोचा है। लड़ाई हो जाए, तलाक का मुकदमा दायर कर रखा हो, तो अगर कंप्रोमाइज हो जाए तो कितनी खुशी होती है। चलो जी, कंप्रोमाइज हो गया। कोर्ट भी बढ़ावा देते हैं कि आउट ऑफ कोर्ट ही कंप्रोमाइज/सेटलमेंट हो जाए। उनका एक केस कम हो जाएगा। हम बच्चे थे, तब भी कहा करते थे, “लड़ाई-लड़ाई माफ करो, कुत्ते की…”। यह क्या है? यह और कुछ नहीं, महज  कंप्रोमाइज है।
मैं अपने आपको कंप्रोमाइज्ड मानता हूं। दूसरों की मदद को सदैव सहर्ष तैयार रहता हूं। कोई गाइडेंस मांगे, मैं जेनुइन सलाह देता हूं। कोई पूछे, तो किसी भी विषय के इंपोर्टेंट सवाल ‘ऑफ-हैंड’ बता देता हूं। किसी का भी किसी भी परीक्षा के लिए ‘मेंटर’ बनने को राजी हूं। ठीक-ठाक लिख-लिखा लेता हूं। पता नहीं लोग यह क्यों कहते हैं कि सरकार और देश दो अलग-अलग चीजें हैं। अगर ऐसा है, तो जब भी सरकार के विरुद्ध कोई धरना/प्रदर्शन होता है, नुकसान अंग्रेजों के ज़माने से देश की संपत्ति का ही करते आए हैं। जैसे रेल, रेल की पटरी, थाना जला देना, पोस्ट ऑफिस लूट लेना, वाहनों की तोड़-फोड़ करना। ये सब देश के ‘एसेट’ हैं, न कि किसी सरकार विशेष के। कहने वाले सी.बी.एस.ई. को भी कंप्रोमाइज्ड बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन कहने लग पड़े हैं। रही बात ‘नीट’ की, (नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट) में कहीं कंप्रोमाइज नहीं आता है। अतः ‘सी’ से कॉकरोच आया है। ‘सी’ से कॉकरोच, ‘सी’ से कंप्रोमाइज। यह ऐसी कोई खराब बात भी नहीं। आप जान नहीं रहे हैं, सच तो यह है कि हम सब कंप्रोमाइज्ड हैं, पाश्चराइज्ड हैं, फॉसिलाइज्ड हैं।
शेक्सपियर ने लिखा है:
“As flies to wanton boys are we to the gods; they kill us for their sport.”
(“जैसे शरारती लड़कों के लिए मक्खियां होती हैं, वैसे ही हम देवताओं के लिए हैं, वे अपने मनोरंजन के लिए हमें मार डालते हैं।”)

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