श्रीकिशोर शाही
(सत्ता में सुंदरी की घुसपैठ-१५)
लंदन के रईसों और अदनान खशोगी जैसे अरबपति हथियार डीलरों की आलीशान महफिलों में अपना सिक्का जमाने के बाद, पामेला बोर्डेस की महत्वाकांक्षाएं एक नए और खतरनाक मुकाम पर पहुंच चुकी थीं। अब उसे सिर्फ दौलत और ग्लैमर की दुनिया से संतुष्टि नहीं मिल रही थी, बल्कि उस असली ताकत की तलाश थी जहां से पूरे देश की तकदीर तय होती थी। उसकी पैनी नजरें अब सीधे लंदन के ‘वेस्टमिंस्टर’ यानी ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) पर टिक गई थीं, जो दुनिया के सबसे सुरक्षित और ताकतवर राजनीतिक गलियारों में से एक था।
पामेला अच्छी तरह जानती थी कि अगर सत्ता के सबसे करीब पहुंचना है तो सिर्फ राजनेताओं के साथ पार्टियों में शराब के प्याले टकराना काफी नहीं है, उसे उस व्यवस्था के भीतर अपनी पक्की जगह बनानी होगी। अपने बेपनाह हुस्न, रसूखदार संपर्कों और तेज दिमाग का बेजोड़ इस्तेमाल करते हुए पामेला ने सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी (टोरी पार्टी) के नेताओं के बीच अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी। अपनी मीठी बातों और प्रभावशाली विदेशी व्यक्तित्व के दम पर पामेला ने जल्द ही वो कर दिखाया जो एक आम इंसान के लिए लगभग नामुमकिन था।
उसे हाउस ऑफ कॉमन्स में कंजर्वेटिव पार्टी के सांसदों डेविड शॉ और हेनरी बेलिंघम के कार्यालय में एक ‘रिसर्चर’ (शोधकर्ता) के रूप में काम मिल गया। यह अपने आप में एक बेहद चौंकाने वाली बात थी कि बिना किसी ठोस राजनीतिक अनुभव या शानदार अकादमिक पृष्ठभूमि वाली एक ग्लैमरस ‘विदेशी सोशलाइट’ को अचानक ब्रिटिश संसद में इतनी संवेदनशील और महत्वपूर्ण जगह मिल गई। लेकिन पामेला के सम्मोहन के आगे सारे नियम-कानून बौने साबित हो गए थे। तब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में शक जताया गया था कि शायद कुछ ब्रिटिश सांसद उसके ‘इलू-इलू’ के चक्कर में आ गए थे।
बहरहाल, इस नौकरी के साथ पामेला के हाथ वह ‘ब्रह्मास्त्र’ लग गया, जिसकी उसे सबसे ज्यादा तलाश थी, ब्रिटिश संसद का वीआईपी ‘सिक्योरिटी पास’। उसके गले में झूलता यह छोटा सा कार्ड केवल प्लास्टिक का एक टुकड़ा नहीं था, यह ब्रिटेन के सबसे सुरक्षित और खुफिया हिस्सों में बेरोकटोक एंट्री का एक ऐसा पास था, जिसे पाना बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए भी एक सपना था।
अब पामेला बोर्डेस दिन के उजाले में ब्रिटिश लोकतंत्र के सबसे पवित्र और ताकतवर गलियारों में पूरे अधिकार के साथ घूमती थी। वह सत्ता के बिल्कुल केंद्र में पहुंच चुकी थी। लेकिन उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि हाउस ऑफ कॉमन्स में उसकी यह बेरोकटोक एंट्री और गले में लटका यह सिक्योरिटी पास, जल्द ही एक ऐसे ‘टाइम बम’ में तब्दील हो रहा था, जो पूरे ब्रिटेन की राजनीति को हिलाकर रख देनेवाला था।
(शेष अगले अंक में)
