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राज की बात : कोई सरहद न इन्हें रोके…

द्विजेंद्र तिवारी मुंबई

पश्चिमी संगीत के एक बहुत बड़े हस्ताक्षर जॉन लेनन ने १९७१ में अपने संगीत एलबम ‘इमेजिन’ में एक ऐसे विश्व की कल्पना की थी, जिसमें सरहदें न हों। उनका यह सोलो गीत एक ऐसी शांतिपूर्ण दुनिया की कल्पना करता है, जहां भौतिकवाद न हो, राष्ट्रों को अलग करनेवाली सरहदें न हों और धर्म न हो। इसके लगभग ३० वर्ष बाद शायर जावेद अख्तर ने फिल्म ‘रिफ्यूजी’ के लिए गाना लिखा-
‘पंछी नदिया पवन के झोंके, कोई सरहद ना इन्हें रोके’।
आजकल कुछ लोग ये पंक्तियां बांग्लादेशियों को लेकर कहते हैं कि कोई सरहद ना इन्हें रोके।
बिहार में बवाल बा
इन कालजयी रचनाओं का स्मरण इसलिए हुआ कि इन दिनों बिहार में बवाल बा। बिहार में मतदाता सूची की जांच को लेकर सियासी पारा गरम है। सबके अपने-अपने विचार हैं और राजनीतिक नफा-नुकसान के समीकरण हैं। इन सबके बीच जॉन लेनन और जावेद अख्तर की पंक्तियां यह अहम सवाल उठाती हैं कि क्या देशों को अपनी सीमाएं सील करनी चाहिए और नागरिकता पर कठोर रुख अपनाना चाहिए? क्या बांग्लादेशियों को भारत से बाहर निकालने के लिए गहन जांच जरूरी है, जैसा कि बिहार के लिए चुनाव आयोग का दावा है?
आजादी के बाद पिछले ७५ वर्षों में भारतीय नागरिकता पर कोई ठोस प्रणाली नहीं बन पाई है। भारत की प्रणाली तमाम तरह के पहचान पत्रों और स्थानीय स्तर पर सत्यापन पर निर्भर है। आधार कार्ड से उम्मीद बंधी थी कि केंद्रीय प्रणाली द्वारा जारी यह व्यवस्था नागरिकता स्थापित करेगी, पर वह उम्मीद भी धूमिल हो गई। भारतीय चुनाव आयोग ने एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आधार भारतीय नागरिकता का वैध प्रमाण नहीं है। केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है। पहले राशन कार्ड और अब आधार कार्ड जैसी व्यवस्थाएं भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गर्इं।
पश्चिमी देशों की प्रणाली
पश्चिमी देश अधिक केंद्रीकृत डेटाबेस और एकसमान प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं। वे स्पष्ट रूप से नागरिकता की एक अलग प्रक्रिया और डॉक्यूमेंटेशन अपनाते हैं। वे देश के किसी अन्य डॉक्यूमेंट से उसे क्लब नहीं करते। उदाहरण के लिए अमेरिका में नागरिकता लेना एक अलग प्रक्रिया है। ग्रीन कार्ड या पासपोर्टधारक को अमेरिकी नागरिक नहीं माना जाता। कोई भी अन्य पहचान पत्र वहां नागरिकता के लिए वैध नहीं है। अब भारत को देखें तो यहां पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण है। हम सब जानते हैं कि देश में वैâसे बड़ी आसानी से फर्जी पासपोर्ट बनवा लिए जाते हैं।
कनाडा और अमेरिका जैसे देश अधिक विकसित और केंद्रीकृत व्यवस्था बना चुके हैं। सारे पश्चिमी देशों ने नागरिकता के नियमों को कड़ा कर दिया है। जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देश उस देश की सभ्यता, संस्कृति और भाषा में दक्षता का बाकायदा टेस्ट लेते हैं। यूं ही नहीं कोई बॉर्डर पार करके नागरिकता ले लेता, जैसा कि बांग्ला बोलकर बांग्लादेश के नागरिक भारत में नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं।
तो ऐसी स्थिति में भारत में क्या किया जाना चाहिए? क्या जॉन लेनन और जावेद अख्तर की कविताओं से प्रेरणा लेकर अपने बॉर्डर खोल देने चाहिए? पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, म्यांमारी, श्रीलंकाई घुसपैठ को नजरअंदाज करना चाहिए? उन्हें नागरिक के रूप में शरण देनी चाहिए? या फिर भारत के हर नागरिक की पहचान स्थापित करके उसे नागरिकता का कोई स्थायी प्रमाण पत्र देना चाहिए?
घुसपैठ का समाधान
घुसपैठ भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, आबादी के संतुलन और सामाजिक-आर्थिक स्थिरता के लिए एक गंभीर चुनौती है। चाहे पाकिस्तान के साथ पश्चिमी सीमाएं हों, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ पूर्वी सीमाएं हों या श्रीलंका की ओर से समुद्री मार्ग हों, अनधिकृत प्रवेश संसाधनों पर दबाव डालता है और आतंकवाद, तस्करी और पहचान में हेरफेर की चिंताएं बढ़ाता है। यह अराजकता भारत को एक धर्मशाला में बदल रही है।
समस्या यह भी है कि जब चुनाव आते हैं तब राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग समेत प्रशासनिक तंत्र को कर्तव्य बोध होता है। अगर घुसपैठ को सभी राजनीतिक दल समस्या मानते हैं तो इसके समाधान के लिए गंभीरतापूर्वक कई वर्ष काम करना होगा। राष्ट्रीय पहचान पत्र की प्रणाली विकसित करने की जरूरत है, जो गहन जांच प्रक्रिया के बाद जारी हो। इसके लिए पांच से दस वर्ष लंबी अवधि लगे तो भी यह व्यावहारिक है, लेकिन जल्दबाजी में उठाए गए कदमों का हश्र वही होगा, जो आज बिहार में हो रहा है।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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