-गंदा है पर धंधा है…
मनमोहन सिंह
वाह रे डिजिटल क्रांति! जमाना बदल गया, पर ‘धंधा’ करने की नीयत नहीं बदली। इंस्टाग्राम पर आजकल एक नया और बेहद ‘परोपकारी’ ट्रेंड चल रहा है, बाल यौन शोषण को बढ़ावा देने वाले विज्ञापन। जी हां, वही इंस्टाग्राम जहां लोग रील्स देखकर अपना वक्त बिताते हैं, वहां कुछ शूरवीर अपराधी बच्चों की जिंदगी का सौदा कर रहे हैं। और इस महान व्यापार के पीछे खड़ी हैं मेटा जैसी अरबों-खरबों की ‘संस्कारी’ टेक कंपनियां। अब आप सोचेंगे कि मेटा इतनी बड़ी कंपनी है, कुछ तो करती होगी? बिल्कुल करती है! उनके पास अपनी लाज बचाने के लिए तीन सबसे अचूक हथियार हैं।
पहला हथियार: उनका परम ज्ञानी ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’
मेटा ने इंसानी समीक्षकों को सैलरी देने के बजाय इस मासूम एआई को काम पर रखा है। अब इंटरनेट की दुनिया के ये शातिर अपराधी भी बेहद चालाक हैं; वे सीधे शब्दों की जगह गुप्त कोड, सिंबल्स और तस्वीरों में संदेश छिपा देते हैं। हमारा सीधा-साधा एआई बस सीधे लिखे गाली-गलौज को पकड़ पाता है, और इन शातिर विज्ञापनों को ‘अरे, यह तो बहुत पारिवारिक कंटेंट है!’ कहकर हरी झंडी दिखा देता है।
दूसरा हथियार: तिजोरी का प्यार (ऑटोमेटेड विज्ञापन प्रणाली)
मेटा का विज्ञापन तंत्र पूरी तरह ऑटोमेटेड है,’पैसा फेंक, तमाशा देख’। आप पैसे दीजिए, विज्ञापन तुरंत लाइव। सिस्टम का सीधा नियम है, ‘जब तक कोई यूजर रिपोर्ट नहीं करेगा, हम इसे गंगा जल की तरह पवित्र मानकर प्रमोट करेंगे।’ आखिर मुनाफे की अंधी दौड़ में ‘प्री-स्क्रीनिंग’ जैसी फालतू चीजों पर वक्त कौन बर्बाद करे?
तीसरा हथियार: जादुई ‘एल्गोरिदम’
अगर किसी मासूम बच्चे ने गलती से भी किसी ऐसे विज्ञापन पर क्लिक कर दिया या उसे देख लिया, तो एल्गोरिदम खुशी से उछल पड़ता है, ‘अरे वाह! यूजर एंगेजमेंट मिला!’ इसके बाद वह उस मासूम के पूरे फीड में वैसे ही और खतरनाक विज्ञापनों की बाढ़ ला देता है, जिससे बच्चे इस गंदे जाल में और फंसते चले जाते हैं।
