तकनीक बेअसर, टैंकर माफिया का राज
सुबह के ठीक पांच बजते ही ठाणे की एक आलीशान गगनचुंबी हाउसिंग सोसायटी के एक फ्लैट में ‘टैंक फुल’ का सायरन गूंज उठता है। पूरा परिवार किसी आपातकालीन ड्रिल की तरह हड़बड़ाकर अपनी नींद से जागता है। यह किसी सुखद सुबह की शुरुआत नहीं, बल्कि पानी की एक-एक बूंद को सहेजने, बाल्टियां भरने और डब्बों को कतार में लगाने की रोज की जंग का शंखनाद है।
लिविंग रूम और किचन की बनावट अत्याधुनिक है। दीवारों पर महंगे वॉटर प्यूरीफायर टंगे हैं, छतों के पास ऑटोमैटिक पंप के सेंसर चमक रहे हैं और मॉडर्न प्लंबिंग का पूरा जाल बिछा हुआ है। लेकिन विडंबना देखिए कि हजारों-लाखों रुपए की इन चमचमाती तकनीकों के भीतर के पाइप पूरी तरह सूखे और खाली पड़े हैं। ठाणे के आधुनिक नागरिकों के लिए अब तकनीक जीवन को आसान बनाने की सुविधा नहीं, बल्कि पानी की भयावह किल्लत को मापने और उसकी बेबसी को दर्ज करने का एक जरिया बनकर रह गई है।
सांठगांठ का खेल और बेबस जनता
आज ठाणे में पानी का संकट केवल एक बुनियादी किल्लत नहीं रह गया, बल्कि यह एक बेहद संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। स्थानीय निवासियों का सीधा आरोप है कि प्रशासन की नाकामी की छांव में शहर के भीतर ‘वॉटर माफिया’ पूरी तरह फल-फूल रहा है। मनपा की पाइपलाइनों से जो पानी गायब है, वही पानी कुछ ही घंटों बाद निजी टैंकरों के जरिए सोसायटियों के गेट पर ऊंचे दामों में बिकने आ जाता है। इस कथित सांठगांठ की सीधी कीमत यहां के टैक्सपेयर्स को अपनी जेब से चुकानी पड़ रही है।
टैक्स भी और टैंकर भी
ठाणे के मध्यवर्गीय और उच्च-मध्यवर्गीय परिवारों पर इस समय पानी के नाम पर भारी आर्थिक बोझ थोप दिया गया है। जमीनी स्थिति इतनी चिंताजनक है कि कई सामान्य हाउसिंग सोसायटियों को केवल अपनी रोज़मर्रा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिदिन लगभग पांच हजार रुपये पानी के टैंकरों पर खर्च करने पड़ रहे हैं। वहीं बड़े और हाई-राइज आवासीय परिसरों का सालाना बजट सिर्फ पानी खरीदने में ८५ लाख रुपए से लेकर १.५ करोड़ रुपए तक जा रहा है। यह आर्थिक शोषण तब हो रहा है, जब ये नागरिक नियमित रूप से ठाणे मनपा को प्रॉपर्टी टैक्स, वॉटर टैक्स और भारी-भरकम सोसायटी मेंटेनेंस दे रहे हैं, साथ ही अपने घरों की महंगी ईएमआई भी समय पर चुका रहे हैं। एक ही पानी के लिए टैक्स और टैंकर, दोनों का भुगतान करना नागरिकों के साथ सीधे अन्याय जैसा है।
अदालत के आदेशों की अवहेलना और प्रशासनिक नाकामी
यह संकट रातों-रात पैदा नहीं हुआ, बल्कि यह सालों की प्रशासनिक उदासीनता और दूरदर्शिता की कमी का नतीजा है। साल २०१७ में मुंबई उच्च न्यायालय में हुई एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान, स्थानीय नगरपालिका ने अदालत को बाकायदा आश्वस्त किया था कि वह ठाणे के नागरिकों को पर्याप्त और निर्बाध पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाएगी।
सालों बीत जाने के बाद भी प्रशासन कोर्ट को दिए अपने ही हलफनामे को जमीन पर उतारने में पूरी तरह विफल रहा है। नए-नए प्रोजेक्ट्स और गगनचुंबी इमारतों को धड़ाधड़ मंजूरी तो दे दी गई, लेकिन उनके लिए पानी का सोर्स क्या होगा, इस पर कोई ठोस मास्टर प्लान नहीं बनाया गया।
कागजी दावे बनाम जमीनी हकीकत
एक तरफ ठाणे को ‘स्मार्ट सिटी’ के रूप में पेश करने की कोशिशें होती हैं, जहां डिजिटल इंप्रâास्ट्रक्चर और आधुनिक सड़कों की बातें की जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ, २१वीं सदी के इस दौर में नागरिकों को पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए टैंकर माफियाओं की दया पर निर्भर रहना पड़ रहा है। जब तक प्रशासनिक इच्छाशक्ति को जगाकर अदालती वादों को हकीकत में नहीं बदला जाता, तब तक ठाणे के हजारों परिवारों की सुबह सुकून से नहीं, बल्कि पानी की इसी चिंता और भारी आर्थिक शोषण के साये में बीतती रहेगी।
