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6 दिसंबर, 2025 को बाबासाहब के 69 महापरिनिर्वाण पर विशेष लेख : मानववाद के मसीहा बाबासाहब

हजारों वर्षों के मानवतावादी संघर्षों को अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही दुनिया के सभी संविधानों की तुलना में भारत का सर्वश्रेष्ठ संविधान के शिल्पकार बाबासाहब ने इसके माध्यम से न्याय देने वाले महामानव विश्व वंदनीय भारत रत्न डॉ बाबासाहब आंबेडकर ही हैं जिनकी वजह से आज हम स्वतंत्र भारत में खुली हवा में सांस ले रहे हैं, यदि वे संविधान न लिखते तो हम पता नहीं कहाँ होते? यह उन्हीं की देन है कि हम सभी सुकून की जिंदगी जी रहे हैं। उन्होंने जो संविधान बनाया उसके अनुसार हम सभी भारतीय समान हैं तथा धर्म, वंश,जाति,लिंग अथवा जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव करने पर प्रतिबंध है।वास्तव में बाबासाहब ने देश-विदेश में प्राप्त उच्च बहुश्रुत शिक्षा एवं अनुभवों को भारतीय संविधान में बड़ी ही बारीकी से पिरोया है;जिससे मौजूदा समस्याएँ और भविष्य में निर्माण होने वाली समस्याओं का हल मौजूद है।संविधान के अनुसार भारत की न्याय व्यवस्था सर्वोच्च है,उससे बड़ा कोई नहीं। यह न्याय व्यवस्था समता,बंधुता बनाती है और तानाशाही पर लगाम लगाती है। अर्थात भारत आज जहाँ कहीं प्रगति पथ पर पहुँचा है, विचार करने पर यह समझ में आता है कि इस प्रगति के मार्ग के जनक बाबासाहब ही हैं।प्रत्येक युग में मानव जाति को उचित मार्ग दिखाने वाले युग पुरुषों ने इस धरती पर जन्म लिया है।वैसे ही इस युग में बाबासाहब ने जन्म लिया।उनके जैसा दूसरा कोई नहीं है, जिसने मानव कल्याण की आधार शिला रखी हो।ऐसे विश्ववंदनीय भारत रत्न महामानव डॉ बाबासाहब भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महाराष्ट्र के जिस महार जाति में हुआ, यह जाति अपनी वीरता के लिए जानी जाती थी।इस जाति के लोग सेना में जाना पसंद करते थे।आज भी यह जाति देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने में थोड़ा भी संकोच नहीं करती है।अंग्रेजों को यह पता था कि यदि किसी न किसी बहाने से इस जाति को सेना में रोक नहीं लगाई गई तो जल्द ही हमें खाली हाथ अपने देश वापस जाना पड़ेगा। शायद यही वजह है कि अंग्रेजी हुकूमत ने इस शूरवीर जाति के लोगों की सेना में भर्ती पर रोक लगा दी।

इस समय बाबासाहब केवल एक वर्ष के थे यदि वे 20 या 21 वर्ष के भी होते तो महार जाति को अछूत करार देने का साहस अंग्रेज नहीं कर पाते। यह महार जाति इतनी शूरवीर थी कि इसी जाति के नाम पर ही महाराष्ट्र राज्य का नाम पहले महर राष्ट्र पड़ा था, जो कालांतर में महाराष्ट्र कहा जाने लगा। बाबासाहब के समय समाज की तथा देश की सेवा करने वाले लोगों को अछूत के रूप में साजिश के तहत देखा जाता था।इन्हें शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था। भारत में नाम मात्र की जनसंख्या वाले कुछ लोग थे,जिनकी समाज को बांटने की बुरी आदत ने देश के बहुजन समाज को शिक्षा से वंचित रखने की साजिश रची।इस साजिश का शिकार पूरा देश हुआ।बहुजन समाज के लोगों को बचपन से ही तिरस्कार और चुनौतियां मिलती रहीं। बार-बार मिलने वाली चुनौतियों का बाबासाहब ने सामना कर यह सिद्ध कर दिया था कि इस पृथ्वी पर सदियों से सतायी जाने वाली मानव जाति का सबसे बड़ा कोई हितैषी हो सकता है तो वह केवल और केवल बाबसाहब ही हो सकते हैं। वास्तव में बाबासाहब की प्रतिभा ने सभी मानवता के विरोधियों को पराजित किया।वे इतने लोकप्रिय थे कि शायद यही वजह थी कि वे अपने पूर्ण नाम भीमराव रामजी आंबेडकर के साथ ही बाबासाहब के नाम से भी बुलाये जाते थे।बाबा का अर्थ है पिता।उन्होंने देश के लिए जो काम किया है सचमुच में यह काम एक पिता ही अपने बच्चों के लिए कर।सकता है। वे हम सभी के पिता ही तो हैं। ऐसे महामानव ने बडौदा नरेश के सहयोग से भारत ही नहीं;अपितु अमेरिका और लंदन में उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपनी विद्वता का उदाहरण संपूर्ण विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया। अमेरिका के कोलंबिया विश्ववि‌द्यालय के तीन सौ वर्षों के इतिहास में संसार के जिन छह तेजस्वी विद्यार्थियों को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया गया था; उनमें प्रथम क्रमांक पर बाबासाहब ही थे।वास्तव में वे अद्भुत प्रतिभा के धनी छात्र थे।

उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्ववि‌द्यालयों से अर्थशास्त्र में डाक्टरेट(पीएचडी) की उपाधि प्राप्त की।वे विधिवेत्ता,अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थे;लेकिन इतने महान विद्वान को भी सामाजिक असमानता का शिकार होना पड़ा।हिंदू धर्म में प्रचलित भेदभाव के चलते उन्हें हिंदू धर्म से नाता तोड़ने का निर्णय लेना पड़ा।वास्तव में बाबासाहब ने देखा कि दलितों-शूद्रों के प्रति स्वर्णो द्वारा भेदभाव करते हुए उनका शोषण किया जा रहा है।उन्हें धार्मिक स्थलों पर जाने से रोका जा रहा है। यहाँ तक कि वेद वाक्य के उच्चारण तक के लिए उन्हें मना किया जा रहा है। उन्होंने माना कि धार्मिक ग्रन्थों में कर्म पर बल दिया गया है,लेकिन पंडों, पुजारियों ने अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए हिन्दू धर्म में पाखंड का समावेश कर दिया।वे इस पाखंड को हटाने के हिमायती थे।जो धर्म पानी देने को तैयार न हो,उसे वे धर्म नहीं सजा मानते थे।वास्तव में मानव – मानव के बीच समानता लाने के उ‌द्देश्य से बाबासाहब ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में स्वयं एक औपचारिक समारोह का आयोजन कर अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया।बाबासाहब ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण कर और पंचशील को अपनाते हुए बौद्ध धर्म ग्रहण किया।तब से लेकर आज तक वंचित समाज बौद्ध धर्म में अपने लिए नित नई संभावना देखते आ रहा है। वैसे पूरी दुनिया में एक बात साफ है;दुनिया आज युद्ध नहीं बुद्ध चाहती है।अर्थात आज भी लोग बाबासाहब के विचारों में अपनी गहरी आस्था रखते हैं।वास्तव में बाबासाहब की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी।उनका मानना था कि हमें सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना चाहिए।हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र बनाना चाहिए।उनकी दृष्टि में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है।इस संस्था का सबसे बड़ा कार्य समाज की आंतरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है,लेकिन वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नहीं मानते थे। उनका मानना था कि किसी भी राज्य ने एक ऐसे अकेले समाज का रुप धारण नहीं किया जिसमें सब कुछ आ जाए या राज्य ही प्रत्येक विचार एवं क्रिया का स्रोत हो।गौरतलब हो कि संविधान निर्माण में बाबासाहब को शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया। संघ रीति में मतपत्र द्वारा मतदान,बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग,समितियां तथा कार्य करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल हैं।संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्छवि की शासन प्रणाली के निर्देश (मॉडल) पर आधारित थीं। बाबासाहब भारत का चौमुखी विकास चाहते थे, भले ही उन्होंने भारत के संविधान को आकार देने के लिए वेस्टर्न मॉडल को उपयोग में लाया हो,लेकिन मूलतः उसकी भावना भारतीय है।वास्तव में वे देश से गरीबी दूर कर सामाजिक न्याय सुलभ कराना चाहते थे।शायद इसीलिए उन्होंने श्रमिकों से देश के सामाजिक प्रगति और आर्थिक उत्थान में हाथ बटाने का आवाहन किया।वे समतामूलक समाज के पक्षधर थे।वे सभी देशवासियों को मिलने वाली सुविधाओं में कोई अंतर नहीं देखना चाहते थे।सभी को समान अधिकार मिले, यह उनकी कोशिश थी।बचपन से लेकर युवावस्था तक उनके अनुभव बहुत कड़वे थे,लेकिन उन्होंने एक महात्मा की तरह स्वयं के साथ हुए दुर्व्यवहार को अपने काम के समक्ष कभी नहीं रखा।5 फरवरी 1951 को कानून मंत्री के रूप में बाबासाहब ने एक हिन्दू कोड बिल संसद में प्रस्तुत किया। जिसके पारित होने के बाद महिलाओं को असंख्य कानूनी अधिकार मिल जाते, लेकिन यह पास न हो सका। फलस्वरूप बाबासाहब ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।यह त्याग उन्हें देश का वास्तविक शिल्पकार एवं मानवतावादी सिद्ध करता है।वास्तव में दूरदृष्टि के जनक बाबासाहब ने सभी के भविष्य का ध्यान रखकर संविधान लिखा। बचपन में जिनकी वजह से उन्हें असीम कष्ट सहना पड़ा, उन्होंने उनके हित का भी ख्याल रखा।वास्तव में बाबासाहब ने दलित-बौद्ध आंदोलन को प्रेरित और दलितों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन चलाया। श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया।जब बाबासाहब केवल तीन वर्ष के थे तो उनके पिता सेवानिवृत्त हो गए,जो कि ब्रिटिश भारतीय सेना की महू छावनी में सेवा में थे।वैसे उनके पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और जब वे 6 वर्ष के थे तब उनकी माता का निधन हो गया।वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे।पिता रामजी मालोजी और माता भीमा बाई के बाद में केवल पांच बच्चे ही बचे।जिनमें लड़कों में मुख्य रूप से थे बलराम, आनंदराव,भीमराव तथा लड़कियां मंजुला और तुलसा थीं।ऐसे महामानव का बचपन ही संघर्षमय रहा।शायद यही वजह है कि उन्होंने मजदूरों तथा महिलाओं का दर्द बहुत करीब से देखा था,इसीलिए उन्होंने न्यूनतम मजदूरी निर्धारण कानून बनाने की शुरुआत की।उन्होंने कारखानों में काम के सप्ताह को 56 घंटे से घटाकर 50 घंटे करने,न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने,मजदूरों को मुआवजा देने,मजदूरों की स्थायी और अस्थायी सेवा शर्तों,बीमा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े विधेयक प्रस्तुत किया।महिला मजदूरों को प्रसूति सुविधा दिलाने, कारखानों में शिशु-गृह, पालना घर और बच्चों के लिए दूध पिलाने का प्रावधान कराया।वास्तव में बाबासाहब ही देश के ऐसे बड़ी सोच के पहले समाज- सुधारक थे,जिन्होंने हर समाज की महिलाओं की भलाई के बारे में सोचा। उनका कहना था कि महिलाओं और दलितों की परिस्थिति में कोई अंतर नहीं है।महिलाओं को सामाजिक सम्मान और बराबरी का का स्थान दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।आज महिलाओं को जो आगे बढ़ने की राह मिली है,उस राह को दिखाने वाले बाबासाहब ही हैं।ऐसे विश्ववंदनीय भारत रत्न महामानव डॉ बाबासाहब आंबेडकर का 6 दिसंबर 1956 को महापरिनिर्वाण हो गया। जब 7 दिसंबर को सुबह 3बजे उनका पार्थिव शरीर मुंबई में लाया गया और दादर स्थित राजगृह में उनके अंतिम दर्शन करने हेतु लाखों की संख्या में लोग उपस्थित थे। लोग शांतिपूर्वक 10 घंटे तक इंतज़ार करते रहे। उस समय पूरी मुंबई में शोक की छाया पसरी हुई थी। मिल, कारखाने, गोदी , स्कूल, महाविद्यालय, दुकानें सब कुछ बंद थी।जब दोपहर के डेढ़ बजे उनकी अंत यात्रा विसेंट रोड( वर्तमान में यह रोड़ डॉ बाबासाहब आंबेडकर रोड है।) होते हुए एल्फिंस्टन ब्रिज, सयानी रोड, गोखले रोड मार्ग से होते हुए दो मील की उनकी लंबी अंत यात्रा धीरे-धीरे शिवाजी पार्क के पास के श्मशान भूमि पर पहुँची। रास्ते, इमारतें, पेड़ जहाँ संभव हो सभी जगह खड़े होकर शोकाकुल स्त्री- पुरुष फूलों की वर्षा कर बाबासाहब को अंतिम विदाई दे रहे थे।  उनके विचार तब भी प्रासंगिक थे और आज भी हैं औरभविष्य में भी रहेंगे।ऐसे महामानव ने जो कुछ पूर्व में लिखा है वह सब जैसे लगता है आज ही लिखा गया हो।कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बाबासाहब को 50-100 साल में जो समस्या’ आने वाली है, उसकी कल्पना पहले से ही कैसे थी ?बार- बार मन में यही विचार आता है,काश! बाबासाहब होते तो हमारा देश विश्व में सबसे शक्तिशाली तो होता ही साथ ही देश का हर नागरिक सुखी होता।आज के राजनीतिक और सामाजिक हालात देखकर बार-बार हृदय से एक ही आवाज़ निकलती है, काश! आज बाबासाहब होते तो किसी को कोई भी समस्या ही नहीं होती।इसीलिए तो हर भारतीय उनके विचारों को मानता है। आज उनके इस 69 वें महापरिनिर्वाण दिवस पर हम सभी इतिहासकार डॉ संदेश माधवराव वाघ सर के मार्गदर्शन में बाबासाहब के चरणों में विनम्र अभिवादन करते हुए उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

चंद्रवीर बंशीधर यादव
( लेखक महाराष्ट्र के समाजिक चिंतक एवं शिक्षाविद् हैं। )

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