मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष सम-सामयिक : सूचनाएं छुपाने से कमजोर हो रहा है आरटीआई कानून

विशेष सम-सामयिक : सूचनाएं छुपाने से कमजोर हो रहा है आरटीआई कानून

विजय कपूर
आप यह सवाल नहीं कर सकते कि भारतीय रेल आपसे जितना किराया लेती है, वह क्यों लेती है? केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के नवीनतम आदेश से जनता को यही संदेश मिलता है, जबकि इस संस्था का गठन ही यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आए और अवाम को अधिक से अधिक जानकारी आसानी से उपलब्ध हो जाए। इस संदर्भ में एक प्रार्थी ने २५ जनवरी २०२४ को आरटीआई अर्जी दाखिल की थी, यह जानने के लिए कि रेलवे विभिन्न श्रेणियों के लिए विभिन्न स्थितियों जैसे तत्काल के तहत यात्री किराया वैâसे निर्धारित करती है? अब दो वर्षों की प्रतीक्षा के बाद इस अर्जी को इस आधार पर खारिज कर दिया गया है कि रेल का किराया ‘व्यापार गोपनीयता / बौद्धिक संपत्ति अधिकारों’ के अंतर्गत आता है, इसलिए सूचना अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत उसे उजागर नहीं किया जा सकता। बात समझ में आ गई। व्यापार राजों को राज ही रखा जाए जैसे कोकाकोला का फॉर्मूला जिसे एक कागज पर लिखकर बैंक के लॉकर में छुपा कर रख दिया गया है, ताकि कोई प्रतिद्वंद्वी उसकी नकल करके उस जैसा शीतल पेय तैयार न करने लगे। एकदम सही बात, लेकिन रेलवे का प्रतिद्वंद्वी कौन है? आप चाहे रेल में जम्मू-कश्मीर में सवार हों या तमिलनाडु में, असम में या गुजरात में, आप भारतीय रेल में ही सवार हो रहे हैं, जो कि भारत सरकार की मोनोपोली है और जिसका बजट संसद में पारित किया जाता है। हां, अगर आप तेजस एक्सप्रेस की बात कर रहे हैं, जिसे आईआरसीटीसी चलाती है, तो भी जान लें कि वह भी रेल मंत्रालय के तहत आती है और फलस्वरूप भारत की जनता उसकी मालिक है। अत: यह प्रश्न तो बनता है कि रेलवे को यह बताने में क्या व्यापार का खतरा है कि वह किराया राशि का हिसाब वैâसे लगाती है। मसलन, पश्चिम सुपरफास्ट एक्सप्रेस के २ एसी कोच में निचली बर्थ का, जिसके बारे में प्रार्थी ने जानना चाहा था?
दरअसल, इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि रेलवे ने जानकारी देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह तो ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट पर पनपी सरकारी संस्था है और सरकार न सवाल सुनना चाहती है और न पारदर्शिता के पक्ष में है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में करोड़ों रुपए वेतन पाने वाले एंकर भी सरकार से नहीं, विपक्ष से प्रश्न करते हैं, लेकिन हैरत तो इस बात पर है कि सीआईसी ने रेलवे के (कु) तर्क को स्वीकार कर लिया। हाल के एक अन्य मामले में सीआईसी कस्टम्स विभाग की इस बात से सहमत हुई कि मेघालय से बांग्लादेश को जो चूना-पत्थर निर्यात किया जा रहा है, उसकी जानकारी साझा करने से किसी प्रकार का जनहित नहीं होने जा रहा है। यह जानकारी तो स्वत: ही पब्लिक डोमेन में होनी चाहिए। शोधकर्ताओं, पर्यावरणविदों या किसी अन्य को उसकी जरूरत हो सकती है। बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है, जिसके विरोध में आप नहीं चाहते कि वहां का कोई क्रिकेटर आईपीएल में खेले, लेकिन आप उससे व्यापार संबंध बनाए रखेंगे और यह भी नहीं बताएंगे कि खनन (वैध या अवैध) करके कितना चूना-पत्थर ढाका को भेजा जा रहा है। अजीब विरोधाभास है?
हालांकि, इस समय सीआईसी के सभी पद भरे हुए हैं और मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार गोयल व १० अन्य सूचना आयुक्त मौजूद हैं, लेकिन इनमें से ९ नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट के सख्त होने पर १५ दिसंबर २०२५ व उसके बाद हईं हैं, यानी उससे पहले लंबे समय तक सीआईसी में सिर्फ दो आयुक्त थे व मुख्य सूचना आयुक्त का पद भी खाली था, जिससे लंबित अर्जियों की संख्या ३२,००० से भी अधिक हो गई, जिनमें से कुछ तो वर्षों पुरानी हैं। रिक्त स्थानों व लंबित अर्जियों की स्थिति राज्यों में तो इससे भी अधिक बदतर है। कर्नाटक में अब जाकर राज्य सूचना आयोग में आयुक्तों के सभी रिक्त स्थान भरे गए हैं और ऐसा सिर्फ कर्नाटक में हुआ है, शेष राज्यों की स्थिति का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है। झारखंड में पिछले पांच साल से सूचना आयोग ठप्प पड़ा है, नये केस पंजीकृत नहीं किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में केवल एक आयुक्त है और लगभग ३५,००० केस लंबित हैं। महाराष्ट्र में २०२५ के अंत तक आयुक्तों के तीन पद रिक्त थे और एक लाख से अधिक मामले लंबित थे।
सीआईसी में विवादों की कहानी पुरानी है। नियुक्तियां देर से होती हैं और केसों का ढेर लगता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, स्थिति निरंतर बद-से-बदतर होती जा रही है। पिछले ११ वर्षों में ७ बार ऐसा हुआ कि सीआईसी में कोई मुख्य सूचना आयुक्त महीनों तक नियुक्त नहीं किया गया, जिससे पारदर्शिता व जवाबदेही की गंभीर चिंताएं उत्पन्न हुईं। हीरालाल सामरिया ने यह पद १३ सितंबर २०२५ में छोड़ा था और उनके स्थान पर राजकुमार गोयल की नियुक्ति १५ दिसंबर २०२५ को हुई। गौरतलब है कि कानूनन प्रशासनिक शक्तियां केवल मुख्य सूचना आयुक्त के पास होती हैं, शेष आयुक्तों के पास नहीं। इसलिए मुख्य सूचना आयुक्त के पद को खाली नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार को आयुक्तों के अवकाश ग्रहण करने की तिथि पहले से ही मालूम होती है, लेकिन फिर भी अगली नियुक्ति देरी से की जाती है और वह भी अक्सर एक्टिविस्टों के दबाव व सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, जैसा कि हाल ही में सीआईसी में हुआ और तब जाकर ११ में से खाली पड़े ९ पद भरे गए। यहां अंजलि भारद्वाज व अन्य बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के २०१९ के ऐतिहासिक पैâसले को याद करना आवश्यक प्रतीत होता है। अदालत ने सीआईसी व राज्य सूचना आयोगों में रिक्त पड़े स्थानों को तुरंत पारदर्शिता के साथ भरने पर बल दिया था, यह कहते हुए कि आरटीआई कानून स्वत: ही अपीलों व शिकायतों का तेजी से निस्तारण करने को कहता है। खंडपीठ ने कहा था कि मुख्य या पर्याप्त संख्या में आयुक्तों के न होने से आयोग का कामकाज बाधित होता है, जिससे ‘इस कानून का उद्देश्य ही अर्थहीन हो सकता है’। सीआईसी में संकट केवल प्रतीकात्मक नहीं है-वह केसों के निरंतर बढ़ते बैकलाग में प्रतिविंबित होता है, ३०,००० से भी अधिक केस लंबित हैं और अब प्रार्थियों को सुनवाई के चरण तक आने में भी एक साल से ज्यादा का समय लगता है फिर अक्सर आदेश ऐसे सुनाए जाते हैं, जिनका न सिर होता है न पैर, रेलवे किराया फॉर्मूला इसकी ताजा मिसाल है। इसके अतिरिक्त आरटीआई के दायरे से बाहर की जाने वाली संस्थाओं की संख्या में भी निरंतर इजाफा किया जा रहा है। राजनीतिक दलों, बीसीसीआई आदि को आरटीआई एक्ट से बाहर रखने का औचित्य किसी की समझ में आता है? आरटीआई एक्ट को कमजोर कर दिया गया है या किया जा रहा है। हमेशा से स्थिति ऐसी नहीं थी। दो दशक पहले इस कानून को शासन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लाया गया था और सीआईसी को इसका संरक्षक बनना था। एक प्रार्थी ने जब २०१७ में यह जानना चाहा कि सरकार ने एयरक्राफ्ट वैâरियर आईएनएस विक्रमादित्य (गोर्शकोव) पर रूस के बढ़े हुए बिल को क्यों स्वीकार किया तो सीआईसी ने प्रार्थी का साथ दिया था। उसने २०११ में आरबीआई की आपत्ति को अस्वीकार करते हुए पीएसयू बैंकों के १०० टॉप डिफाल्टर्स की सूची जारी करने को कहा था, लेकिन अब डिफाल्टर्स की समान सूची के आग्रह को बड़ी बेंच को सौंप दिया गया है, जबकि आरबीआई कह रही है कि यह सूचना सार्वजनिक होनी चाहिए। भारत को २०२६ में २०१६ की तुलना में अधिक पारदर्शी होना चाहिए, लेकिन अगर सीआईसी वैध आग्रहों को भी ब्लॉक करती रहेगी तो ऐसा वैâसे होगा, जबकि ९ साल बाद वह पूरी स्ट्रेंथ में है। अगर नए केस न भी लिए जाएं तो भी ३२,००० केसों को निपटाने में तीन साल लगेंगे। इससे आरटीआई का पूरा उद्देश्य ही पराजित हो जाता है (लेखक सम-सामयिक विषयों के विश्लेषक हैं।)

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