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सेंट जॉर्ज अस्पताल का आईसीयू बना ‘डेथ वार्ड’ …हर ५ में से २ मरीजों की मौत! … तीन सालों में १२७६ मरीजों में से ५२० ने गंवाई जिंदगी

आयुर्वेदिक-होम्योपैथिक इंटर्न्स से कराई जा रही आईसीयू की ड्यूटी

सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई के सरकारी सेंट जॉर्ज अस्पताल का आईसीयू मरीजों के लिए ‘मौत का कुआं’ साबित हो रहा है, जहां पिछले तीन सालों में १,२७६ मरीजों में से ५२० ने अपनी जान गंवाई है। ये आंकड़े चीख-चीखकर चिल्ला रहे हैं कि इस अस्पताल में हर पांच में से दो मरीजों की मौत हो रही है। यही नहीं भर्ती मरीजों में से एक तिहाई के करीब मामले ऐसे हैं, जहां इलाज अधूरा छोड़ कर चले गए, जिससे रोगियों की जान की परवाह न कर के उपचार बीच में छोड़ने की प्रवृत्ति भी उजागर हुई है। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि सिस्टम की घोर विफलता है। इसमें यह भी खुलासा हुआ है कि आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक इंटर्न्स से आईसीयू की ड्यूटी कराई जा रही है, जबकि वे क्रिटिकल केयर के लिए योग्य प्रशिक्षित नहीं माने जाते हैं। यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है आरटीआई के जरिए, जिसने अस्पताल प्रबंधन के हत्यारे सिस्टम को पूरी तरह से उजागर कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र के सरकारी स्वास्थ्य ढांचे पर एक बार फिर बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से खुलासा हुआ है कि मुंबई के सरकारी सेंट जॉर्ज अस्पताल के आईसीयू में बीते तीन वर्षों में हर पांच में से दो मरीजों की मौत हुई, जबकि एक मरीज ने इलाज अधूरा छोड़ दिया। आरटीआई में अस्पताल की ओर से जानकारी दी गई है कि मई २०२२ से जुलाई २०२५ तक आईसीयू में कुल १,२७६ मरीज भर्ती किए गए, जिनमें से ५२० की मौत हुई यानी औसतन ४०.७५ फीसदी की मृत्यु दर रही। वर्ष २०२५ में जुलाई तक यह दर बढ़कर ४८.७६ फीसदी तक पहुंच गई, जो किसी भी अस्पताल के लिए भयावह संकेत है। वहीं १३ फीसदी मरीजों ने इलाज अधूरा छोड़ दिया, जिससे यह साफ है कि मरीजोेंं का अस्पताल में इलाज की गुणवत्ता पर भरोसा ही नहीं रहा। आरटीआई एक्टिविस्ट एड. तुषार भोसले का आरोप है कि इस अस्पताल में जेजे अस्पताल के एमडी और रेजिडेंट डॉक्टर आईसीयू की ड्यूटी करने से कतरा रहे हैं, क्योंकि उन्हें अतिरिक्त ‘ऑन कॉल’ ड्यूटी करनी पड़ती है। वहीं सेंट जॉर्ज अस्पताल में नियुक्त डॉक्टर न तो ड्यूटी पर आ रहे हैं और न ही जवाबदेह हैं, बल्कि कथित तौर पर तनख्वाह ले रहे हैं। कुछ डॉक्टर दो अस्पतालों में एक साथ काम करके दो-दो वेतन उठा रहे हैं, जबकि कुछ ने आईसीयू की जिम्मेदारी छोड़कर हल्के विभागों में शिफ्ट ले ली है।
अस्पताल में बायोमैट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू करने के आदेश के बावजूद जानबूझकर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, ताकि हाजिरी और ड्यूटी शेड्यूल की जांच न हो सके। आरटीआई एक्टिविस्ट के मुताबिक आईसीयू में भर्ती, मौत और डामा के आंकड़े तो दिए गए, लेकिन डॉक्टरों के नाम और उनकी ड्यूटी टाइमिंग्स छिपा ली गई, जिससे पूरे सिस्टम पर शक गहराता जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कई गंभीर मरीजों को जेजे अस्पताल भेज दिया जाता है, फिर भी सेंट जॉर्ज में मौत का आंकड़ा ५० फीसदी तक पहुंचना घातक लापरवाही का सबूत है।

पेशेंंट को वॉर्ड से आईसीयू में एडमिट करते हैं, वहां भी उनका ट्रीटमेंट करते हैं। आंकड़ा इतना नहीं हो सकता है। साल भर का आंकड़ा ढाई सौ दे दिया गया है, जबकि सही संख्या पांच-छह सौ तक है। सालाना मौत का आंकड़ा १५ फीसदी है।
– डॉ. विनायक सावर्डेकर,
चिकित्सा अधीक्षक, सेंट जार्ज अस्पताल, मुंबई

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