विमल मिश्र
मुंबई
मानो बिजली सी कौंधी हो। बुलेट ट्रेन की शोहरत पहले से ही सुन रखी थी। अब इसे साक्षात देखा भी। मुश्किल से पांच सेकंड बीते होंगे, जापान रेलवे के शिंजिकु स्टेशन पर जब हम क्योटो जाने के लिए स्क्रीन डोर्स की पीछे कतार बांधे अपनी हिकारी शिनकानसेन के इंतजार में खड़े थे, हमारे वैâमरे उठे के उठे रह गए। हमारे आई फोन बगल के प्लेटफॉर्म से गुजरती नोजोमी का विडियो रिकॉर्ड करने में फ्लॉप हो गए थे।
बुलेट ट्रेन का पहले ही डिब्बा। क्रू मेंबर कमउम्र बाला हमें देखते ही झुककर जापानी रीति से ‘कोनिचिवा’ कहकर हमारा स्वागत करती है। पारदर्शी केबिन से हम उसे ड्राइविंग सीट पर देख सकते हैं। ट्रेन कंडक्टर अपनी चुस्त पोशाक में, एक से दूसरे केबिन में आ-जा रही है।
कोच पूरा भरा हुआ, पर मजाल कि चूं भी हो। जापान में ट्रेनों में मोबाइल पर बात करना निषिद्ध है। खचाखच भरी ट्रेन या मेट्रो में भी एकदम सन्नाटा होता है। साइलेंट मोड ऑन करके लोग अपने मोबाइलों में मगन। बगल का युवक ऊंघते हुए मेरे कंधों पर झुक आया है। मेट्रो के चलने को छोड़कर एक आवाज सुनाई नहीं देती। स्थिरता की मिसाल यह कि ३०० किलोमीटर से भी अधिक की रफ्तार पर भी यदि आप सीट पर पानी का गिलास रखेंगे, तो वह छलकेगा नहीं। हिरोशिमा से टोक्यो के बीच यात्रा। कहीं छोटे तो कहीं बड़े पहाड़। इतने बीहड़ रास्ते ने भी गाड़ी की गति को प्रभावित नहीं किया है। गाड़ी इस समय कोई ३०० किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ रही है। एल.सी.डी. स्क्रीन राह से गुजरनेवाले स्टेशन व गति सीमा और आनेवाले स्टेशन के बारे में बा-खबर करते हुए उतरने वाले यात्रियों को तैयार रहने के लिए सावधान कर रहा है। केबिन की सॉफ्ट लाइट्स अचानक चकाचौंध हो उठती हैं और यात्री सीट्स वापस सीधी कर, ऊपर लगे रैक्स पर के हल्के और पीछे के सीटों के भारी सामान उठा लोग उतरने लगते हैं, जहां विदा करने के लिए एक बार फिर मौजूद है ट्रेन होस्टेस-मुस्कान बिखेरती हुए।
बुलेट ट्रेन सुपरफास्ट, फास्ट, सेमीफास्ट और स्लो के लिहाज से कई तरह की होती हैं, नोजोमी, हिकारी, साकुरा, मिजूहो, सूबेम, कोडामा, हायबूसा, कोमाची, सुबासा, यमाबिको, नसूनो, हयाते, कागायकी, हकूतका, टोकी, असमा, तानीगवा, सुरुगी आदि। नीली, सफेद या हरी शिनकानसेन के बीच कभी-कभी एक चमकदार पीले रंग की शिनकानसेन भी दौड़ती दिखाई देती है, जो पटरियों और ओवरहेड तारों की बारीकी से जांच करती है। ‘डॉक्टर येलो’ कहलाने वाली इस ट्रेन के बारे में मशहूर है कि जिसने भी उसे देख लिया, उसकी किस्मत चमक जाएगी।
हिरोशिमा से वापसी में हमारी नोजोमी है ३२० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली। मन कल्पनाओं में डूब जाता है, जब कुछ साल बाद मेरी कर्मभूमि मुंबई को अमदाबाद से जोड़नेवाली हमारी अपनी शिनकानसेन बुलेट ट्रेन भी होगी नोजोमी की ही तरह ३२० किलोमीटर की गति की, जिसका मॉडल यही ट्रेन है। अब तो मेरी जन्मभूमि काशी को दिल्ली और कोलकाता को इसी तरह के हाई स्पीड रेल कॉरिडोर से जोड़ने के काम की योजना भी ड्राइंग बोर्ड पर है। ३२० किलोमीटर की स्पीड वाली, जरा सोचिए, पांच घंटे के भीतर काशी में। फिलहाल, विमान द्वारा हवाई अड्डे से गंतव्य पर आने-जाने के समय को पकड़ें तो इतना ही समय लगता है। जल्द ही यह रफ्तार ५०० किलोमीटर को छू लेनेवाली है। जापान अब एक नई मैग्लेव मैग्नेटिक लिविटेशन लाइन पर काम कर रहा है, जो ६०३ किलोमीटर की गति से, पटरियों से ऊपर तैरते हुए चुंबकीय शक्ति से चलेगी।
टाइम मिला लो
जापान अपनी गाडियों की समयबद्धता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां तक कि लोग उसके आने-जाने के टाइम से अपनी घड़ियां मिला लेते हैं। भारी तूफान या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं को छोड़ ये ट्रेनें एक मिनट भी लेट नहीं होतीं। गाहे-बगाहे गाड़ी कभी अगर पांच मिनट तक लेट हो जाए तो रेलवे लिखित में क्षमा याचना जारी करती हैं, ताकि लोग अगर दफ्तर में इस वजह से लेट हुए हैं तो इस क्षमा याचना पत्र को अपने दफ्तर में दिखा सकें। जापान में शिनकानसेन औसतन १८ से २४ सेकंड तक लेट होती हैं।
मई, २०२१ में एक शिनकानसेन ट्रेन अपने तय समय से मात्र १ मिनट लेट हो गई थी। वजह यह थी कि ड्राइवर को पेट में तेज दर्द हुआ और वह सिर्फ तीन मिनट के लिए टॉयलेट चला गया। इस दौरान उसने ट्रेन का कंट्रोल एक बिना लाइसेंस वाले कंडक्टर को सौंप दिया था। यह बात जापान में राष्ट्रीय समाचार बन गई। रेलवे कंपनी को प्रेस कॉन्प्रâेंस बुलाकर पूरे देश से आधिकारिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। आठ और १६ डिब्बों की बुलेट ट्रेन में ज्यादातर कोच आरक्षित होते हैं। किसी-किसी ट्रेन में धूम्रपान बिल्कुल निषिद्ध है। यह यात्रा महंगी बहुत भी। टोक्यो से हिरोशिमा की महज चार घंटे की यात्रा के लिए हमें २०,००० येन जेब से ढीले करने पड़े, यानी हमारे १२,००० रुपए।
सिर्फ एक छात्रा के लिए चालू रहा स्टेशन
जापान के होक्काइडो में ‘क्यू-शिराताकी’ नामक एक छोटा स्टेशन था। यात्रियों की कमी के कारण रेलवे ने इसे बंद करने का पैâसला कर लिया गया था। लेकिन जब रेल अधिकारियों को पता चला कि ‘काना हाराडा’ नाम की एक हाई स्कूल छात्रा स्कूल जाने के लिए इसी ट्रेन का इस्तेमाल करती है तो उन्होंने सिर्फ उस छात्रा के लिए स्टेशन को चालू रखा, जब तक कि वह ग्रेजुएट नहीं हो गई। शिनकानसेन दुनिया का सबसे पहला हाई-स्पीड बुलेट रेल नेटवर्क है, जो जापान के मुख्य द्वीपों होंशू, क्यूशू और होक्काइडो को आपस में जोड़ता है। ऐसी पहली ट्रेन अक्टूबर, १९६४ में टोक्यो ओलंपिक्स के दौरान टोक्यो और ओसाका के बीच चलाई गई थी। आज टोक्यो स्टेशन से लगभग हर १० मिनट में एक शिनकानसेन ट्रेन छूटती है। शिनकानसेन का इतिहास लगभग एक सदी पुराना है। द्वितीय विश्व युद्ध से पहले, १९३० के दशक में जापानी इंजीनियर्स ने टोक्यो और शिमोनोसेकी के बीच एक हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट की योजना बनाई थी। इस गुप्त सैन्य परियोजना का कोडनेम ‘द बुलेट ट्रेन’ रखा गया था, क्योंकि इसके इंजन का आकार बंदूक की गोली जैसा नुकीला था और इसकी रफ्तार उस जमाने के हिसाब से गोली जैसी तेज होनी थी। पर, युद्ध के कारण यह प्रोजेक्ट रुक गया।
१९६० के दशक में टोक्यो, ओसाका सरीखे जापान के प्रमुख शहर घनी आबादी की वजह से तंगी का सामना कर रहे थे, ऐसे में आवश्यक था कि कुछ ऐसा किया जाए कि आम जनता बड़े शहरों में न बसकर, छोटे शहरों में बस जाए और वहीं से आना-जाना करे। ऐसा करने के लिए एक ऐसे यातायात सिस्टम को लाने की आवश्यकता थी, जो अत्यंत तीव्र गति से लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा दे। और यही एक आशा थी, जिससे शहरों पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव को कम किया जा सकता था। लिहाजा, प्रोजेक्ट दोबारा शुरू किया गया, जापान के इंजीनियर दिन-रात जुटे और बुलेट ट्रेन का निर्माण कर डाला। इसका नाम अब बदलकर ‘शिनकानसेन’ (जापानी में अर्थ ‘नई ट्रंक लाइन’) रखा गया। आज पूरे जापान में शिनकानसेन का जाल बिछा हुआ है। यह जापान की शान ही नहीं है, लाइफ लाइन भी है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
