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संडे स्तंभ : कबूतर जा..जा..जा…

विमल मिश्र
कभी गंदगी और सेहत के खतरों को लेकर तो कभी ट्रैफिक संबंधित परेशानियों के कारण मुंबई के कबूतरखाने इन दिनों नागरिक संगठनों से लेकर सरकार तक के निशाने पर हैं। महाराष्ट्र सरकार ने अभियान चलाकर उन्हें बंद करने के लिए फरमान जारी किया है और मुंबई महानगरपालिका ने उनके विरुद्ध कार्रवाई शुरू कर दी है। ये कबूतरखाने टिके हुए हैं शांति कपोतों और इन अभयारण्यों में उनकी देखभाल करनेवाले नेकदिल नगरवासियों की वजह से, पर अब उनका अस्तित्व संकट में है।

गेहूं, ज्वार, चना, मूंग, बाजरा, मकई और चने के दाने जमीन पर छिटके हुए हैं। पास में है पानी का हौज। अस्फुट सी आवाजें लिए हाथ लय के साथ हवा में उठते और ‌गिरते हैं और झुंड के झुंड कबूतर नीचे बिछे दानों पर उमड़ आते हैं। दादर कबूतरखाने का यह चिर-परिचित दृश्य है।
मुंबई का ट्रैफेल्गर स्क्वायर कहलाने वाले इस कबूतरखाने के सामने पिछले कई सालों से चने बेच रहे शिवकुमार ने बताया कि गुटर-गूं करते यहां रोजाना आनेवाले एक लाख कबूतरों के बीच रोजाना २५ क्विंटल अनाज की खपत हो जाती है। कभी-कभी तो दाताओं के दिए रुपयों से खरीदे दाने चुगाने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी पड़ती है। दाता के दान से जब पूरा नहीं पड़ता तो इसके लिए कबूतरखाने के भीतर ही एक गोदाम मौजूद है। बाहर दर्ज है दाताओं से धर्म कार्य में योगदान की अपील।
हितैषी संगठन
माटुंगा स्टेशन के बाहर का कबूतरखाना ९० से भी ज्यादा वर्षों से आबाद है तो आशर परिवार की उदारता की वजह से। नल बाजार के कुंभारवाड़ा ग्रेन स्टोर के किराना व्यापारी गाला भी ऐसे ही समर्पित कबूतरसेवी हैं। अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उनके खान-पान, उपचार-सुश्रुषा, परिचर्या-देखभाल में भेंट कर देनेवाले इस व्यवसायी ने बताया, ‘दिल के सुकून के लिए इन्हें खिलाता हूं।’ दाना चुगाने की वजह है पाप मुक्ति की कामना। शायद इसीलिए शनिवार, अमावस और त्योहारों के वक्त ज्यादा बिक्री होती है। क्षेत्र में कबूतरों को दाना खिलाने वालों में जैन और मारवाड़ी बड़ी तादाद में हैं। खानदान की सदियों पुरानी परंपरा का पालन करते हुए परिवार में किसी की मृत्यु होने पर कबूतरों को आजाद करेंगे, मानो आत्मा शरीर रूपी पिंजड़े से आजाद कर रहे हों। दादर के कबूतरखाने के पास एक छोटी सी डिस्पेंसरी है, जहां समय-समय पर एक वेटरनिटी डॉक्टर चक्कर लगाकर परखता था कि किसी कबूतर की तबीयत तो खराब नहीं है। ऐसे कबूतरों को स्वस्थ कबूतरों की ‘छीन-झपट’ से बचाने के लिए अलग पिंजड़े में रख दिया जाता था। ज्यादा गंभीर हालत हुई तो ‘सिक रूम’, नहीं तो परेल-अस्पताल के हवाले। लगभग सभी कबूतरखानों के लिए ट्रस्ट बने हुए हैं।
जीपीओ, गेटवे ऑफ इंडिया, दादर, मरीन लाइंस, भूलेश्वर, पांजरापोल, ग्रांट रोड, ताड़देव-हाजी अली, लैमिंगटन रोड, ब्रीच वैंâडी-पैडर रोड, वर्ली, खार, मा‌हिम, अंधेरी-लोखंडवाला। बोरिवली-मुंबई में कबूतरखानों की समृद्ध परंपरा है जो संभवत: शहंशाह अकबर के जमाने से चली आ रही है। पर मुंबई और उपनगरों के २०० के करीब कबूतरखानों में अब ५१ ही बचे हैं। इनमें से कई १०० से १५० वर्ष पुराने हैं। सबसे निराली शोभा है एस.सी. जावले रोड की त्रिमुहानी पर कास्ट आइरन की ग्रिल से घिरे हेरिटेज दादर कबूतरखाने की। हनुमान मंदिर, शांतिनाथ जैन मंदिर, मस्जिद और क्रास की सम्मिलित पवित्र मौजूदगी में प्याऊ और छोटी सी डिस्पेंसरी युक्त ग्रेड-२ के इस हेरिटेज लैंडमार्क को १९३३ में वलमजी रतनशी वोरा ने बनवाया था, जिनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी उसकी देख-रेख कर रही है। मकर संक्रांति पर जब कबूतर पतंग की डोर की चपेट में आकर घायल हो जाते हैं तब उनकी चिकित्सा और सेवा करनेवाले धर्मियों की भी कमी नहीं है।
खत्म हो रही परंपरा
जोपीओ के पास १०३ वर्ष पुराना देवदास पुरुषोत्तमदास कोठारी कबूतरखाना और प्याऊ जैन वास्तु की मिसाल है। यह उसी स्थान पर है, जहां अंग्रेजों के जमाने में विक्टोरिया में जोते जाने वाले घोड़ों के लिए पानी का इंतजाम होता था। १९वीं व २०वीं सदी में परिवर्तनों के जरिए इनकी उपयोगिता बढ़ाई गई है। सामने की शॉप पर बैठे जसवंत ब्रह्मभट्ट कबूतरों के दाने की व्यवस्था करनेवाले परिवार की चौथी पीढ़ी के हैं। वे बताते हैं, ‘लोगों में धर्म भावना तेजी से लुप्त होती जा रही है। कबूतरखाने इसकी मिसाल हैं।’
विगत वर्षों में गेटवे ऑफ इंडिया पर ताजमहल होटल के सामने और मरीन ड्राइव जैसे कबूतरखाने इतिहास हो जाने के बावजूद आज तक कपोतों को आकृष्ट कर रहे हैं। उनके गुलजार बने रहने की कई वजहें हैं। एक है कबूतरों का स्वभाव, आदतें और उसकी शारीरिक विवशता। इमारतों के कोने, खांचे, दरारें या गड्ढे इनके अड्डे होते हैं।
ब्रह्मभट्ट बताते हैं, ‘कबूतर सात्विक वृत्ति का पक्षी है। शाम के बाद नहीं खाया करता। रात में देखने में असमर्थ होता है। कबूतर सबसे उपयोगी पक्षियों में से है जिसकी बीट तक दवा के काम आती है। प्लांट एंड एनिमल वेल्फेयर सोसायटी के कुंजू नामक सदस्य बताते हैं, ‘कबूतर शांति कपोत हैं। आत्मरक्षा में भी चोंच नहीं मारता। हमें उनकी हिफाजत करनी चाहिए।’
बढ़ती तादाद बनी समस्या
आर्थिक समस्या, घटती धार्मिक आस्था, मुकदमेबाजियां – इन कबूतरखानों की कई परेशानियां हैं। कई बार कबूतरों को दाना डालने वालों का टोटा पड़ जाता है, देखभाल के लिए लोग नहीं मिलते, अक्सर वे वाहनों से कुचलकर घायल हो जाते हैं तो कई बार चोरी-छिपे कसाइयों के हवाले किए जाने का खतरा भी मंडराता रहता है। फंड की कमी और सही व्यवस्था व मेंटिनेंस का अभाव हर कहीं दिखता है। कहीं-कहीं उन पर हॉकर्स ने भी कब्जा किया हुआ है। अब तो ट्रैफिक जाम और गंदगी के बहाने उन्हें ठिकाने लगाने की कोशिशें होने लगी हैं। लंदन के ट्रैफेल्गर स्क्वायर में ट्रैफिक इंतजाम में दिक्कतों का हवाला देते हुए कोई २० वर्ष पहले वहां दाना बेचने और खिलाने वालों को बैन कर दिया गया था। २०१३ में ग्रांट रोड कबूतरखाने के कबूतरों के घेरे में मोटरसाइकिल के फिसल जाने से एक बीएमसी इंजीनियर एकनाथ झोंडले की मौत के बाद मुंबई के कबूतरखानों को भी हटाए जाने के लिए बीएमसी में प्रस्ताव ही नहीं लाया गया, बल्कि आठ दिनों के भीतर नवजीवन सोसायटी, मिनर्वा और नॉवेल्टी थियेटरों के पास तीन कबूतरखाने हटा भी दिए गए। दादर कबूतरखाने के विरुद्ध भी कार्रवाई की गई। स्थानीय नागरिकों की शिकायत के बाद गेटवे ऑफ इंडिया, गिरगांव चौपाटी और खार रोड के कबूतरखानों को भी हालांकि बंद कर दिया गया, पर लोगों ने कबूतरों को दाना डालना बंद नहीं किया। यही शिकायत दादर, बोरिवली (पूर्व) और अंधेरी में लोखंडवाला के इन्फिनिटी मॉल के पास के कबूतखाने को लेकर भी है।
बॉम्बे वेटरनरी कॉलेज के एक अध्ययन के मुताबिक, कबूतरखानों में चूंकि दाना सहज उपलब्ध है, इसलिए मुंबई में अन्य पक्षियों के मुकाबले कबूतरों की संख्या बढ़ रही है। पेड़ों की संख्या कम होने से कबूतर रिहाइशी इलाकों में घर बनाने लगे हैं। उनकी बीट से गंदगी पैदा होती है। नतीजतन, श्वसन रोग, फेफड़ों और एलर्जी संबंधित बीमारियां भी। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग और दमा के रोगी ही नहीं, कुत्ते-बिल्ली तक इसके निशाने पर हैं। इसकी चपेट से इमारत और कारें ही नहीं, पत्थर, कंक्रीट और धातु सरीखी बेजान चीजें भी नहीं बच पाई हैं। कुछ समय पहले बोरिवली (पूर्व) की नीलकमल हाउसिंग सोसायटी में जयश्री नामक ५३ वर्षीया महिला की मौत के पीछे डॉक्टरों ने कबूतरों की बीट से फेफड़ों में हुए प्रदूषण जन्य को ही जिम्मेदार ठहराया था।
एक पक्षीप्रेमी ने बताया कि फलदार पेड़ों वाले बाग-बागीचों और वन संपदा के लगातार क्षरण से पक्षी ज्यादा से ज्यादा मनुष्यों द्वारा दिए जानेवाले भोजन पर निर्भर होते जा रहे हैं। पक्षियों की हितरक्षा के लिए कार्यरत संगठन समकित युवा मंडल के स्वयंसेवी मनीष शाह ने बताया, ‘कबूतरखाने पक्षियों का भोजनालय ही नहीं हैं, ये इस शहर के इतिहास का हिस्सा भी हैं।’ बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के डॉयरेक्टर डॉ. असद आर. रहमानी ने आगाह किया, ‘नैसर्गिक वासस्थान समझकर मुंबई आनेवाले पक्षियों को विमुख करने के किसी भी प्रयास से बचा जाना चाहिए। नहीं तो धीरे-धीरे पक्षी हमारी नजरों से ओझल हो जाएंगे। रह जाएंगे केवल चील-कौवे जैसे मानवीय रिहाइश में रहनेवाले पक्षी।’
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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