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सूर्य और मकर संक्रांति संकल्प

शीतल अवस्थी

सूर्य हिंदू धर्म के पंचदेवों में प्रमुख देवता है। सूर्य को प्रत्यक्ष देवता भी माना जाता है। पूरे जगत की प्राणशक्ति होने से वह जगत पिता भी कहलाते हैं, जबकि मकर संक्रांति का पर्व जीवन में संकल्प लेने का अवसर है। संक्रांति यानी सम्यक क्रांति। इस दिन से सूर्य की कांति में परिवर्तन शुरू हो जाता है। वह दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर अभिमुख हो जाता है। इस आधार पर मकर संक्रांति का पर्व सूर्य के समक्ष संकल्प का पर्व कहा जाता है।
मकर संक्रांति का सूर्य के राशियों में भ्रमण से गहरा संबंध है। वैज्ञानिक स्तर पर यह पर्व एक महान खगोलीय घटना है और आध्यात्मिक स्तर पर मकर संक्रांति सूर्यदेव के उत्तरायण में प्रवेश की वजह से बहुत महत्वपूर्ण बदलाव का सूचक है। सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। पौराणिक मान्यताओं में सूर्य को महर्षि कश्यप और अदिति का पुत्र माना गया है। उनकी माता के नाम से ही वह आदित्य भी कहलाते हैं। शास्त्रों के मुताबिक, सूर्यदेव के पुत्र शनि और यम व पुत्री यमुना भी प्रमुख पूजनीय देवी-देवता हैं। इसी तरह संकटमोचक देवता श्री हनुमान के गुरु भी सूर्यदेव ही हैं। यही कारण है कि सूर्य देव की उपासना शक्ति, सिद्धि, स्वास्थ्य, सम्मान, यश, ऐश्वर्य और खूबसूरती देने वाली मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

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