मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : एसआईआर जिंदा रहे मताधिकार

तड़का : एसआईआर जिंदा रहे मताधिकार

कविता श्रीवास्तव

देश में मतदाता सूचियों के एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (विशेष गहन पुनरीक्षण) को लेकर जबरदस्त राजनीतिक बवाल सा मचा है। यह काम निर्वाचन आयोग का है। एसआईआर का उद्देश्य होता है मतदाता सूची को सामयिक और नवीनतम बनाना। कुछ अंतराल के बाद मतदाता सूची में शुद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना होता है, ताकि चुनाव प्रक्रिया में फर्जी, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें और योग्य नागरिकों को मतदान का अधिकार मिले। हालांकि, इसके उद्देश्य जितने प्रशासनिक हैं, इसे लेकर राजनीति उतनी ही तीखी हो गई है। ऐसा इसलिए कि ताजा तौर पर एक-दो या दस-बीस नहीं, लाखों नाम मतदाता सूची से डिलीट किए जा रहे हैं। देश के अनेक राज्यों में इतनी बड़ी संख्या में मतदाता सूची से नाम हटाया जाना चिंताजनक है। विपक्षी दलों का आरोप है कि एसआईआर की आड़ में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, खासकर गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और वंचित वर्गों के। उनका कहना है कि कई लोगों के पास आवश्यक दस्तावेज नहीं होने या जानकारी के अभाव में उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं। यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। विपक्ष इसे ‘वोटबंदी’ करार दे रहा है और चुनाव आयोग पर सत्ता पक्ष के दबाव में काम करने का आरोप लगा रहा है। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग का कहना है कि एसआईआर संवैधानिक प्रक्रिया है। फर्जी मतदान न हो इसलिए यदि कोई नाम नियमों के अनुरूप नहीं है तो उसे हटाया जा रहा है। यह भी कहा है कि जिन नागरिकों के नाम हटे हैं, उन्हें पुन: जोड़ने के लिए पर्याप्त अवसर और प्रक्रिया उपलब्ध कराई गई है। हालांकि, एसआईआर एक नियमित प्रक्रिया है, जो समय-समय पर की जाती रही है। लेकिन वर्तमान में यह प्रक्रिया जबरदस्त विवादों में आई है। निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों ने उसकी विश्वसनीयता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस राजनीतिक बवाल का असर सड़कों से लेकर संसद तक दिख रहा है। कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन, ज्ञापन और चुनाव आयोग कार्यालयों के घेराव किए गए हैं। संसद में विपक्ष ने इस मुद्दे पर हंगामा कर कार्यवाही बाधित की, वहीं सोशल मीडिया पर भी एसआईआर को लेकर तीखी बहस चल रही है। दरअसल, समस्या एसआईआर से अधिक उसके क्रियान्वयन और संचार की है। विपक्ष ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि कुछ निश्चित मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है। सवाल यह भी है कि इतने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में अवैध तरीके से नाम दर्ज वैâसे हुए। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? यदि एसआईआर प्रक्रिया को और अधिक संवेदनशील, तकनीकी रूप से मजबूत और जनहितैषी बनाया जाए तो विवाद काफी हद तक कम हो सकता है। लोकतंत्र में मताधिकार सर्वोच्च अधिकार है और उसकी रक्षा सभी की जिम्मेदारी है। एसआईआर जैसे कदम तभी सार्थक होंगे, जब वे निष्पक्षता, पारदर्शिता और जनता के विश्वास के साथ लागू किए जाएं।

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