कविता श्रीवास्तव
सबको सलाह दी गई है कि गाड़ी कम चलाइए, सोना मत खरीदिए, तेल कम खाइए, घर बैठकर काम कीजिए। फिर देखते ही देखते सोने पर आयात शुल्क बढ़ गया, पेट्रोल महंगा हो गया। अब सब्जियों के दाम आसमान छूने लगे हैं। चुनावी सभाओं में जहां देश की मजबूती और खुशहाली के लंबे-लंबे दावे किए जा रहे थे, वहीं चुनाव खत्म होते ही आम आदमी की जेब पर महंगाई का ऐस् ाा बोझ पड़ा है कि रसोई का बजट पूरी तरह बिगड़ गया। अब हालात ऐसे हैं कि मंत्री अपने काफिले छोटे कर रहे हैं। मुख्यमंत्री सादगी का संदेश देते दिख रहे हैं। विधायक ट्रेन में सफर कर तस्वीरें भेज रहे हैं। लेकिन इन प्रतीकात्मक कदमों के बीच बाजार में सब्जियों के दाम नीचे आने का नाम नहीं ले रहे हैं। आम जनता मंत्रियों की सादगी का प्रदर्शन तो देख रही है लेकिन महंगाई पर लगाम नहीं लग रही है। वैसे, महाराष्ट्र में इस बार भीषण गर्मी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। मुंबई महानगर क्षेत्र में मई की शुरुआत से ही सब्जियों की कीमतों में औसतन ५० प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दादर, बोरीवली, मुलुंड या नई मुंबई हर जगह सब्जी मंडियों का हाल एक जैसा है। फिलहाल टमाटर ८० रुपए किलो, हरी मिर्च १५० रुपए किलो और प्रâेंच बीन्स २०० रुपए किलो तक पहुंच चुकी है। गर्मी के मौसम में शरबत और सलाद के लिए जरूरी नींबू भी महंगा हो गया है। पत्ता गोभी, फूलगोभी, गवार, पापड़ी जैसी सब्जियां अब आम परिवारों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। सलाद बनाना भी अब किसी विलासिता से कम नहीं लग रहा। धनिया और पालक जैसी सामान्य हरी सब्जियां भी अब जेब पर भारी पड़ रही हैं। यह समझ आता है कि इस महंगाई की बड़ी वजह भीषण गर्मी और कम होती आपूर्ति भी है। पुणे, सातारा, सोलापुर और नासिक जैसे प्रमुख आपूर्ति क्षेत्रों में लू और पानी की कमी ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है। तेज धूप के कारण पत्तेदार सब्जियां खेतों में ही मुरझा रही हैं। जो सब्जियां मंडियों तक पहुंच रही हैं, वे भी परिवहन के दौरान गर्मी से जल्दी खराब हो रही हैं। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ रहा है। इन दिनों वाशी स्थित एपीएमसी बाजार में सब्जियों की आवक में २० से ३० प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। व्यापारी बताते हैं की अगले कुछ हफ्तों तक राहत मिलने की उम्मीद कम है। हां, गर्मी बढ़ने के साथ स्थिति और गंभीर हो सकती है। इस बढ़ती महंगाई का सबसे ज्यादा असर मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ा है। रसोई चलाना चुनौती बन गया है। गृहिणियां रोजाना बजट में कटौती कर रही हैं। कई घरों में अब सब्जियों की जगह सस्ती चीजों से काम चलाया जा रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि अब मजाक-मजाक में कही जाने वाली बात-‘झालमुड़ी खाकर काम चलाओ’-हकीकत बनती दिख रही है। अगर यही स्थिति रही तो आम आदमी की थाली से सब्जियां गायब हो जाएंगी और सचमुच घर-घर में झालमुड़ी का इंतजाम करना पड़ेगा। महंगाई पर नियंत्रण अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी और रसोई बचाने का सवाल बन चुका है।
