कविता श्रीवास्तव
भारत में `गधा’ अकेला ऐसा लोकप्रिय पशु है, जिसका नाम लगभग हर किसी की जुबान पर होता है। मजेदार बात यह है कि लोग अक्सर उन्हें `मूर्ख’ समझते हैं, लेकिन असल में गधे बहुत समझदार और वफादार होते हैं। उनकी याददाश्त बहुत तेज होती है और वे २५ साल पुरानी जगह या पुराने साथी को भी पहचान सकते हैं। लगभग डेढ़ दशक से भारत में गधों की संख्या तेजी से घट रही है। कभी गांवों, कस्बों और शहरों में मिट्टी, र्इंट, रेत, पानी और अन्य भारी सामान ढोने में इनकी भारी मांग रही है। र्इंट-भट्ठों, निर्माण कार्यों तथा परिवहन के छोटे साधन के रूप में गधे ही उपयोगी थे। लेकिन अब गधा धीरे-धीरे हमारी नजरों से ओझल होता जा रहा है। केंद्र सरकार की २०वीं पशुधन गणना के अनुसार, भारत में गधों की संख्या घटकर लगभग १.२३ लाख रह गई। वर्ष २०१२ में यह संख्या करीब ३.२ लाख थी। लगभग ६१ प्रतिशत की भारी गिरावट सिर्फ एक पशु की घटती संख्या का मामला नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैव विविधता के लिए चेतावनी है। जिस पशु को अक्सर उपहास का विषय बनाया जाता है, वही सदियों से मानव सभ्यता का मौन सहयोगी रहा है। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में जहां आधुनिक वाहन नहीं पहुंच पाते, वहां गधा आज भी जीवनरेखा है। वैष्णो देवी, केदारनाथ, यमुनोत्री जैसे दुर्गम पहाड़ियों के पवित्र स्थानों तक आज भी गधे और खच्चर ही सारा सामान पहुंचाते हैं। कम खर्च में अधिक श्रम करने वाला यह जीव गरीब और श्रमिक वर्ग का सबसे भरोसेमंद साथी रहा है। आज आधुनिक मशीनों, ट्रैक्टरों और छोटे मालवाहक वाहनों ने इसकी उपयोगिता को कम कर दिया है। भारतीय संस्कृति और धर्मग्रंथों में भी गधे का महत्व दर्ज है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में पशुधन को समृद्धि का आधार माना गया है। मार्वंâडेय पुराण में वर्णित माता शीतला का वाहन गधा माना गया है। शीतला माता रोगों से रक्षा और स्वास्थ्य की देवी हैं और उनका गधे पर आरूढ़ होना यह संकेत देता है कि यह पशु केवल श्रम का प्रतीक नहीं, बल्कि धैर्य, सेवा और सहनशीलता का भी प्रतीक है। कुछ लोक परंपराओं में गधे को विनम्रता और नि:स्वार्थ सेवा का प्रतीक माना गया है। फिर भी गधे अक्सर उपेक्षा और अमानवीय व्यवहार का शिकार होते हैं। क्षमता से ज्यादा बोझ ढोना, पर्याप्त भोजन-पानी नहीं मिलना और बीमार होने पर छोड़ दिया जाना उनकी घटती संख्या की वजहें हैं। गधों के संरक्षण के लिए विशेष प्रजनन केंद्र, पशुपालकों को आर्थिक सहायता और इनके स्वास्थ्य की नियमित देखभाल जरूरी है। गधों की घटती संख्या को गंभीर मानते हुए केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने २०२४ से `राष्ट्रीय पशुधन मिशन’ में गधे को शामिल किया है। सरकार गधा पालन के लिए ५० प्रतिशत तक सब्सिडी दे रही है। गधे को हम केवल मजाक का विषय नहीं, बल्कि उपयोगी जीव के रूप में देखें। वे भी करुणा, संवेदनशीलता और प्राकृतिक संरक्षण के हकदार हैं।
