मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : सनातन की मर्यादा भूलते कथाकार

तड़का : सनातन की मर्यादा भूलते कथाकार

कविता श्रीवास्तव

सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यापकता है। जहां भगवान श्रीराम की मर्यादा भी पूजनीय है और भगवान श्रीकृष्ण की लीला भी। अयोध्या की आस्था भी करोड़ों लोगों के हृदय में बसती है और वृंदावन की भक्ति भी। ऐसे में जब धर्म के किसी मंच से ही इन आराध्यों की तुलना होने लगे और एक अपना और दूसरा पराया नजर आने लगे, तो यह स्वीकार्य नहीं होगा। बागेश्वर धाम के कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में रामकथा के दौरान भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण की तुलना करते हुए श्रीकृष्ण के त्रिभंगी स्वरूप को टेढ़ा बताया। उन्होंने अयोध्या को अपना और वृंदावन को दूसरा बताते हुए ऐसी टिप्पणियां कीं, जिनसे कृष्णभक्तों और ब्रज के संतों में नाराजगी फैल गई। विवाद बढ़ा तो धीरेंद्र शास्त्री को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि उनकी बात का गलत अर्थ निकाला गया। उन्होंने कहा कि किसी की भावना आहत हुई है तो वे क्षमा मांगते हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है? भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण सनातन परंपरा के दो ऐसे आराध्य हैं, जिनकी महिमा युगों से गाई जाती है। श्रीराम के धनुष और श्रीकृष्ण की बांसुरी में धर्म और जीवन के अलग-अलग संदेश हैं। श्रीराम का आदर्श हमें कर्तव्य सिखाता है, तो श्रीकृष्ण का गीता संदेश कर्म, ज्ञान और विवेक का मार्ग दिखाता है। कथावाचकों को भाषा की मर्यादा और भावों की गंभीरता का ध्यान रखना चाहिए। व्यासपीठ लोकप्रियता का मंच नहीं, जिम्मेदारी का स्थान है। लेकिन आज सोशल मीडिया के दौर में सबको सुर्खियों में बने रहने की आदत है। लेकिन विवादित बयान देना, देवी-देवताओं के स्वरूप पर कटाक्ष करना या भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना उचित नहीं है। सनातन धर्म की रक्षा का अर्थ केवल बड़े-बड़े आयोजन करना नहीं, बल्कि उसकी परंपराओं, उसके आराध्यों और उसके अनुयायियों के सम्मान की रक्षा करना भी है। भगवान श्रीकृष्ण का त्रिभंगी स्वरूप उपहास का विषय नहीं है। उनके इसी स्वरूप में करोड़ों भक्त अपने ठाकुरजी के दर्शन करते हैं। उनकी बांसुरी में प्रेम है, उनकी मुस्कान में करुणा है और उनकी लीलाओं में जीवन का गहरा दर्शन है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने माफी मांगकर विवाद को शांत करने की कोशिश की है। लेकिन माफी के साथ आत्ममंथन भी होना चाहिए। धर्म के नाम पर समाज को जोड़ने की बात होनी चाहिए, न कि अयोध्या और वृंदावन, रामभक्त और कृष्णभक्त के बीच विभाजन पैदा करने की। सनातन संस्कृति किसी एक व्यक्ति की लोकप्रियता से बहुत बड़ी है। भगवान करोड़ों लोगों के हृदय में विराजमान हैं। उनकी महिमा किसी कथावाचक के शब्दों की मोहताज नहीं है। कथावाचक धर्म की बात करें, धर्म के आदर्शों की बात करें, लेकिन ऐसी भाषा से बचें जो भक्तों के मन को चोट पहुंचाए। सनातन की शक्ति उसकी एकता, उसकी विविधता और उसके अटूट विश्वास में है।
जय श्रीराम। जय श्रीकृष्ण।

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