कविता श्रीवास्तव
आज आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि है। आज देश-विदेश में विजयादशमी बड़े धूमधाम से मनाई जा रही है। यह सनातन संस्कृति और देश के तीज-त्यौहारों का प्रमुख उत्सव है। नवरात्रि कल ही बीती है। इस बार तृतीया तिथि दो दिन पड़ने से नौ दिनों वाली नवरात्रि दस दिनों की हो गई थी। आज ही के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। आज जगह-जगह रावण के पुतले का दहन होगा। यह प्रेरक पर्व असत्य पर सत्य की जीत तथा बुराइयों पर अच्छाई के विजय का संदेश देता है। यह स्मरण कराता है कि बुराई करनेवाला कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो वह कभी सफल नहीं हो सकता है। अच्छाइयों के सामने उसकी पराजय सुनिश्चित है। अखंड ब्रह्मांड महानायक मर्यादापुरुषोत्तम प्रभु श्रीरामचंद्र ने राजसत्ता का सहजता से त्याग किया, उनमें कोई लोलुपता ही नहीं थी। श्रीराम ने धर्म का मार्ग चुना और वनवास स्वीकार किया। रावण लंकापति था। वह महातपस्वी, प्रकांड विद्वान और पराक्रमी था। किंतु अभिमान व अधर्म ने रावण को परास्त कर दिया। हमारे धर्मग्रंथों में श्रीराम को सबसे आदर्श पुरुष माना गया है। प्रभु श्री रामचंद्रजी के जीवन से हमें धैर्य, संयम, न्याय, समझदारी और समर्पण की प्रेरणा मिलती है। कठिनाइयों का डटकर सामना करने और मर्यादा में बने रहने की सीख मिलती है। जीवन में आदर्श चरित्र और परोपकारी सद््गुण अपनाने की प्रेरणा मिलती है। दशहरे का पर्व बताता है कि अधर्म, अहंकार, अत्याचार और अनैतिकता के रावणी चरित्र का अंत तय है। विजय अंतत: सत्य, धर्म, न्याय और अच्छाई की होती है। रावण दशानन था। यानी उसके दस सिर थे। रामलीलाओं के मंचों पर, टीवी व फिल्मी स्क्रीन पर और तस्वीरों में रावण का यही स्वरूप हम देखते आए हैं। कहते हैं कि रावण छह दर्शन और चारों वेदों का ज्ञाता था। इसीलिए दस सिर उसके दस गुना ज्ञान और शक्ति के प्रतीक भी बताए जाते हैं। कुछ लोग इसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसी उसकी दस बुराइयों से भी जोड़ते हैं। रावण भगवान शिव का परम भक्त था। उसने वैâलाश पर्वत उठाते समय शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी। आज भी हर जगह रावण रचित उसी शिव तांडव स्तोत्र का पाठ किया जाता है। रावण की शिव भक्ति अद्वितीय थी। रावण की बुराई का मुख्य कारण उसका अत्यधिक अहंकार था। उसने ज्ञान और शक्ति के बावजूद धर्म का रास्ता छोड़कर अधर्म का मार्ग अपनाया। सीता हरण उसके अंत का कारण बना। उसने अत्याचार और अन्यायपूर्ण व्यवहार से अपने भाई विभीषण की उपेक्षा की। शांति प्रस्तावों को ठुकराने से उसका पतन हुआ। रावण दहन से यही सीख मिलती है कि हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या आदि से दूर रहें। प्रभु श्रीराम जैसा चरित्र और उनकी तरह त्याग का भाव रखते हुए अपने धर्म और अपनी निष्ठा पर अडिग रहें।
