मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात: गोमाता पर सियासत!

इस्लाम की बात: गोमाता पर सियासत!

सैयद सलमान / मुंबई

उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन पर इन दिनों एक ऐसी अनूठी इबारत लिखी जा रही है, जो पारंपरिक राजनीतिक विशेषज्ञों के बने-बनाए समीकरणों को झकझोरने के लिए काफी है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गोरक्षा यात्रा’ के दौरान जो सामाजिक दृश्य उभरे हैं, वे चौंकानेवाले और भारतीय समाज की अंतर्निहित चेतना को गहराई तक प्रभावित करनेवाले हैं। इस यात्रा के दौरान कई पड़ावों पर मुस्लिम समुदाय के प्रबुद्ध नागरिकों और संगठनों ने न केवल शंकराचार्य का स्वागत किया, बल्कि गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने की मांग का खुलकर और पूरे अधिकार के साथ समर्थन भी किया।
सकारात्मक शुरुआत
सदियों से जिस देश में गोमाता को लेकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की फसलें काटी जाती रही हों, वहां अल्पसंख्यक समाज का यह कदम एक युगांतरकारी घटना की तरह है। यह उस नैरेटिव पर करारी चोट है, जो यह मानकर चलता है कि गोरक्षा केवल बहुसंख्यक समाज का ही सरोकार हो सकती है। मुस्लिम समाज की इस पहल का सहर्ष स्वागत होना चाहिए, क्योंकि यह देश के ताने-बाने को मजबूत करनेवाली एक ऐतिहासिक और सकारात्मक शुरुआत है।
लेकिन विडंबना देखिए, जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और गोरक्षा को भाजपा ने अपनी राजनीति का मुख्य आधारस्तंभ बनाया, वही पार्टी और उसके शीर्ष नेता आज इस अभूतपूर्व सामाजिक सहमति पर पूरी तरह असहज और मौन नजर आ रहे हैं। जब देश के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदाय इस बात पर एकमत हो रहे हैं कि गाय को सम्मानजनक दर्जा मिलना चाहिए, तब केंद्र सरकार और भाजपा के बड़े नेताओं के बयान बेहद गोलमोल और टालमटोल भरे नजर आते हैं। यह हिचकिचाहट उस राजनीतिक कथनी और करनी के अंतर्विरोध का उदाहरण है, जो चुनावी रैलियों में तो ‘गौमाता’ के नाम पर जज्बात उभारती है, लेकिन जब नीतिगत पैâसले लेने का वक्त आता है, तो न जाने किस अज्ञात दबाव में ठिठक जाती है।
भाजपा का दोहरापन
इस आनाकानी के पीछे के आर्थिक और व्यापारिक सच को खंगालना बेहद जरूरी है। यह एक कड़वा और दस्तावेजी सच है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े बीफ और मांस निर्यातकों में से एक है। इस पूरे वैश्विक व्यापार को चलाने वाले बड़े उद्योगपतियों और कंपनियों में से अधिकांश का सीधा संबंध किसी न किसी रूप में सत्ता प्रतिष्ठानों या बहुसंख्यक समुदाय के रसूखदार लोगों से रहा है। भाजपा जब विपक्ष में थी, तब वह ‘गुलाबी क्रांति’ यानी ‘पिंक रिवोल्यूशन’ का पुरजोर विरोध करती थी, लेकिन सत्ता के गलियारों में पहुंचने के बाद इस व्यापार पर कोई ठोस अंकुश नहीं लगाया जा सका। राजनीतिक लाभ के लिए सड़कों पर गोरक्षा के नाम पर उन्माद खड़ा करना तो आसान है, लेकिन देश के बड़े बूचड़खानों और निर्यात तंत्र पर ताला लगाना शायद आर्थिक नीतियों और कॉरपोरेट चंदे के गणित को रास नहीं आता। इसी दोहरेपन के कारण भाजपा आज कटघरे में खड़ी है। अगर सरकार वाकई गोवंश के संरक्षण को लेकर गंभीर होती तो बीफ एक्सपोर्ट को लेकर उसकी नीतियां इतनी लचीली और व्यापार-समर्थक नहीं होतीं।
अचरज है कि जब मुस्लिम समाज खुद आगे बढ़कर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर रहा है तो केंद्र सरकार के कदम क्यों डगमगा रहे हैं? क्या सत्ता को इस बात का डर है कि अगर यह मुद्दा हमेशा के लिए सुलझ गया तो भविष्य के चुनावों में ध्रुवीकरण के लिए कौन-सा कार्ड इस्तेमाल किया जाएगा? राजनीति की यह पुरानी फितरत रही है कि वह समस्याओं के समाधान से ज्यादा उन्हें जिंदा रखने में अपना फायदा देखती है।
साजिश व्यापार और सत्ता!
भारतीय समाज की सामूहिक चेतना और देश के बहुसंख्यक समाज की गहरी आस्था को देखते हुए, गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का निर्णय समय की सबसे बड़ी मांग है। यदि यह ऐतिहासिक निर्णय ले लिया जाता है तो यह देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता के लिए एक संजीवनी साबित होगा। यह पैâसला उन तमाम अराजक तत्वों के मुंह पर ताला लगा देगा जो गोरक्षा की आड़ में कानून हाथ में लेते हैं और मॉब लिंचिंग जैसी अमानवीय घटनाओं को अंजाम देकर देश की छवि को वैश्विक स्तर पर धूमिल करते हैं। जब गाय को एक संवैधानिक और राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त हो जाएगा तो उसकी सुरक्षा का जिम्मा किसी भीड़ या अनियंत्रित संगठन का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर राज्य और कानून व्यवस्था का होगा।
इसके अलावा, यह कदम भारत की उस साझा संस्कृति को एक नई पहचान देगा, जहां दोनों प्रमुख समाज मिलकर एक राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान करेंगे। यह निर्णय राजनीतिक नफा-नुकसान से ऊपर उठकर लिया जाना चाहिए। देश की संसद को भी अब चुनावी नफे-नुकसान के चश्मे को उतारकर, समाज के इस स्वत:स्फूर्त संवाद को कानून का रूप देना चाहिए। यदि सरकार अब भी इस पर आनाकानी करती है तो यह माना जाएगा कि उसकी आस्था गोमाता में नहीं, बल्कि केवल गोमाता के नाम पर मिलने वाले मतों और खामोश व्यापारिक हितों में है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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