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इस्लाम की बात : विस्फोटों के बाद संदेह में है भरोसे की दीवार

सैयद सलमान, मुंबई

दिल्ली में एक बार फिर चीत्कार के बाद की खामोशी है। मानो शहर की रगों में बहनेवाले जीवन का प्रवाह थम-सा गया हो। लाल किले के पास हुआ धमाका महज एक अपराध नहीं है, यह हमारे समाज की संवेदना पर पड़ा वह निशान है, जिसे मिटने में वक्त लगेगा। बेगुनाहों की लाशें, बिखरे शीशे और घायल नागरिक सिर्फ खबरों का हिस्सा नहीं हैं, वे इस मुल्क की आत्मा पर लगे जख्म हैं। इस हादसे की आग सिर्फ दिल्ली के गली-कूचों तक सीमित नहीं रही। यह विमर्श और शंका का रूप लेकर देशभर में महसूस की गई। जबकि दूसरी तरफ सबसे ज्यादा झुलसा मुस्लिम समाज, जो वर्षों से इस तरह के हादसों के बाद निशाने पर होता है। गुनाह किसी एक का पर इलजाम सब पर। यही वह नाइंसाफी है जो किसी भी समाज की जड़ों को कमजोर कर देती है।
पहचान
असली मुसलमान की पहचान उसकी नम्रता, उसकी रहमदिली और वतन से मुहब्बत में है। इसी तरह के चेहरे रोज की जिंदगी में दिखते हैं। रमजान में इफ्तार पर दूसरे धर्मावलंबियों को बुलाते हैं, देश में सलामती की दुआ करते हैं। वही तो हैं जो इस देश की साझी तहजीब को हर रोज जिंदा रखते हैं, लेकिन अफसोस, एक आतंकी घटना उनका नाम फिर कटघरे में लाकर खड़ा कर देती है। यह समझना जरूरी है कि अपराध का कोई धर्म नहीं होता। हालांकि, इसी वाक्य का सबसे ज्यादा मजाक उड़ाया जाता है। पवित्र कुरआन जिस न्याय और दया की तालीम देता है, वह कहता है, एक बेगुनाह की जान लेना समूची इंसानियत की हत्या है। जब यह सिद्धांत इतना साफ है तो किसी मुसलमान का हिंसा का समर्थन सोचना भी असंभव है। जो अपने बच्चों को सब्र और सच्चाई सिखाता हो, वह वैâसे किसी नफरत के रास्ते पर चल सकता है? ध्यान देने की बात है कि इस बार समाज ने चुप्पी नहीं साधी। समाज के हर वर्ग ने आगे बढ़कर आतंक की निंदा की। उलेमा हों या रोजमर्रा के कामगार, सबने एक ही आवाज में यही कहा कि हमारा मजहब हमें हिंसा नहीं सिखाता। इसे महज एक बयान नहीं कहा जा सकता। दरअसल, यह उस भरोसे का इजहार है जो इस मुल्क की फिजा की असल रूह को जिंदा रखे हुए है। इसमें मुल्क के प्रति प्रेम और आतंकवाद के प्रति तिरस्कार है।
भूमिका
लेकिन असली चुनौती बयान देने के बाद खत्म नहीं होती। वो तब शुरू होती है जब खबरों और सोशल मीडिया में अफवाहें पैâलती हैं और सामूहिक मन फिर से किसी शक की आग में झुलसने लगता है। यहीं पर समाज को अपनी परिपक्वता दिखानी होती है। तब तथ्य को भावना से अलग रखकर सच को पहचानने की हिम्मत होनी चाहिए। जब कोई खबर धर्म के चश्मे से दिखाई जाने लगती है, तो इंसानियत पीछे छूट जाती है। लेकिन अब भूमिका बदलनी होगी। हर नागरिक को, हर धर्मगुरु को, हर माध्यम को इस बात पर गंभीरता से चिंतन करने की जरूरत है। दिल्ली की गलियों में अब भी स्कूल के बाहर बच्चों की कतारें लगती हैं, चाय वाले की दुकान पर पुराने दोस्त बहस करते हैं और मस्जिद की अजान के साथ मंदिर की घंटियां भी बजती हैं। ऐसे मंजर सिर्फ सह-अस्तित्व की तस्वीर नहीं होते, बल्कि एक संदेश होते हैं कि हम अलग जरूर हैं मगर हम में अलगाव नहीं है और यही संदेश आज सबसे जरूरी है, क्योंकि किसी एक की गलती को पूरे मजहब के माथे मढ़ना न सिर्फ अन्याय है, बल्कि इंसाफ की परंपरा के खिलाफ भी है। समाज तब तक स्वस्थ नहीं हो सकता जब तक वह सजा असल गुनाहगार को न दे। प्रतीक को सजा देना बंद करना होगा। आतंकवाद एक विचारधारा बन गई है। उसे मजहब का तमगा देना सही नहीं है। उसे पहचानना और उससे लड़ना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
आज जरूरत है दिल और दिमाग दोनों के सधे हुए संतुलन की। देश को सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, बल्कि संवेदना की भी हिफाजत चाहिए। जो आम नागरिक अपने बच्चों को नफरत से दूर रखने की कोशिश कर रहा है, उसे हिकारत या हाशिए पर करने से नहीं, सहयोग के जरिए विश्वास में लेना चाहिए, क्योंकि वही वो हाथ हैं जो विस्फोटों के बाद भी र्इंटें जोड़कर भरोसे की दीवार उठाने की ताकत रखते हैं। दिल्ली का यह जख्म शायद वक्त के साथ भर जाएगा, लेकिन इस जख्म का सबक सबको याद रखना होगा। वो सबक, जो बताता है कि नफरत से कोई धर्म बचता नहीं और अमन का भाव रखने से इंसानियत हारती नहीं। मुस्लिम समाज को इसी दिशा में काम करने की आज सबसे ज्यादा जरूरत है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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