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इस्लाम की बात : मुसलमानों की देशभक्ति पर शक कब तक? …जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ मोर्चे पर मुस्कुराकर शहीद हुए इम्तियाज

सैयद सलमान मुंबई

देश पहले
जम्मू के खरकोला बॉर्डर की उस सुबह को कौन भूल सकता है, जब पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और मोर्टार की गड़गड़ाहट के बीच बीएसएफ के सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद इम्तियाज ने अपने घायल शरीर से उठती हर पीड़ा को दबाते हुए गरजकर कहा था, ‘जवानों, आज खत्म कर दो इनको!’
उनकी आवाज में आदेश से ज्यादा उस मिट्टी के बेटे की पुकार थी, जिसने मातृभूमि की रक्षा को अपने प्राणों से भी बड़ा धर्म समझा। पैर लहूलुहान थे, पेट में छर्रे धंसे थे, गला सूख रहा था, लेकिन हौसला चट्टान की तरह अडिग था। इम्तियाज अपनी अंतिम सांस तक लड़ते रहे और जब वे गिरे तो वर्दी पर खून के साथ-साथ इस देश की मिट्टी भी उनके तन का गहना बन गई थी।
इम्तियाज के साथ वहीं मोर्चे पर कांस्टेबल दीपक चिंगाखम भी घायल पड़े थे। छाती में छर्रे और पैर टूटने के बावजूद उन्होंने मोर्चा छोड़ने से मना कर दिया। भाव था, ‘साहब को अकेला नहीं छोड़ूंगा!’
तब धर्म नहीं, कर्तव्य बोल रहा था। असम के दीपक और बिहार के इम्तियाज; दो शरीर, एक आत्मा, दो जिस्म, एक जान। दोनों ने साथ-साथ आखिरी सांस तक मोर्चा संभाला और साथ शहीद हुए। यही तो भारत की पहचान है, जहां इंसान पहले फर्ज निभाता है, फिर नाम या मजहब आता है।
इन दोनों वीरों को मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। लेकिन सच्चा सम्मान तो तब होता है जब देश इन नामों को याद रखे, जब स्कूल की किताबों में इनके किस्से बच्चों को सुनाए जाएं। मोहम्मद इम्तियाज, दीपक चिंगाखम अब ये सिर्फ नाम नहीं हैं, भारत की वह भावना हैं, जो इस बात का सबूत है कि हमारी सीमाओं की रक्षा धर्म, प्रांत, भाषा या जाति नहीं, कर्तव्य तय करता है।
वफादारी पर सवाल
कई लोग हैं जो आज भी मुसलमानों की वफादारी पर सवाल करते हैं, हर बार किसी घटना के बहाने उंगली उठाते हैं। मगर वे भूल जाते हैं कि यही धरती अशफाकउल्लाह खान को जन्म देती है, जो मुस्कुराते हुए फांसी के तख्ते पर चढ़ गए। यही देश ब्रिगेडियर उस्मान को याद करता है, जो ‘नौशेरा के शेर’ कहलाए और जिनके एक-एक गोले ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए। यही मिट्टी वीर अब्दुल हमीद की है, जिनके एंटी-टैंक गन से पाकिस्तान के हथियारशाला तक कांप उठे थे। और अब इसी पंक्ति में नया नाम जुड़ा है ‘मोहम्मद इम्तियाज’ जिसने पाकिस्तान के ड्रोन को निशाना बनाकर दिखा दिया कि भारत का मुसलमान सिर्फ इबादत में ही नहीं, सरहद पर भी सजदे की सी मुद्रा में वतन की हिफाजत करता है। देश का मुसलमान कभी शक की निगाहों से नहीं देखा जाना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जब भी हिंदुस्थान पर खतरा आया है, उसने कदम पीछे नहीं खींचे। चाहे १८५७ की क्रांति हो, आजादी की लड़ाई हो या आज की सीमा सुरक्षा, हर मोर्चे पर मुसलमानों का खून उसी जोश से बहा है जिस जोश से किसी भी हिंदू, बौद्ध या सिख ने बहाया। दरअसल, धर्म की दीवारें वहीं गिर जाती हैं, जहां सामने तिरंगा लहराता है। बीएसएफ का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ सैन्य कार्रवाई के अलावा इस बात की गवाही थी कि भारतीय सैनिकों का धर्म सिर्फ एक है, भारत माता की सेवा। इम्तियाज और दीपक जैसे साथी यह साबित करते हैं कि जब ‘जय हिंद’ की आवाज फिजा में गूंजती है तो वह किसी एक मजहब की नहीं, १४० करोड़ दिलों की भावना बन जाती है। आज जरूरत इस बात की है कि इस जोड़ी को उसी भाव से याद किया जाए, जैसे पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और शहीद अशफाक को याद किया जाता है। दोनों ने देश की खातिर अपनी जान हंसते-हंसते कुर्बान कर दी। दोनों का मकसद एक ही था, वतन की इज्जत पर आंच न आने देना।
अगर आज कोई मोहम्मद इम्तियाज की शहादत देखकर भी मुसलमानों की देशभक्ति पर शक करता है तो उसे इतिहास के आईने में अपनी शक्ल देखनी चाहिए। वहां उसे शहीद अशफाकउल्लाह की मुस्कान, अब्दुल हमीद की वीरता और साहस और ब्रिगेडियर उस्मान की बेखौफ दहाड़ सुनाई देगी। यह देश हमेशा उन लोगों का रहेगा, जिन्होंने अपने वजूद से पहले तिरंगे के मान को रखा। युद्धस्थल की वह धरती अब भी इम्तियाज और दीपक की सांसों और उनके देशभक्त लहू से महक रही है। शायद हवा में अब भी वह आवाज गूंजती है, ‘जवानों, आज खत्म कर दो इनको!’ यह आवाज सिर्फ एक जांबाज अफसर की नहीं, उस भारत की है जिसमें हिंदू, मुसलमान, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई सबका लहू शामिल है और सबसे बड़ी बात, यह शहादतें पाकिस्तान के मुंह पर ऐसा तमाचा हैं, जो उसे इस बात के लिए शर्मसार करती रहेंगी कि भारत के जियाले मुसलमान अपने हमवतन भाइयों के साथ मिलकर उसके हर नापाक मंसूबों पर पानी फेरते रहेंगे।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

अगर आज कोई मोहम्मद इम्तियाज की शहादत देखकर भी मुसलमानों की देशभक्ति पर शक करता है तो उसे इतिहास के आईने में अपनी शक्ल देखनी चाहिए। वहां उसे शहीद अशफाकउल्लाह की मुस्कान, अब्दुल हमीद की वीरता और साहस और ब्रिगेडियर उस्मान की बेखौफ दहाड़ सुनाई देगी। यह देश हमेशा उन लोगों का रहेगा, जिन्होंने अपने वजूद से पहले तिरंगे के मान को रखा। युद्धस्थल की वह धरती अब भी इम्तियाज और दीपक की सांसों और उनके देशभक्त लहू से महक रही है।

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