सैयद सलमान, मुंबई
अमेरिका ने ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ से जुड़ी कुछ शाखाओं को आतंकवादी संगठन घोषित कर एक बार फिर मध्य-पूर्व की राजनीति और इस्लामी मुद्दों पर चल रही पुरानी बहस को केंद्र में ला दिया है। यह पैâसला अब सिर्फ सुरक्षा नीति से जुड़ा मामला नहीं रह गया है। इस पैâसले के दूरगामी राजनीतिक, सामाजिक और कूटनीतिक प्रभाव भी पड़ने हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
न्याय संगत
मुस्लिम ब्रदरहुड की शुरुआत लगभग एक सदी पहले मिस्र में एक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के रूप में हुई थी। इसका उद्देश्य इस्लामी मूल्यों के आधार पर समाज सुधार, शिक्षा और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना था। समय के साथ-साथ यह आंदोलन कई देशों में अलग-अलग रूपों में पैâला। कहीं राजनीतिक दल के रूप में, कहीं सामाजिक संगठन के रूप में और कहीं सत्ता विरोधी आंदोलन के तौर पर। इसी विविधता ने इस नाम को समर्थकों और आलोचकों के बीच एक तरह से विवादित बना दिया।
अमेरिका का ताजा कदम एक बार फिर इस मुद्दे को गर्म कर रहा है। वाशिंगटन का तर्क है कि मुस्लिम ब्रदरहुड की कुछ शाखाएं हिंसा, कट्टरपंथ और आतंकवादी नेटवर्क को वैचारिक या व्यावहारिक समर्थन देती रही हैं, इसलिए उन्हें अलग-अलग करके निशाना बनाना जरूरी है, लेकिन आलोचक पूछते हैं कि क्या एक पूरे वैचारिक आंदोलन को उसके कुछ हिस्सों के आधार पर कटघरे में खड़ा करना न्याय संगत है। संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र जैसे देशों ने अमेरिकी निर्णय का स्वागत किया है। इन देशों का मानना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड उनकी आंतरिक स्थिरता के लिए खतरा रहा है और इस संगठन ने सत्ता में आने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया, लेकिन सत्ता में पहुंचने के बाद असहिष्णु रवैया अपनाया। उनके लिए अमेरिका का यह पैâसला लंबे समय से चली आ रही उनकी नीति की पुष्टि करता है।
इसके उलट, तुर्की और कतर जैसे देशों की स्थिति अलग है। इन देशों ने अतीत में मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े राजनीतिक दलों या नेताओं को शरण और समर्थन दिया है। उनके लिए यह संगठन सिर्फ सुरक्षा का सवाल न होकर, क्षेत्रीय राजनीति और वैचारिक प्रभाव का भी माध्यम रहा है। ऐसे में अमेरिकी कदम इन देशों के साथ उसके रिश्तों में तनाव पैदा कर सकता है और मध्य-पूर्व के भीतर पहले से मौजूद खेमेबंदी को और बढ़ा सकता है। एक बात तय है कि इस पैâसले का असर सिर्फ सरकारों तक सीमित नहीं रहेगा। जिन देशों में मुस्लिम ब्रदरहुड या उससे प्रेरित संगठनों की सामाजिक जड़ें मजबूत हैं, वहां आम लोगों के बीच असंतोष बढ़ सकता है। कई जगह यह संगठन स्कूल, अस्पताल और राहत कार्यों से जुड़ा रहा है। ऐसे में उसे सीधे आतंकवाद से जोड़ने से आम समर्थकों और कट्टरपंथियों के बीच की रेखा धुंधली होने का खतरा है।
लक्ष्मण रेखा!
सबसे गंभीर सवाल आतंकवाद की बदलती परिभाषा और वैश्विक सुरक्षा के मापदंडों को लेकर है। यदि हर उस संगठन को आतंकी घोषित किया जाने लगा जो पश्चिमी मान्यताओं से इतर किसी धार्मिक-राजनीतिक ढांचे की बात करता है तो भविष्य में संवाद की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक शून्यता हमेशा अराजकता को जन्म देती है। भारत जैसे देशों के लिए, जो लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का दंश झेल रहे हैं, यह स्थिति एक अलग चुनौती पेश करती है। भारत ने हमेशा आतंकवाद पर कड़ा प्रहार किया है, लेकिन साथ ही समाज की वैचारिक विविधता का सम्मान भी किया है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर ‘विचारधारा बनाम सुरक्षा’ की यह जंग भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर सुरक्षा की लक्ष्मण रेखा कहां खींची जाए।
भारत जैसे देशों के लिए यह घटनाक्रम एक अलग दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। भारत आतंकवाद से पीड़ित रहा है, लेकिन साथ ही उसने इस्लाम और मुस्लिम समाज को एकरूप मानने की भूल से बचने की कोशिश की है इसलिए अमेरिकी पैâसला सोचने पर मजबूर करता है कि वैश्विक स्तर पर आतंकवाद से लड़ते हुए वैचारिक विविधता और राजनीतिक अभिव्यक्ति की जगह वैâसे बचाई जाए। मुस्लिम ब्रदरहुड को लेकर अमेरिका का यह निर्णय किसी एक संगठन से अधिक उस व्यापक बहस को छूता है, जिसमें सुरक्षा, राजनीति और विचारधारा आपस में उलझे हुए हैं। यह तय करना अभी बाकी है कि यह पैâसला मध्य-पूर्व में स्थिरता लाएगा या नई दरारें पैदा करेगा। इतना साफ है कि यह मात्र एक प्रशासनिक घोषणा न होकर आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा को प्रभावित करने वाला कदम है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
