मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : ‘नक्शे, पनडुब्बियां और दोस्ती का भ्रम: आखिर संदेश क्या है?'

तीर-ए-तौसीफ : ‘नक्शे, पनडुब्बियां और दोस्ती का भ्रम: आखिर संदेश क्या है?’

तौसीफ कुरैशी

भू-राजनीति में शब्दों से अधिक महत्व प्रतीकों का होता है। कई बार जो बात तोपें नहीं कहतीं, वह एक नक्शा कह देता है। जो संदेश किसी राष्ट्रपति के भाषण से नहीं निकलता, वह किसी सैन्य कमान के नाम परिवर्तन से निकल आता है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को केवल घटनाओं से नहीं, संकेतों से भी पढ़ना पड़ता है। पिछले दिनों अमेरिका द्वारा अपनी सैन्य संरचना में ‘इंडो’ शब्द को कम महत्व देने की चर्चा हुई और उसकी एक आधिकारिक वेबसाइट पर भारत का ऐसा नक्शा दिखाई दिया, जिसमें पीओके और अक्साई चिन को भारत के मुख्य मानचित्र से अलग दिखाया गया। हो सकता है इसे तकनीकी त्रुटि कहा जाए, लेकिन भू-राजनीति में त्रुटियां भी संदेश बन जाती हैं। सवाल यह नहीं है कि गलती हुई या नहीं। सवाल यह है कि इससे किसका मनोबल बढ़ता है और किसकी चिंता बढ़ती है। इसी बीच खबर आती है कि पाकिस्तान १९७१ के बाद पहली बार बंगाल की खाड़ी में अपनी पनडुब्बी भेजने की तैयारी कर रहा है। यह कोई साधारण सैन्य गतिविधि नहीं है। १९७१ की हार के बाद पाकिस्तान की नौसैनिक उपस्थिति इस क्षेत्र से लगभग समाप्त हो गई थी। आज वह चीन से प्राप्त हंगोर श्रेणी की पनडुब्बी के सहारे फिर उसी समुद्री क्षेत्र में लौटने का सपना देख रहा है। यहां प्रश्न केवल पाकिस्तान का नहीं है। प्रश्न चीन का भी है। क्योंकि यह पनडुब्बी पाकिस्तान की अपनी तकनीकी क्षमता का परिणाम नहीं बल्कि चीन की सामरिक सहायता का विस्तार है। हिंद महासागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक चीन वर्षों से अपने प्रभाव का जाल बुन रहा है। श्रीलंका, म्यांमार, ग्वादर और अब पाकिस्तान की समुद्री महत्वाकांक्षाएं उसी रणनीति की कड़ियां प्रतीत होती हैं। दूसरी ओर बांग्लादेश के साथ पाकिस्तान के बढ़ते संपर्क भी ध्यान खींचते हैं। दक्षिण एशिया का सामरिक नक्शा बदल रहा है। पुराने समीकरण ढीले पड़ रहे हैं और नए समीकरण बन रहे हैं। ऐसे समय में भारत को केवल मित्रताओं के भरोसे नहीं रहना चाहिए। भारत-अमेरिका संबंध निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। अमेरिका जब भारत की जरूरत महसूस करता है तो उसे हिंद-प्रशांत का केंद्रीय स्तंभ बताता है और जब उसके हित बदलते हैं तो प्राथमिकताओं की भाषा भी बदल जाती है। यहीं सबसे बड़ा प्रश्न उठता है। क्या भारत अपनी सुरक्षा और कूटनीति का आधार दूसरों की घोषणाओं पर रख सकता है? क्या किसी विदेशी नेता का आश्वासन हमारी सामरिक गारंटी है? इतिहास कहता है कि नहीं। १९७१ में भी भारत ने अपनी लड़ाई अपने दम पर लड़ी थी। कारगिल में भी भारतीय सैनिकों ने अपने बल पर विजय हासिल की थी और भविष्य में भी भारत की सुरक्षा का आधार भारतीय शक्ति ही होगी, किसी महाशक्ति का आश्वासन नहीं। नक्शे बदलते हैं, बयान बदलते हैं, दोस्तियां बदलती हैं। लेकिन राष्ट्रों के हित नहीं बदलते। इसलिए जब किसी नक्शे में भारत छोटा दिखाया जाए, जब किसी समुद्र में अचानक पनडुब्बियां दिखाई देने लगें, जब मित्र और साझेदार नई भाषा बोलने लगें, तब शोर नहीं बल्कि गंभीर चिंतन की आवश्यकता होती है। क्योंकि भू-राजनीति में अक्सर युद्ध की शुरुआत गोलियों से नहीं, संकेतों से होती है।
सत्यमेव जयते

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