देश में आजादी से लेकर आज तक आतंकवाद नहीं रुक सका है। हांलाकि इस बात में कोई दोराय नहीं है कि आतंकवाद पर शिकंजा कसने के सभी सरकारों ने अथक प्रयास किया है। हमारे देश में वर्ष 1980 से लेकर आज तक लगभग 125 बड़े हमले हो चुके हैं जिसमें हजारों लोग बेमौत मारे गए हैं।आतंकवादी द्वारा सभी हमलों ने यह तो दर्शा दिया कि उनका नेटवर्क इतना मजबूत है कि वह अपने मंसूबों में हमेशा कामयाब हो जाते हैं। दरअसल आतंकवादियों के लिए आतंक फैलाना हमेशा एक बड़ा व्यवसाय रहा है। उनके गुर्गों की ट्रेनिंग इतनी खतरनाक तरह से होती है कि वह अपनी जान की परवाह किए बिना किसी भी आतंकी घटना को अंजाम दे देते हैं।
आतंकवादी संगठन मजहब के नाम पर हर रोज सैकड़ों युवाओं को दलदल में डालने का काम करते हैं। मजहब के नाम पर कुर्बान होने के लिए उनका जिस तरह माइंड वॉश किया जाता है वह बेहद आश्चर्यचकित करता है। बीते दिनों दिल्ली में हुए हमले को अंजाम देने वाले डॉक्टर जैसे पढ़े-लिखें पेशे का इस्तेमाल किया और यह एक लंबी कतार निकली। दिल्ली लाल किला ब्लास्ट केस में शामिल आतंकी लखनऊ की डॉ. शाहीन सईद बीते दशकभर से पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी थी। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार शाहीन 2015 में जैश से जुड़ी थी। एक डॉक्टर होने के बावजूद किसी के मन में इतना जहर कैसे हो सकता है।जबकि आप जिस देश में रह रहे हो और उस ही देश के लिए इतनी बड़ी गद्दारी कर रहे हो। जांच में पता कि वर्ष 2021 में एक रिश्तेदार ने डॉ. शाहीन को पति, बच्चे और नौकरी छोड़ने पर जब टोका तो शाहीन ने कहा था- परिवार और नौकरी में क्या रखा है। अपने लिए बहुत जी लिए। अब कौम का कर्ज उतारने का समय है। इस वाक्य से बहुत कुछ तय हो जाता है चूंकि पूरी दुनिया में माना जाता है कि डॉक्टरी की पढ़ाई सबसे मुश्किल पढ़ाइयों में से एक है और वहीं दूसरी ओर यह लोगों की जान बचाने का भी पेशा है तो बेहद सम्मानित व पूजनीय भी हैं लेकिन बावजूद इसके,यदि ऐसे लोगों का मस्तिष्क बदला जा सकता है तो फिर किसी का भी संभव हैं। लेकिन सवाल यही है कि आखिर इनके पास ऐसी कौन सी शक्ति है जो यह किसी को भी नियंत्रित कर लेती है। आखिर अमेरिका व अन्य शक्तिशाली देश भी इन पर नियंत्रण क्यों नही पा सके।
आतंकी हमले में हमेशा आम आदमी ही मारा जाता रहा है और हजारों-लाखों लोग इसमें अपनी बिना वजह जान गवा चुके। भारत सरकार ने अब तक 42 संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित किया है। हालांकि, विकिपीडिया के अनुसार दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल ने भारत में संचालित होने वाले 180 से अधिक आतंकवादी समूहों को सूचीबद्ध किया है, जिनमें से कुछ पड़ोसी देशों में भी सक्रिय हैं। इस खेल में आश्चर्य की बात यह भी है कि हमारे देश में बैठे कुछ आस्तीन के सांप खुलेआम समर्थन भी करते हैं। बीते कुछ वर्ष पूर्व जाकिर नाईक जैसे फर्जी धर्मगुरुओं ने धर्म परिवर्तन खुले आम दुकान खोलकर लाखों युवाओं को आतंकवाद में धकेलने का काम किया। वहीं बीते दिनों छांगुर बाबा जैसे फर्जी बाबा आतंकवाद समर्पित निकला और वह धर्मांतरण तो बहुत बडा रॉकेट चला रहा था। हालांकि ऐसे और भी बहुत सारे नाम है। इसके अलावा और न जाने कितने ऐसे लोग व संगठन हो सकते हैं जो आतंकवादी संगठनों के लिए काम कर रहे हों। इस बात को समझने में हमें कोई शक नहीं है कि हर सरकार आतंकवाद पर शिकंजा कसने के लिए हर अथक प्रयास करती है और पूरी निगरानी भी रखती है लेकिन मन में सवाल यही आता है कि आखिर आतंकवादी तकनीकी रूप से विश्व की बड़ी-बड़ी एजेंसियों से इतना अपडेट व अपग्रेड है कि और इतना आगे रहता है कि इनके इरादों की भनक तक भी नहीं लग पाती।
भारत के परिवेश में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में लगातार जनसंख्या बढ़ रही है जिसको नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल व सभी तरह की एजेंसी बल इतना नही है कि वह निगरानी रख सके। भारत जैसे देश पर तो सभी कट्टर इस्लामिक आतंकवादी संगठनो की निगाह है। इस प्रकरण में सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश के कुछ लोग आतंकवादियों का समर्थन करते हैं। हाल ही में हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी वाले प्रकरण से देश में एक नकारात्मक संदेश गया। तीन संदिग्ध डॉक्टरों की वजह से बहुत सारे सही विद्यार्थियों पर भी गाज गिर रही है और अब यूनिवर्सिटी की मान्यता भी रद्द कर दी गई है।साथ ही अब जितनी भी इस्लामिक यूनिवर्सिटी है उनको भी शक के घेरे में लिया जा रहा है।आतंकवादी जिस ट्रैक पर काम करते हैं वह बेहद आश्चर्य में डाल देता है चूंकि उसके लिए जो लोग काम करते हैं वह शिक्षित वर्ग होता है और कोई भी जांच एजेंसी एकाएक ऐसे लोगों पर शक नही करती जिसका वह जमकर फायदा उठाते हैं। इस घटना से देश में सभी मुस्लिम डॉक्टरों को भी सही निगाह से भी नहीं देखा जा रहा जबकि हर कोई एक जैसा नही होता चूंकि डॉक्टरों का धर्म,फर्ज व कर्तव्य होता है मरीजों को इलाज देना व जान बचाना होता है।लेकिन यदि उस रुप में भी जिहादी निकल जाए तो इसमें तो उसके अलावा किसी की भी गलती नही मानी जा सकती। लेकिन अब विश्व के नेताओं व जांच एजेंसियों को सबसे पहले यह समझना होगा कि आखिर आतंकी संगठन कैसे लोगों के मस्तिष्क को नियंत्रित करके उनको काबू करते हैं व साथ यह भी समझना होगा कि इनका संपर्क साधने का तरीका क्या है और यह किस तरह के लोगों को टारगेट करते हैं। चूंकि एक कहावत है कि ‘चोर नहीं चोर की मां को पकड़ो’ तो सब पता चल जाता है।
दरअसल सोशल मीडिया के दौर में संपर्क साधना बहुत आसान हो गया और आतंकवादी संगठन इसका जमकर फायदा उठा रहे हैं।इस खेल थे चक्रव्यूह को भेदना आसान तो नहीं हैं लेकिन असंभव भी नहीं हैं। ऐसे लोगों सोशल मीडिया गतिविधियों पर ध्यान रखने थे अधिक बल की जरूरत है और साथ में तकनीकी भी मजबूत होना पड़ेगा। बाकी जहां शक की गुंजाइश कम या न हो वहां तुरंत प्रभाव के साथ सक्रियता दिखानी चाहिए। जो लोग सोशल मीडिया पर देश विरोधी एजेंडा चला रहे हों उन पर सबसे पहले कार्यवाही होनी चाहिए चूंकि वह अपने फॉलोवर्स को गलत संदेश प्रेषित करके समाज में तो जहर घोलने का काम करते ही हैं साथ में उनकी अनैतिक गतिविधियों में लिप्त होने की आंशका बढ जाती है। बाकी लोगो को यह समझना होगा कि यह देश उनका भी है इसलिए उससे गद्दारी करके हम आने वाली पीढी को भी गलत संदेश दे रहे हैं और यदि आतंकवाद इतना सरल हो जाएगा तो यह मानव जीवन पर प्रहार के रूप में काम करेगा। हमने आज तक बहुत सारे परिवारों को उजड़ते देख लिया और यह ही लगता है कि आखिर उन बेगुनाहों का क्या कसूर है जो हर बारी बिना वजह बेमौत मारे जाते हैं। सरकार को इस पीड़ा को समझते हुए एक बहुत बड़ी रणनीति की आवश्यकता है जिससे की देशवासियों को धैर्य व विश्वास के साथ जिंदगी जीने को मिले चूंकि हर कोई सबसे पहले सुरक्षा चाहता।
योगेश कुमार सोनी
वरिष्ठ पत्रकार
